31/08/2018
पेरियार ललई सिंह यादव के जन्मदिन पर
सभी लोगों को हार्दिक बधाईयाँ, धम्मकामनाएँ,
नमो बुद्धाय.... ..............................................................
पेरियार ललई सिंह यादव ऐसे योद्धा का नाम है, जिसने शोषण के
विरुद्ध आवाज बुलंद की और उपेक्षितों को उनका हक दिलाने
के लिए जीवन समर्पित कर दिया। जिला कानपुर के गांव कठारा रेलवे
स्टेशन झींझग के रहने वाले गज्जू सिंह यादव और मूला देवी के
घर 1 सिंतबर 1911 ई. को जन्मे ललई सिंह यादव पर अपने
पिता का पूरा प्रभाव था।
√ 21 जुलाई 1967 को पेरियार ललई सिंह यादव कुशीनगर में
जाकर भदन्त चन्द्रमणि महास्थिविर से दीक्षा लेकर बौद्ध धर्म भी
स्वीकार कर लिया ।
√ ललई सिंह यादव हिंदू धर्म को उधार का धर्म और बौद्ध धर्म को
नकद का धर्म बताते थे। उन्होंने बौद्ध धर्म को नकद का धर्म बताकर
काफी चर्चित किया। तर्क देते हुए कहते थे कि विश्व के सभी देशों
का कानून बौद्ध धर्म पर आधारित हैं। इस लिए सच्चा धर्म बौद्ध
धर्म ही है। वे कहते थे कि आज अच्छे कार्य करो तो अगले जन्म में
बेहतर परिणाम मिलेंगे | पर बौद्ध धर्म में अच्छे काम करो और
तत्काल अच्छे परिणाम भी ले लो। उनकी भाषा में जा हाथ देब और
वा हाथ लेब। ललई सिंह यादव सिर्फ उपदेश ही नहीं देते थे। वह
वैरागी भाव में निर्भीक और निडरता के साथ अपने शुभचिंतकों
पर भी कटाक्ष करतेथे। आगरा में एक सम्मेलन के दौरान उन्होंने
आयोजकों और सम्मेलन में आये लोगों को ही डांटना शुरु कर
दिया। बोले -मेरे पास जो लोग मंच पर बैठे हैं एवं जो लोग सामने बैठे
हैं वह सब सहायताइष्ट, वजीफाइष्ट और रिजर्वेशनाइष्ट हैं,
आप में से कोई भी बौद्धिष्ट नहीं है। बौद्ध धर्म के विद्धानों ने विरोध
किया तो बोले -जब तक आप बौद्धों में रोटी-बेटी का सम्बन्ध नहीं
बनायेंगे और हिंदू रीति- रिवाजों और त्योहारों को मनाना नहीं
छोड़ेंगे तब तक तक आपका बौद्ध होना सिर्फ ढोंग ही है।
अत्त दीपो भव ...
भवतु सब्ब मंगलं....
नमो बुद्धाय....