Rashtra Nirman Academy by JDS

Rashtra Nirman Academy by JDS Ignite your future
“मुनाफा का तो पता नहीं लेकिन बेचने वाले तो यादों को भी कारोबार बना कर बेच देते है।”
जीवन एक यात्रा है, मंजिल नहीं।” – ..

"शिक्षा हमें वह पंख देती है, जो हमें ऊँचाइयों तक उड़ने की क्षमता देता है।" -

03/09/2026

कांन्वेंट शब्द पर गर्व न करें सच समझें। ‘कांन्वेंट’ सबसे पहले तो यह जानना आवश्यक है कि ये शब्द आखिर आया कहाँ से है, तो आइये प्रकाश डालते हैं।

ब्रिटेन में एक कानून था लिव इन रिलेशनशिप बिना किसी वैवाहिक संबंध के एक लड़का और एक लड़की का साथ में रहना। जब साथ में रहते थे तो शारीरिक संबंध भी बन जाते थे, तो इस प्रक्रिया के अनुसार संतान भी पैदा हो जाती थी तो उन संतानों को किसी चर्च में छोड़ दिया जाता था।

अब ब्रिटेन की सरकार के सामने यह गम्भीर समस्या हुई कि इन बच्चों का क्या किया जाए तब वहाँ की सरकार ने काँन्वेंट खोले अर्थात् जो बच्चे अनाथ होने के साथ-साथ नाजायज भी हैं उनके लिए काँन्वेंट स्कूल बने।

उन अनाथ और नाजायज बच्चों को रिश्तों का एहसास कराने के लिए उन्होंने अनाथालयों में एक फादर एक मदर एक सिस्टर की नियुक्ति कर दी क्योंकि ना तो उन बच्चों का कोई जायज बाप है न ही माँ है। तो काँन्वेन्ट बना नाजायज बच्चों के लिए जायज स्थान।

इंग्लैंड में पहला काँन्वेंट स्कूल सन् 1609 के आसपास एक चर्च में खोला गया था जिसके ऐतिहासिक तथ्य भी मौजूद हैं और भारत में पहला काँन्वेंट स्कूल कलकत्ता में सन् 1842 में खोला गया था। परंतु तब हम गुलाम थे और आज तो लाखों की संख्या में काँन्वेंट स्कूल चल रहे हैं।

जब कलकत्ता में पहला कॉन्वेंट स्कूल खोला गया, उस समय इसे ‘फ्री स्कूल’ कहा जाता था, इसी कानून के तहत भारत में कलकत्ता यूनिवर्सिटी बनाई गयी, बम्बई यूनिवर्सिटी बनाई गयी, मद्रास यूनिवर्सिटी बनाई गयी और ये तीनों गुलामी के ज़माने की यूनिवर्सिटी आज भी इस देश में हैं।

मैकाले ने अपने पिता को एक चिट्ठी लिखी थी बहुत मशहूर चिट्ठी है उसमें वो लिखता है कि:

“इन कॉन्वेंट स्कूलों से ऐसे बच्चे निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे। इन्हें अपने देश के बारे में कुछ पता ही नहीं होगा। इनको अपने संस्कृति के बारे में कुछ पता नहीं होगा। इनको अपनी परम्पराओं के बारे में कुछ पता नहीं होगा।

इनको अपने मुहावरे नहीं मालुम होंगे, जब ऐसे बच्चे होंगे इस देश में तो अंग्रेज भले ही चले जाएँ इस देश से अंग्रेजियत नहीं जाएगी।” उस समय लिखी चिट्ठी की सच्चाई इस देश में अब साफ़-साफ़ दिखाई दे रही है और उस एक्ट की महिमा देखिये कि हमें अपनी भाषा बोलने में शर्म आती है, अंग्रेजी में बोलते हैं कि दूसरों पर रुवाब पड़ेगा। अरे ! हम तो खुद में हीन हो गए हैं। जिसे अपनी भाषा बोलने में शर्म आ रही है, दूसरों पर रोब क्या पड़ेगा?

लोगों का तर्क है कि “अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है”। दुनियाँ में 204 देश हैं और अंग्रेजी सिर्फ 11 देशों में ही बोली, पढ़ी और समझी जाती है, फिर ये कैसे अंतर्राष्ट्रीय भाषा है? शब्दों के मामले में भी अंग्रेजी समृद्ध नहीं दरिद्र भाषा है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईसा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईसा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी। समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी।

भारत देश में अब भारतीयों की मूर्खता देखिए जिनके जायज माँ बाप भाई बहन सब हैं, वो काँन्वेन्ट में जाते हैं तो क्या हुआ एक बाप घर पर है और दूसरा काँन्वेन्ट में जिसे फादर कहते हैं। आज जिसे देखो काँन्वेंट खोल रहा है जैसे बजरंग बली काँन्वेन्ट स्कूल, माँ भगवती काँन्वेन्ट स्कूल। अब इन लोगों को कौन समझाए कि भईया माँ भगवती या बजरंग बली का काँन्वेन्ट से क्या लेना देना?

दुर्भाग्य की बात यह है कि जिन चीजो का हमने त्याग किया अंग्रेजो ने वो सभी चीजो को पोषित और संचित किया। और हम सबने उनकी त्यागी हुई गुलामी सोच को आत्मसात कर गर्वित होने का दुस्साहस किया।🙏

26/08/2026
11/08/2026

आज से 40 या 50 साल पहले दूसरे देशों में हो रहे युद्धों से भारत की जनता को कोई खास फ़र्क नहीं पड़ता था.. और महज़ 100 साल पहले तो लोगों को पता भी नहीं चलता था कि उनके गांव से दूर दूसरी दुनिया में क्या हो रहा है.. फिर चाहे डीज़ल और एलपीजी के जहाज़ आएं या न आएं सबकी ज़िंदगी वैसे ही चलती थी जैसी चल रही थी

किसान अपने खेतों और बारिश पर निर्भर था न कि बिजली और डीज़ल पर.. लोगों का जीवन पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर था

आज हम मनुष्यों की तरक्की दरअसल हवा का एक बुलबुला है.. पूरी तरह से बाज़ार और साम्राज्यवाद पर निर्भर जीवन को हम मनुष्य तरक्की बोलते हैं.. आप फिल्मों और साहित्य में यही देखते पढ़ते हैं और इसे ही आप तरक्की समझने लगते हैं.. जबकि हकीक़त ये है कि दिल्ली, मुंबई और इस जैसे तमाम शहर पूरी तरह से "अप्राकृतिक' हैं और गुलामों की बस्तियां हैं.. ठीक वैसे जैसे मिस्र के पिरामिड के समय सालों तक गुलामों की बस्तियां पिरामिड के पास बनी रहती थीं

कोई युद्ध छिड़ जाए और दिल्ली में बिजली भेजने वाले अगर किसी भी संयंत्र पर हमला हो जाए, और मात्र दस दिनों के लिए ही बिजली बंद हो जाए तो आपके जो करोड़ों के घर हैं वहां आपको पानी तक नहीं मिलेगा और कुछ ही दिनों में हजारों जाने चली जाएंगी.. ये आपकी तरक्की का बुलबुला है.. आप कितनी भी बड़ी कंपनी में नौकरी कर रहे हैं, कितने भी पैसे कमा रहे हैं, कितने भी ऐश से रह रहे हैं, आपकी नस्लें बिना बिजली, डीज़ल और LPG के विलुप्त हो जाएंगी

मगर अच्छी बात ये है कि हमारे लिए अभी भी सवेरा है.. भारत आज नहीं तो कल युद्ध की चपेट में आयेगा ही.. क्योंकि अगल बगल सब दुश्मन ही बैठे हैं.. राज करने वाले बूढ़ों का कब दिमाग फिर जाए कुछ नहीं पता.. इसलिए हमेशा ऐसा विकल्प ले कर चलिए जहां आप और आपकी नस्लें प्राकृतिक रूप से जीवन जी सकें

पचासों हज़ार और लाखों की EMI भरते रहते हैं आप, इन दिल्ली और मुंबई के "हवा में बसे हुवे" घरों के लिए मगर दो चार बीघे खेत कहीं दूर गांव में नहीं खरीदते हैं.. क्योंकि आप के दिमाग़ में इन्वेस्टमेंट का कीड़ा बिठा दिया गया है.. आपके लिए जीना मतलब इन्वेस्टमेंट बन चुका है.. दूर गांवों के खेत इन्वेस्टमेंट का वो रिटर्न नहीं देते हैं जो शहर के फ्लैट देते हैं इसलिए आप खेत नहीं खरीदते हैं

मगर जीवन में सिर्फ़ एक बार, अपनी और अपनी नस्लों के लिए, "इन्वेस्टमेंट" को दिमाग़ से निकालकर, दो चार बीघा कहीं दूर, खेत ज़रूर खरीदिये.. और सिर्फ़ खेत मत खरीदिए, खेत खरीदने के दो चार साल के भीतर ही वहां रहने लायक एक बिल्कुल छोटा सा आशियाना बना लीजिए जो बड़ी छोटी सी लागत से बन जाएगा.. और अपने बच्चों को वहां लंबी छुट्टी पर ले जाइए.. लाखों खर्च करके मालदीव्स और दूसरी जगहों पर जाने से कहीं बेहतर है, अपने बच्चों को अपने खेत में प्रकृति के साथ जीना, बोना और खाना सिखाइए.. ये उनके सर्वाइवल के लिए काम आएगा

ये बस मेरा सुझाव है.. बाकी आपकी मर्ज़ी.. आपके पास मेरी बात न मानने के पचास बहाने हैं और दिल्ली में जा कर दिन रात धुँवा सूंघ कर करोड़ों का घर खरीद कर उसे जस्टिफाई करने की सौ दलीलें है.. अच्छी पढ़ाई, अच्छी नौकरी जैसी कोई भी चीज़ अब इस दुनिया में एक्जिस्ट नहीं करती है.. ये सब आपका वहम होता है

किसी भी देश में अगर कोई भी युद्ध कभी छिड़ जाता है तो सबसे पहले उस देश के बड़े बड़े शहर निशाने पर आते हैं.. और उन शहरों के करोड़ों के फ्लैट में बैठे बड़ी बड़ी डिग्रियां लिए कारपोरेट मज़दूर सबसे पहले मारे जाते हैं.. जबकि दूर गांवों में प्रकृति के बीच रहने वाले ज़्यादातर बच जाते हैं

आने वाले समय में सारे विश्व में बचेंगे सिर्फ़ वही लोग, जो बड़े बड़े शहरों से दूर रहते हैं.. शहर वाले युद्ध के बॉम्ब से नहीं तो प्रदूषण और बाकी चीज़ों से वैसे ही मारे जायेंगे.. शहरों का जीवन वैसे भी आने वाले समय में नर्क से भी बदतर होने वाला है

आज के वृद्धा आश्रम पहले भारत में नही होते थे लेकिन पश्चिमी सभ्यता से सीखकर भारत में भी आश्रम खुल गए है ये ज्यादा पढाई ज्यादा कमाई ने करवाया क्यों की इनके संस्कार नष्ट हो गए विदेश जाकर विदेशियों के संस्कार तो पहले से ही नष्ट है समय रहते प्राकृतिक चीजों को अपनाओ नही तुम्हारी टेक्नो लोजी सबको खा जायेगी l बिना पानी, बिना light के गुलाम तो पहले ही बन गए हो आप सोचिये गरीब बस्तियों के लिए न पानी, न भोजन, न प्रकाश कुछ भी नही बंबई जैसे शहरों में इन अमीरजादो के लिए कभी कोई चीज समाप्त ही नही हुई l

04/08/2026

हम आरक्षण छोड़ने के लिए तैयार हैं. हम अनुसूचित जाति के जाति प्रमाण पत्र जलाने के लिए तैयार हैं. व शर्ते आप संसद से वर्ण और जाति व्यवस्था समाप्त करने का कानून बनवा दें. (बबन रावत)
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मैं एक मेहतरनी का बेटा हूँ. मेरी माँ ने सर पर मैला ढो कर, जूठन खिलाकर. टूटे फूटे सरकारी स्कूल में पढ़ाया. स्कूल के दिनों में मेरे साथ छुआछूत का भी बर्ताव हुआ.

आज से 36 साल पहले मैं हिस्ट्री से MA हूँ. पत्रकारिता में डिप्लोमा हूँ. मैंने भाषण प्रतियोगिता में यूनिवर्सिटी में टॉप किया था.

जीवन में एक ही नौकरी का एग्जाम दिया था, 'ऑल इंडिया रेडियो' विवित भारती में उद्घोषक का. उसमें भी रिटेन में ऑल इंडिया टॉप किया था. परंतु कास्टीज्म के वजह से ओडिशन में मुझे छांट दिया गया. ( यह बात वर्ष 1987 की है.)

मैंने जीवन में किसी भी तरह का आरक्षण का लाभ नहीं लिया. लेकिन जो लोग आरक्षण का विरोध करते हैं उनको चैलेंज करता हूं वह हमसे किसी भी विषय पर डिबेट कर लें.

मैंने अपने बच्चों को भी अभी तक आरक्षण का लाभ नहीं दिलवाया है. जो लोग आरक्षण का विरोध कर रहे हैं उनको मालूम होना चाहिए सरकारी क्षेत्र के नौकरियों में अब आरक्षण है कहां ? मात्र 2% बचा है.

सिर्फ विधाई क्षेत्र में आरक्षण बचा है. आप ने विगत 3000 वर्षों से आरक्षण का लाभ उठाया है, हमने तो कभी आप से सवाल नहीं किया.

जो लोग आरक्षण पर सवाल उठा रहे हैं क्या वे लोग बता सकते हैं ?
देश में बड़े-बड़े पुल निर्माण के समय/बाद में धराशाई क्यों हो गए ?वह ठेकेदार किस जाति का था ? वहां काम करने वाले इंजीनियर किस जाति के थे ?

मरीज के पेट में रोईं, कैंची छोड़ने वाले डॉक्टर किस जाति के थे ? डोनेशन के बल पर डॉक्टर और इंजीनियर बनने वाले अधिकांश किस जाति के होते हैं ?

जो लोग आरक्षण का विरोध करते हैं, वैसे लोग क्या बतला सकते हैं कि देश का गोपनीय सुरक्षा दस्तावेज बेचने या लिक करने वाले, राष्ट्रद्रोह जैसे अपराध करने वाले लोगों में कितने दलित समाज के लोग हैं ? आपको मालूम है तो किसी एक का भी नाम बतला दीजिए ?

जो लोग आरक्षण का विरोध करते हैं, वे लोग क्या यह बतला सकते हैं कि देश के साथ किसी दलित ने कभी गद्दारी की है ? यदि गद्दारी की है तो उस दलित का नाम बता दे. अन्यथा हम दर्जनों ऐसे लोगों का नाम बता देंगे जिन्होंने अपने देश भारत के साथ गद्दारी की है.

जो लोग आरक्षण का विरोध करते हैं, वे लोग बता सकते हैं कि सिकंदर को सिंध (भारत) पर हमला करने के लिए किसने बुलाया ? क्या किसी दलित ने बुलाया ?

जो लोग दलित आरक्षण का विरोध करते हैं, वे लोग क्या यह बता सकते हैं कि मोहम्मद बिन कासिम को भारत पर हमला करने के लिए किसने बुलाया ? क्या किसी दलित ने बुलाया ?

जो लोग दलित आरक्षण का विरोध करते हैं, क्या वे लोग बता सकते हैं कि बाबर को भारत पर हमला करने के लिए किसने बुलाया ? क्या किसी दलित ने बुलाया ?

जो लोग दलित आरक्षण का विरोध करते हैं, वे लोग क्या बतला सकते हैं सोमनाथ मंदिर की तहखाना में रखें सोने चांदी हीरे जवाहरात को मोहम्मद गजनी के हाथों किसने लुटवाया ? क्या किसी दलित ने लुटवाया ?

जो लोग दलित आरक्षण का विरोध करते हैं, क्या वे लोग बता सकते हैं कि जब राणा प्रताप अकबर के खिलाफ हल्दीघाटी के मैदान में युद्ध लड़ रहे थे, तो युद्ध के मैदान में अकबर का सेनापति कौन था ? क्या कोई दलित था ?

जो लोग दलित आरक्षण का विरोध कर रहे हैं, वे लोग बता सकते हैं. अंग्रेजों की मुखबिरी किसने की ? राय बहादुर, सूबेदार बहादुर की उपाधि अंग्रेजों से किन लोगों ने हासिल की ? किस उपलक्ष में हासिल की ? अपनी रियासत बचाने के लिए मुगलों और अंग्रेजों को क्या-क्या देना पड़ा ?

जो लोग दलित आरक्षण का विरोध करते हैं, क्या वे लोग बता सकते हैं कि स्वामी दयानंद सरस्वती को जहर किसने दी ? चंद्रशेखर आजाद को धोखे से किसने मरवाया ? क्या किसी दलित ने जहर दी ? चंद्रशेखर आजाद की मुखबारी किसी दलित ने की ?

जो लोग डॉ.अंबेडकर द्वारा लिखित संविधान को बी. एन. राव (बेनेगल नरसिंह राव) द्वारा लिखित संविधान मान रहे हैं, वे लोग भारत के संविधान में दिए हुए आरक्षण का विरोध क्यों कर रहे हैं ?

चलो हमने तुम्हारी बात मान ली, कि डॉक्टर अंबेडकर ने नहीं, तुम्हारे शब्दों में भारत का संविधान बी. एन. राव ने लिखा है, तो संविधान में आरक्षण का प्रावधान तुम्हारे ही बाप दादाओ ने हीं तो किया है, फिर आरक्षण का विरोध क्यों ?

जो लोग यह कहते हैं कि इस देश के दलित सबसे पहले अपना जाति प्रमाण पत्र फाड़ दें. हम जाति प्रमाण पत्र फाढ़ने के लिए तैयार हैं. हम जाति प्रमाण पत्र जलाने के लिए तैयार हैं. बा शर्तें कि आप भारत के सांसद से चारों वर्ण और जाति को समाप्त करने का कानून बनवा दें.

चारों शंकराचार्य के मठ में ताला लगवा दें. ऊँच नीच की भाषा व्यवहार पर प्रतिबंध लगवा दें. मंदिरों में योग्यता के आधार पर पुजारी रखवा दें. प्राइवेट शैक्षणिक संस्थान बंद करवा दें. सभी को सरकारी शैक्षिक संस्थानों में पढ़ने के लिए अनिवार्य कानून बनवा दें. (बबन रावत-चिंतक)

08/07/2026

भारत में एक आम मिडिल-क्लास बाप की हैसियत का अंदाजा बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि इस बात से लगाया जाता है कि उसका बच्चा किस स्कूल में पढ़ता है।

अपनी जेब की औकात छोटी पड़ जाए तो मंजूर, लेकिन बच्चे के स्कूल का 'लोगो' शर्ट की जेब पर बड़ा चमकना चाहिए।

मैंने भी यही सोचकर, शहर के एक ठीक ठाक स्कूल में अपने बच्चों का दाखिला करवा दिया।

स्कूल चमचमाता था, फीस तगड़ी थी,
और अनुशासन बढ़िया था

हमें लगता था कि भारी-भरकम फीस दे रहे हैं तो पढ़ाई भी अव्वल ही होगी।
पर सच यह था कि अंदर सिर्फ "काम चलाऊ" पढ़ाई होती थी।
नाम बड़ा था, दर्शन छोटे थे।

पर समाज में कॉलर ऊंची रखने के लिए हम सब माता-पिता यह कड़वा घूंट पी रहे थे।

घर और हॉस्पिटल के चक्कर में, मैं कभी स्कूल की 'पैरेंट्स-टीचर मीटिंग' (PTM) में नहीं जा पाया। वह मोर्चा हमेशा मेरी पत्नी ही संभालती थी।

फिर एक दिन वो वाकया हुआ, जिसने स्कूल की उस ऊंची दीवार के पीछे का सच सामने ला खड़ा किया।

उस दिन PTM थी।

मेरी पत्नी समय की पाबंद है, लेकिन शहर के ट्रैफिक और घर के सौ कामों के फेर में उसे स्कूल पहुँचने में महज चार-पांच मिनट की देरी हो गई।

जब वह स्कूल के बड़े से हॉल के बाहर पहुँची, तो देखा कि सिर्फ वही नहीं, बल्कि करीब 12-14 और माता-पिता भी वहाँ खड़े थे।

गुनाह सिर्फ इतना था कि वे चार मिनट लेट थे।

सजा यह मिली कि उन्हें हॉल के अंदर जाने से रोक दिया गया, जैसे वे किसी इम्तिहान में फेल हो गए हों।

तभी वहां स्कूल की प्रिंसिपल साहिबा का आगमन हुआ।

कड़क मिजाज, चेहरे पर और आवाज में रौब।
उन्होंने आते ही उन सभी माता-पिता पर चिल्लाना और बुरी तरह डांटना शुरू कर दिया।

“आप लोग अपने बच्चों का भविष्य क्या बनाएंगे जब खुद वक्त के पाबंद नहीं हैं!"

हॉल के बाहर खड़े वो पढ़े-लिखे, संभ्रांत माता-पिता, कोई सरकारी मुलाजिम था तो कोई छोटा व्यापारी... सब सिर झुकाए चुपचाप वो जिल्लत सह रहे थे।

कोई कुछ नहीं बोला।
बोलते भी कैसे?
बच्चों के भविष्य का मामला था। सबको डर था कि कहीं बच्चे को स्कूल से न निकाल दिया जाए,

कहीं उसका साल न बर्बाद हो जाए। प्रिंसिपल से पंगा लेने की हिम्मत किसी में नहीं थी।

लेकिन मेरी पत्नी से यह अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ।
उसने सीधे प्रिंसिपल को टोकते हुए कहा:

"मैडम! आप इस लहजे में और इस तरह गलत तरीके से हमसे बात नहीं कर सकतीं।
आपके स्कूल में अंदर पढ़ाई तो बराबर होती नहीं है,
और आप उल्टे हम माता-पिता को यहाँ खड़ा करके सुना रही हैं?"

वह अकेली आवाज एक चिंगारी थी। जैसे ही मेरी पत्नी ने यह बात कही,

वहां खड़े बाकी माता-पिता के सब्र का बांध भी टूट गया।
जो लोग अब तक डर के मारे सिर झुकाए खड़े थे,
वे सब एक सुर में चिल्ला उठे। सबने प्रिंसिपल को उनके स्कूल की ढीली पढ़ाई और ऊंची फीस का आइना दिखा दिया।

प्रिंसिपल मैडम एकदम अवाक रह गईं।
उनके पास कोई जवाब नहीं था, क्योंकि सच तो यही था कि स्कूल में पढ़ाई उतनी अच्छी नहीं थी

माता-पिता का वो सामूहिक गुस्सा देखकर उनके पैर पीछे खिंच गए।

उन्होंने तुरंत सबको हॉल के अंदर आने की इजाजत दे दी। उस दिन का मामला तो शांत हो गया,
लेकिन यह सिर्फ तूफान के आने से पहले की शांति थी।

कुछ दिनों बाद, हॉस्पिटल में काम करते हुए मेरे फोन की घंटी बजी।

स्क्रीन पर स्कूल का नंबर था। मुझे तुरंत प्रिंसिपल ऑफिस बुलाया गया था।

जब मैं धड़कते दिल के साथ प्रिंसिपल मैडम के केबिन में दाखिल हुआ, तो उन्होंने बड़ी संजीदगी से मुझसे कहा, "देखिए मिस्टर... आइंदा से स्कूल की किसी भी मीटिंग में आप खुद आएंगे। अपनी वाइफ को मत भेजिएगा।"

मैंने बात को आगे बढ़ाना ठीक नहीं समझा।

अपनी मध्यमवर्गीय समझदारी का इस्तेमाल करते हुए मैंने सर हिलाया और कहा, "ठीक है मैडम, आगे से मैं ही आऊंगा।"

लेकिन इसके बाद, जैसे मेरे बेटे पर स्कूल की 'विशेष नजर' हो गई। हर छोटी-छोटी बात पर मेरे फोन पर शिकायत आने लगी

मुझे बार-बार स्कूल के चक्कर काटने पड़ते। मैं जाता, हाथ जोड़कर मैडम से मिलता, बात रफा-दफा होती और मैं लौट आता।

फिर एक दिन एक बड़ा 'कांड' हो गया। स्कूल से बुलावा आया कि आपके लड़के ने बहुत बड़ी बदमाशी की है।
मैं घबराया हुआ प्रिंसिपल ऑफिस पहुँचा। वहां मेरा छठी क्लास का बेटा भी गुमसुम खड़ा था।

पता चला कि क्लास की मॉनिटर ने उसकी शिकायत क्लास टीचर से की थी, और बात प्रिंसिपल तक पहुँच चुकी थी।

प्रिंसिपल मैडम ने कड़क आवाज में मेरे बेटे से पूछा, "हाँ बताओ, तुमने क्या बदमाशी की है क्लास में?"

मेरे बेटे ने मासूमियत और पूरे आत्मविश्वास के साथ मैडम की तरफ देखा और बोला:

“मैडम, वो जो क्लास मॉनिटर है ना, वो लड़की... वो मेरी 'Enemy' (दुश्मन) है! वो मुझसे चिढ़ती है, इसीलिए मेरे खिलाफ झूठी शिकायत करती रहती है!"

छठी क्लास के बच्चे के मुंह से 'Enemy' शब्द सुनकर केबिन का वो तनावपूर्ण माहौल एक पल में पिघल गया।

कड़क मिजाज प्रिंसिपल मैडम के चेहरे पर एक गहरी और सच्ची मुस्कान तैर गई।

उन्होंने हंसते हुए मेरी तरफ देखा और कहा, "देखिए जरा इन बच्चों को... इस छोटी सी उम्र में ही इन्होंने अपने दुश्मन भी बना लिए हैं!"

मैंने माहौल को संभालते हुए तुरंत अपने बेटे को थोड़ा डांटा और कहा, "चलो, बहुत बातें हो गईं, मैडम के पैर छुओ, अपनी गलती की माफी मांगो और आशीर्वाद लो।"

मेरे बेटे ने झुककर प्रिंसिपल मैडम के चरण स्पर्श किए। मैडम ने मुस्कुराकर उसके सिर पर हाथ रखा और उसे माफ कर दिया। वह बात वहीं खत्म हो गई।

शायद वह घटना एक इशारा थी। अगले ही साल, मैंने अपने बच्चे का नाम उस स्कूल से कटवा दिया और उसे एक दूसरे स्कूल में शिफ्ट कर दिया।
अब तो मेरा लड़का बड़ा हो गया है

नए स्कूल में जाने के कुछ महीनों बाद, एक दिन घर पर बैठे-बैठे मैंने अपने बेटे को हंसते हुए पास बुलाया और पूछा, "अच्छा एक बात बता... उस दिन सच क्या था?
उस मॉनिटर लड़की ने झूठी शिकायत की थी या तूने सच में कुछ किया था?"

बेटा झेंपते हुए मुस्कुराया और धीमे से बोला, "पापा... वो... मैं सच में क्लास में मेज (डेस्क) के ऊपर कूद रहा था।"

मैं बस उसे देखता रह गया और हंस पड़ा।
बच्चे तो बच्चे ही होते हैं।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो पता चलता है कि वो प्रिंसिपल मैडम अब इस दुनिया में नहीं रहीं। जब उनके जाने की खबर मिली,
तो दिल में एक अजीब सी कसक उठी। स्वभाव की थोड़ी कड़क जरूर थीं,
लेकिन दिल की बुरी नहीं थीं। और सच कहूं तो,
बच्चों को संभालने के लिए स्कूल के मुखिया का थोड़ा कड़क होना जरूरी भी होता है।

हम मिडिल-क्लास लोग आज भी अपने बच्चों के सुनहरे भविष्य की उम्मीद में, भारी बस्तों और मोटी फीसों के नीचे दबे, बस एक अदद 'अच्छे स्कूल' की तलाश में भटक रहे हैं।

13/06/2026

*खतरनाक सर्वे रिपोर्ट*

*कुंवारेपन का विस्फोट, समाज अंधी दौड़ में कहाँ पहुँच रहा है ?*

अब वक्त आ गया है कि चीज़ों को मीठे शब्‍दों में कहना बंद किया जाए।
*दुनिया जिस महिला आज़ादी की जय-जयकार कर रही है, वही आज़ादी धीरे-धीरे *परिवार, रिश्तों,* और *सामाजिक संतुलन,* सब कुछ निगलने लगी है।
अंतरराष्ट्रीय सर्वे कहता है कि आने वाले कुछ वर्षों में *युवतियों में 45% तक विवाह से दूरी बना सकती हैं।* पहली नज़र में यह *प्रगति* लगती है, पर असल में यह *भविष्य के लिए एक टाइम-बम* है।
1.*कैरियर, पैसे और अकेलापन….यह कैसी प्रगति?*
आज की बेटी कलेक्टर डॉक्टर, इंजीनियर, सीए, टीचर उद्यमी, सब बन रही है। बहुत अच्छा। शानदार। पर क्या कैरियर पूरा जीवन है?
*जरा सोचे. पैसा साथी नहीं बनता। पद वृद्धावस्था में हाथ नहीं पकड़ता। मोबाइल और लैपटॉप बुढ़ापे में बात नहीं करते।* लेकिन समाज को इस सच्चाई से फर्क नहीं पड़ता, सबको दौड़ लगानी है।
2.*परिवार ढह रहे हैं…. कोई देख भी रहा है?*
कुँवारे लड़के बढ़ रहे हैं, अविवाहित युवतियाँ बढ़ रही हैं, जनसंख्या गिर रही है,
और *अकेलेपन उद्योग* (counsellor, therapy, depression pills) फल-फूल रहा है। पर हम फिर भी कहते हैं, *सब ठीक है, यह आधुनिकता है।* यह *आधुनिकता नहीं, धीमी मौत* है, परिवार, समाज और मानवीय संबंधों की।
3.*सर्वाधिक खतरनाक स्थिति..*
आज माता-पिता रिश्ता ढूंढते हैं, पर लड़की कहती है, *अभी नहीं।*
फिर *अभी नहीं* धीरे-धीरे *कभी नहीं* में बदल जाता है और जब एहसास होता है तो मेडिकल रिपोर्ट सामने होती है, हार्मोनल इश्यू, कंसिव न होना, मानसिक तनाव, अकेलापन। पर तब कौन जिम्मेदार? *कोई नहीं, क्योंकि फैसला स्वतंत्रता का था।*
4.*समाज के सफेदपोश लोग चुप क्यों हैं??*
क्योंकि सच्चाई बोलने से उन्हें आधुनिकता-विरोधी कहलाने का डर है। पर सच्चाई यह है कि अगर 21–25 की उपयुक्त उम्र में विवाह नहीं हुए तो समाज जल्द ही *दिसंबर की ठंडी रात जैसा सूना* हो जाएगा।
5.*अंतिम बात.*
प्रगति वो नहीं जो हमें अकेला कर दे। अगर हमारा भविष्य कुंवारा, अकेला और भावहीन होने वाला है, तो समाज के लिए यह गर्व की नहीं,*खतरे की घंटी है।*👉 “आप अपनी राय जरूर लिखें 🙏🙏

10/06/2026

ट्रंप चचा के टेबल पर सिर्फ हमारी विदेश नीतियाँ ही तय नहीं हो रहीं, बल्कि हमारी घरेलू नीतियों का निर्धारण भी व्हाइट हाउस में हो रहा है। ईरान युद्ध में हमने हर वह काम किया, जो अमेरिका ने कहा। कुछ काम अपनी ओर से खरखाहीं में भी किया, ताकि ट्रंप चचा खुश हों। ठकुरसुहाती उतने भर पर नहीं रुकी हुई है। हमारी सरकार ट्रंप चचा का सहलाने के चक्कर में अपने देशवासियों का ही तेल निकालने में जुटी हुई है। कैसे? इसके लिए आगे तभी पढ़िये, जब दिमाग नयी बातें और नये दृष्टिकोण को स्वीकारने में सक्षम बचा हुआ हो। यदि आपके लिए कोई व्यक्ति या कोई विचारधारा या कोई पार्टी देश से ऊपर है, आपको आगे नहीं पढ़ने की सलाह दी जाती है।

अभी देश में एक बड़ा मुद्दा है इथेनॉल। नहीं है तो इसे होना चाहिए। समझने में आसानी के लिए पहले कुछ फैक्ट्स:-

1:- पूरे देश में ई20 अनिवार्य हो चुका है। ई20 का मतलब तेल में 80% पेट्रोल और 20% इथेनॉल। एक्सपी95 और पावर95 जैसे महँगे ऑप्शंस में भी 20% इथेनॉल है। इथेनॉल नहीं चाहिए तो एकमात्र विकल्प 100 ऑक्टेन वाला पेट्रोल (जैसे एक्सपी100) है, जो बहुत कम उपलब्ध है और 150-160 रुपये लीटर है।
2:- सरकार ने ई22, ई25, ई27 और ई30 के मानक जारी कर दिये हैं। अभी कुछ पेट्रोल पंपों को कहा गया है कि वे ई20 के साथ ये विकल्प भी रखें।
3:- सरकार ने ई85 लॉन्च कर दिया है। इसमें पेट्रोल बस 15% है। बाकी 85% इथेनॉल है। इस साल के अंत तक 500 पंप और अगले साल के अंत तक 5,000 पेट्रोल पंप पर यह उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। इसका दाम नॉर्मल पेट्रोल (मने 20% इथेनॉल वाले) से 20 रुपये कम है।
4:- सरकार ने डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की बात साफ कर दी है। पहले 5% की बात थी, फिर 10% की होने लगी, अब 15% की बात चल रही है। मतलब जैसे अभी नॉर्मल पेट्रोल में 20 इथेनॉल है, वैसे ही नॉर्मल डीजल में 15% आइसोब्यूटेनॉल मिला रहेगा।
5:- अभी तक बाजार में जो कारें या बाइक बिक रही हैं, उनमें ई20 से ऊपर का कोई भी ऑप्शन नहीं डाल सकते। 20% से ऊपर इथेनॉल इंजन नहीं झेल पायेगा। आगे इस तरह की कारें-बाइकें आ सकती हैं। हीरो ने स्प्लेंडर का और मारुति ने वैगनआर का फ्लेक्स इंजन अभी अनवील किया है। हो सकता है 1-2 महीने में ये शोरूम पर दिखने लगें। हो सकता है आगे और भी मॉडल आ जायें। इनमें ई20 से लेकर ई100 तक कुछ भी डाल सकते हैं।

सरकार ने देश भर में ई20 पेट्रोल को अनिवार्य करने की समयसीमा 2030 तय की थी। यह एक अघोषित नियम है कि सरकारी समयसीमा हमेशा आगे खिसकती है। इथेनॉल के मामले में यह परिपाटी चमत्कार की तरह टूट गयी। सरकार ने समयसीमा से 5 साल पहले 2025 में ही यह काम कर लिया। मजेदार बात ये है कि भारत ऐसा अकेला देश है, जिसने पूरे देश में ई20 को अनिवार्य कर दिया है। दुनिया के कई देश पेट्रोल में इथेनॉल मिला रहे हैं, लेकिन कहीं भी मिनिमम 20% इथेनॉल का कैप नहीं है। ग्लोबल स्टैंडर्ड ई10 का है। इससे अधिक ब्लेंड वाले पेट्रोल भी हैं, लेकिन ऑप्शनल हैं, मैंडेटरी नहीं। कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका जैसे विकसित देशों में कैप 10% इथेनॉल का है। इथेनॉल ब्लेंड में ब्राजील सबसे आगे था, लेकिन वहाँ भी कैप 18% का है। इससे ऊपर ई27 से ई85 तक ऑप्शनल है। मतलब कम से कम 20% की अनिवार्य ब्लेंडिंग सिर्फ और सिर्फ भारत में हो रही है। अब आगे की तैयारी है डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की। इसमें मजेदार बात है कि यह अब तक कोई देश नहीं कर रहा है। कहीं-कहीं ट्रायल चल रहे है। भारत में ट्रायल की जरूरत नहीं समझी जा रही है। सीधे 15% आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की उसी तरह तैयारी है, जैसे पेट्रोल में 20% इथेनॉल हुआ है।

अब ये समझें हमलोग कि ये इथेनॉल और आइसोब्यूटेनॉल है क्या चीज? इन्हें कहा जाता है बायोफ्यूल या जैव ईंधन। पेट्रोल, डीजल, केरोसिन आदि कहे जाते हैं फॉसिल फ्यूल या जीवाश्म ईंधन। फॉसिल फ्यूल हजारों सालों में स्वत: बनते हैं। बायो फ्यूल की फैक्ट्री डाली जा सकती है। बायोफ्यूल अनाज, पराली आदि से बनाये जाते हैं। बायोगैस बनाने में गोबर यूज हो जाता है। भारत में अभी इथेनॉल बनाने में गन्ने के साथ मक्के और चावल के इस्तेमाल की भी मंजूरी दी जा चुकी है। आइसोब्यूटेनॉल में रॉ मटीरियल क्या होंगे, ये अभी सरकार ने अधिसूचित नहीं किया है, लेकिन संकेत से यही लग रहा है कि इथेनॉल की तरह इसमें भी गन्ने, मक्के और चावल की मंजूरी दे दी जायेगी।

यहाँ पर कुछ स्वाभाविक सवाल उठने चाहिए। क्या वजह है कि हम इथेनॉल और आइसोब्यूटेनॉल की खपत बढ़ाने को लेकर बहुत जल्दी में हैं? जिस काम को 2030 तक करने का टारगेट लेकर हम चल रहे थे, हमने उसे 2025 में ही क्यों लागू कर दिया? न्यूनतम 20% इथेनॉल किसी ने नहीं किया, हमने क्यों किया? डीजल में आइसोब्यूटेनॉल अबतक किसी ने नहीं मिलाया, इसका रियल यूजकेस डेटा मामूली है, फिर भी हम डीजल में 15% आइसोब्यूटेनॉल क्यों मिलाने जा रहे हैं? इन सवालों के जवाब अबतक समझ आ रहे थे कि इसमें गन्नाकरी ब्रो के हित सध रहे हैं। ब्रो अपने लौंडों का बिजनेस चमकाने के लिए देश को चूल्हे में झोंक रहा है। लेकिन इस जवाब के बाद कई नये सवाल बन जाते हैं। क्या इस सरकार में गन्नाकरी ब्रो इतना ताकतवर है कि अपनी मर्जी चला सके और दूसरे मंत्रालयों के कार्यक्षेत्र में सीधा दखल डाल सके? मुझे ऐसा नहीं लगता।

जवाब हमें आगे मिलेंगे कुछ आँकड़ों में। अभी पिछले सप्ताह गन्नाकरी ब्रो और एप्सटीन फाइल वाले मंत्रीजी, दोनों ने फिर से दावा किया कि भारत में अभी जितनी खपत है, उससे ज्यादा इथेनॉल बनाने की क्षमता है। यह बात सही भी लग रही है। जबसे गन्ने के अलावा मक्के और चावल से भी इथेनॉल बनाने की मंजूरी मिली है, कई राज्यों के इथेनॉल प्लांट आफत में फंस गये हैं। कारण है कि हर राज्य से इथेनॉल खरीदने का कोटा है। जिन राज्यों पर सरकार की कृपा है, वहाँ बहुत ज्यादा उत्पादन के बाद भी पूरा इथेनॉल सरकारी कंपनियाँ खरीद ले रही हैं। कुछ राज्यों में उत्पादन बहुत ज्यादा नहीं है, फिर भी उनके प्लांट से इथेनॉल नहीं खरीदे जा रहे हैं। हमारा बिहार भी ऐसा ही एक राज्य है। मतलब सरकार की यह बात मानी जा सकती है कि हम खपत से ज्यादा इथेनॉल का उत्पादन कर रहे हैं। अब अगर यह बात सच है, फिर हम अमेरिका से इथेनॉल क्यों खरीद रहे हैं? अमेरिकी ऊर्जा मंत्रालय के आँकड़े कहते हैं कि पिछले साल हमने अमेरिका से इथेनॉल खरीदने का रिकॉर्ड बना दिया। जनवरी से सितंबर तक में ही हमने अमेरिका से 35,39,000 बैरल इथेनॉल खरीदा। मतलब हर महीने 3,93,000 बैरल। अपनी सरकार यहाँ सफाई देती है कि अमेरिका से आने वाले इथेनॉल का सिर्फ इंडस्ट्रियल यूज होता है। उसे हम पेट्रोल में नहीं मिलाते। सरकार की इस सफाई से हमारे सवाल का जवाब नहीं मिलता कि जब आप खपत से अधिक उत्पादन घर में करने का दावा कर रहे हो, फिर इंडस्ट्रियल यूज के लिए भी हम अमेरिका से इथेनॉल क्यों खरीद रहे हैं? वो भी महँगा? भारत में जो इथेनॉल बन रहा है, वह अमेरिका से सस्ता है। हमारी जितनी खपत है, उससे अधिक उत्पादन है। फिर अमेरिका से इथेनॉल खरीदना संदेहास्पद नहीं है?

अब पिछले साल फरवरी में चलते हैं। जनवरी 2025 में ट्रंप चचा के शपथ लेते ही हमारे अमृतलाल व्हाइट हाउस जाने के लिए छटपटाने लगे थे। आनन-फानन में फरवरी में अमेरिका पहुँच गये थे। ट्रंप चचा से भरपूर बेइज्जती करवाने के बाद अमृतलाल जी ने 56 इंच की छाती ठोकते हुए अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर की खरीद करने का वादा कर दिया था। अमृतलाल जी को लगा था इससे ट्रंप चचा खुश होंगे। चचा कितने खुश हुए, यह ऑपरेशन सिंदूर के बाद दुनिया ने देखा। लेकिन अमृतलाल की स्वामीभक्ति अप्रभावित है। हम सस्ता रूसी तेल छोड़कर महँगा अमेरिकी तेल खरीद रहे हैं। सस्ता रूसी गैस छोड़कर महँगा अमेरिकी गैस खरीद रहे हैं। हम बैंक से कर्जा लेकर इथेनॉल प्लांट लगाने वाले अपने उद्यमियों को उनके हाल पर छोड़कर अमेरिका से महँगा इथेनॉल खरीद रहे हैं। अमेरिका अभी आइसोब्यूटेनॉल का सबसे बड़ा उत्पादक है। संभव है हम आगे आइसोब्यूटेनॉल भी अमेरिका से खरीदें।

भारत और अमेरिका के बीच जिस ट्रेड डील पर बातचीत चल रही है, उसमें बायोफ्यूल एक बड़ा मुद्दा है। अमेरिका का दबाव है भारत ज्यादा से ज्यादा बायोफ्यूल खरीदे। अमेरिका में कृषि योग्य भूमि है 41 लाख वर्गकिलोमीटर। भारत का कुल क्षेत्रफल है 33 लाख वर्गकिलोमीटर। अमेरिका की आबादी है 35 करोड़। भारत की आबादी 150 करोड़। अमेरिका के पास खूब सारा सरप्लस अनाज है इथेनॉल-आइसोब्यूटेनॉल बनाने के लिए। भारत में इथेनॉल बनाने के लिए काफी सारा मक्का भी अमेरिका से आ रहा है। 2-4 साल पहले तक भारत मक्का एक्सपोर्ट करता था। इथेनॉल-आइसोब्यूटेनॉल बनाने में जिन फसलों का इस्तेमाल हो रहा है, तीनों पानी पीने के लिए कुख्यात हैं। हमारे पास दुनिया की करीब 20% आबादी है, लेकिन पीने-खेती करने लायक पानी सिर्फ 4%। जिस ब्राजील का उदाहरण बार-बार देते हैं उसकी आबादी है सिर्फ 22 करोड़ और उसके पास दुनिया का सबसे बड़ा वाटर रिसॉर्स है, करीब 12%। फिर भी उसे पानी के संकट सताने लगे हैं। भारत का क्या हो सकता है, ये जानने के लिए गूगल पर India Water Crisis सर्च कर लें।

लेकिन अमृतलाल को इन सबसे क्या! अमृतलाल वही काम करेगा, जिस काम के लिए उसे लाया और बनाया गया है। ट्रेड डील के बाद अब इथेनॉल पॉलिसी दूसरा ऐसा मुद्दा है, जिसकी तह में जाने पर मुझे राहुल गांधी की बात सही लग रही है- Our PM is compromised. गन्नाकरी ब्रो बस इस मौके का लाभ उठाकर पैसे बना रहा है। असली कलप्रिट हमारा अमृतलाल ही है।

(ट्रेड डील की बातें ऑफिशियली बाहर आने पर फिर से लिखूँगा इस विषय पर। डेढ़ किलोमीटर में लिखने के बाद भी बहुत बातें बची रह गयी हैं। इसे शेयर-कॉपी-पेस्ट करने की हमेशा की तरह खुली छूट रहेगी। विषय से बाहर की बकलोली करने या एआई से लिखवाकर स्पैम चिपकाने पर एंटरटेन करने की जगह ब्लॉक कर दिया जायेगा। पोस्ट का पोस्टर बनाया है चैटजीपीटी ब्रो ने।)

06/06/2026

सिस्टम को राम रहीम से दिक्कत नहीं है।
सिस्टम को आशाराम से दिक्कत नहीं है।
सिस्टम को कुलदीप सेंगर से दिक्कत नहीं है।

सिस्टम को पेपर लीक से दिक्कत नहीं है।
सिस्टम को बेरोजगारी से दिक्कत नहीं है।
सिस्टम को आत्महत्या करने वाले छात्रों से कोई दिक्कत नहीं है।

सिस्टम को खराब स्वास्थ्य व्यवस्था से कोई दिक्कत नहीं है।
सिस्टम को खराब शिक्षा व्यवस्था से कोई दिक्कत नहीं हैं।
सिस्टम को गंदे पानी पीते हुए लोगों से कोई दिक्कत नहीं है।

सिस्टम को दिक्कत है तो एक ऐसे शिक्षक से जो फ्री में बच्चों को पढ़ाता है।
लाखों गरीब बच्चों को कम फीस में पढ़ाता है।

कई सारे अस्पताल बनाए हैं जिसमें गरीब लोग कम पैसे में इलाज करवाते हैं।

और सिस्टम को दिक्कत इसलिए है क्योंकि वो दो कौड़ी के गोदी मीडिया को जो दिन रात सिस्टम के गुणगान गाते हैं, सिस्टम को बचाने में लगे रहते हैं उनको एक्पोज करता रहता है।

अगर आने वाले कुछ दिनों में गिरफ्तार होकर जेल चला जाए ना वो शिक्षक तो हैरान मत होना क्योंकि वो कट्टर मुस्लमान नहीं है।

और इस देश की दो कौड़ी की मीडिया व सिस्टम और सिस्टम के नफरती लोग सब दुश्मन हो चुके हैं उन लोगो के जो धर्म से ज्यादा अपने देश के प्रति जबाबदेह हैं और निकम्मी सरकारों से धर्म, जाति को छोड़कर गरीब और असहाय लोगो के लिये सवाल करते है ।
🤔🤭🤫

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