30/09/2024
#मंगलनाथमन्दिर मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी कहे जाने वाले उज्जैन में क्षिप्रा नदी के किनारे स्थित है। उज्जैन को मंगल की जननी कहा जाता है। मंदिर में भगवान मंगलनाथ शिव की प्रतिमा के रूप में लिंग स्वरूप में विराजमान है| यहां मंगल की माता पृथ्वी (भूदेवी) का मंदिर भी है। #मंगलनाथ के पास ही अंगारेश्वर का शिवलिंग है इनकी गिनती 84 #महादेव में की जाती है। इसी के निकट इंदौर के सरदार किबे साहब का एक बड़ा एवं सुंदर 'गंगा-घाट' है। इस स्थान से शिप्रा का निर्मल जल और प्रकृति के मोहक दृश्य का ऐसा सुंदर-मादक चित्र नेत्र के सामने उपस्थित होता है कि क्षण के लिए अशांत चित्त भी शांत और प्रफुल्लित हो जाता है।
स्कंद पुराण के अवंतिका खंड के अनुसार शिव जी ने अंधकासुर नामक दैत्य को वरदान दिया था कि उसके रक्त से सैकड़ों दैत्य जन्म लेंगे। भगवान शंकर से यह वरदान पाने के बाद इस दैत्य ने अवंतिका में तबाही मचा दी। तब देवताओं ने शिव जी से प्रार्थना की।
इनके कष्टों को दूर करने के लिए स्वयं शिव शंभु ने अंधकासुर से युद्ध किया। दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिस दौरान महादेव का पसीना बहने लगा। भगवान रुद्र के पसीने की बूंद की गर्मी से उज्जैन की धरती फटकर दो भागों में विभक्त हो गई। जिससे मंगल ग्रह का जन्म हुआ। कथाओं के अनुसार शिव जी ने दैत्य का संहार किया और उसकी रक्त की बूंदों को नव उत्पन्न मंगल ग्रह ने अपने अंदर समा लिया। ऐसा कहा जाता है कि यही कारण है मंगल की धरती लाल रंग की है।
वराह पुराण में उज्जैन नगरी को शरीर का नाभि देश (मणिपूर चक्र) और महाकालेश्वर को इसका अधिष्ठाता कहा गया है। महाकाल की यह कालजयी नगरी विश्व की नाभि-स्थली है।
भौगोलिक स्थिति के अनुसार ग्रीनविच उज्जैन देश के मानचित्र में 23.9 अंश उत्तर अक्षांश एवं 74.75 अंश पूर्व रेखांश पर समुद्र सतह से लगभग 1658 फीट ऊँचाई पर बसी है। इसलिये इसे काल-गणना का केन्द्र-बिन्दु कहा जाता है। यही कारण है कि प्राचीन-काल से यह नगरी ज्योतिष-शास्त्र का प्रमुख केन्द्र रही है।
इसके प्रमाण में राजा जय सिंह द्वारा स्थापित वेधशाला आज भी इस नगरी को काल-गणना के क्षेत्र में अग्रणी सिद्ध करती है। भौगोलिक गणना के अनुसार प्राचीन आचार्यों ने उज्जैन को शून्य रेखांश पर माना है। कर्क रेखा भी यहीं से जाती है। इस प्रकार कर्क रेखा और भूमध्य रेखा एक-दूसरे को उज्जैन में काटती है। यह भी माना जाता है कि संभवत: धार्मिक दृष्टि से श्री #महाकालेश्वर का स्थान ही भूमध्य रेखा और कर्क रेखा के मिलन स्थल पर हो, वहीं नाभि-स्थल होने से पृथ्वी के मध्य में स्थित है।