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अपराजेय कर्ण कितनी बार पराजित हुआ महाकाव्य महाभारत का एक तिरस्कृत तथा विवादित चरित्र है महारथी कर्ण. कर्ण को लेखक एवं कथ...
23/08/2020

अपराजेय कर्ण कितनी बार पराजित हुआ


महाकाव्य महाभारत का एक तिरस्कृत तथा विवादित चरित्र है महारथी कर्ण.



कर्ण को लेखक एवं कथावाचक – सूतपुत्र, ज्येष्ठ पांडव, अत्याचारी दुर्योधन का परम मित्र एवं हितैषी, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर, दानवीर, सुर्यपुत्र, कुंती नंदन इत्यादि नामों से संबोधित करते हैं. यहाँ हम कर्ण के बाकी संबोधनों से परे एक भ्रान्ति पर विचार करेंगे. मैंने अनेकों वाद विवादों, चर्चाओं एवं कथाओं में एक बात समानता से देखी है कि हर लेखक या वाचक कर्ण को विश्व का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर तथा अर्जुन से भी अधिक प्रतिभाशाली तो कहता है, मगर जब भी प्रमाण की बात की जाये तो यही लोग तथ्यहीन तर्कों से अपनी बात मनवाना चाहते हैं. इसमें कोई भी विवाद नहीं है कि कर्ण एक श्रेष्ठ योद्धा था. महारथी कहलाने की सम्पूर्ण योग्यताएं उसमें थीं. धनुर्विद्या उसकी विशेषता थी मगर वह गदा युद्ध, मल्ल, माया, भल्ल्युद्ध की कलाओं के अतिरिक्त व्यूहरचना, भेदनीति में भी पारंगत था. मगर कर्ण अजेय नहीं था. कर्ण का अर्जुन से श्रेष्ठ होना तो बहुत दूर की कौड़ी है, वह अर्जुन के आलावा अनेकों बार अन्य योद्धाओं एवं महारथियों से परास्त हुआ तथा अधिकांश युद्धों में उसके पराजित होने तथा प्राण बचा कर पलायन कर जाने के प्रमाण हैं. यहाँ महाभारत के विभिन्न पर्वों के ऐसे ही कुछ सन्दर्भों का संक्षिप्त वर्णन किया जा रहा है.



वनपर्व में पाण्डव जब द्वैतवन में निर्वासित जीवन शांतिपूर्ण ढंग से व्यतीत कर रहे थे, तब दुर्योधन को कर्ण तथा शकुनी ने परामर्श दिया कि ‘आपने अपने पराक्रम से पांडवों को निर्वासित किया है तथा पूरी पृथ्वी पर इंद्र की तरह से भोग करने का आपका अधिकार है. अतः चलकर द्वैतवन में पांडवों को अपनी श्रेष्ठता दिखानी चाहिए. उनके दुःख एवं द्रौपदी की वल्कालावस्था से अपनी छाती ठंडी करें एवं उन्हें अपने ऐश्वर्य से वहाँ जा कर जलाना चाहिए.’ इसके बाद कौरव अपनी सेना के साथ धृतराष्ट्र से चतुराईपूर्वक अनुमति ले कर द्वैतवन को प्रस्थान करते हैं. वहाँ सरोवर के समीप ही युधिष्ठिर एक यज्ञ कर रहे थे. दुर्योधन ने सरोवर में एक क्रीडाभवन तैयार करने का आदेश दिया. वहीँ सरोवर में गंधर्वराज चित्रसेन अपने सेवकों, देवताओं एवं अप्सराओं सहित जलक्रीडा कर रहे थे. दुर्योधन को यह सहन नहीं हुआ. उसने कर्ण को आगे किया तथा पीछे अपने भाइयों, शकुनी, दु:शासन, विकर्ण तथा सेना के साथ उनसे युद्ध करना शुरू कर दिया. गन्धर्वों ने सबसे पहले कर्ण को परास्त किया जिसमें कि वह विकर्ण के रथ पर वहाँ से पीठ दिखाकर पलायन कर गया. गन्धर्वों ने दुर्योधन को सेनासहित बंदी बना लिया तथा उनकी सभी स्त्रियों पर भी अपना अधिकार बना लिया. ऐसे में पांडवों ने उन सभी को गन्धर्वों से मुक्त कराया.



विराटपर्व में दुर्योधन ने छलपूर्वक विराटनगर की गौओं पर कब्ज़ा कर लिया. पांडव विराटनगर में वेश बदलकर अज्ञातवास कर रहे थे. विराटनगर के कुमार उत्तर ने जोश में भरकर कौरवों को परास्त करने के लिए उनपर आक्रमण करने की ठानी. ऐसे में सैरंध्री रूपी द्रौपदी ने ब्रहन्नला रूपी अर्जुन को उत्तर का सारथी बनाने का परामर्श दिया. अर्जुन उत्तर को युद्धभूमि में ले गए. वहाँ कौरवों की सेना देख कर उत्तर के होश उड़ गए तथा वह रथ छोड़ कर भागने लगा. ऐसे में अर्जुन ने उसे अपना सारथी बनाया तथा अपने अस्त्र, शस्त्र एवं दिव्यास्त्र धारण करके युद्धभूमि में कौरवों से युद्ध किया. अर्जुन द्वारा अपने भाई की वीरगति से खिन्न कर्ण ने उनपर आक्रमण किया. अर्जुन ने कर्ण को बुरी तरह से बींध दिया तथा उसके सारथी, रथ, शस्त्र इत्यादि नष्ट कर दिए. ऐसे में कर्ण पीठ दिखा कर भाग गया. बाद में अर्जुन ने सभी कौरवों को परास्त किया तथा सभी गौओं को छुड़ाया. विराटपर्व में अर्जुन द्वारा कर्ण को दो बार परास्त किया गया तथा दोनों ही बार कर्ण कायरों की तरह वहाँ से पीठ दिखा कर भाग गया.



द्रोणपर्व में एक ही दिन के युद्ध में कर्ण को अर्जुन, भीम, धृष्टद्युम्न तथा सात्यकि द्वारा अलग अलग अवसरों पर परास्त किया. पुनः अगले दिन अभिमन्यु ने कर्ण को परास्त किया जिसमें वह युद्धभूमि से बुरी तरह से पीठ दिखा कर भाग गया. उसी दिन अभिमन्यु ने पुनः आचार्य द्रोण और कर्ण को परास्त किया. सात्यकि ने भी कर्ण को परास्त किया.



द्रोणपर्व में भीम द्वारा कर्ण को बुरी तरह परास्त किया गया जिसमें कि वह वृषसेन के रथ पर भाग गया. इसी दिन भीम ने कर्ण को तीन अलग अलग युद्धों में परास्त किया और हर बार कर्ण को पीठ दिखा कर भागना पड़ा.



अभिमन्यु के छलपूर्वक अनैतिकता द्वारा वध किये जाने के बाद जब अर्जुन जयद्रथ को मारने की प्रतिज्ञा करते हैं, उनका युद्ध अश्वत्थामा, कृपाचार्य, शल्य, दुर्योधन तथा कर्ण से हुआ. इस युद्ध में सभी बुरी तरह से पराजित हुए. इसी दिन भीम ने कर्ण को बहुत दुर्गति में पहुँचाया. बाद में कर्ण ने दुर्योधन से कहा कि ‘प्रचंड प्रहार करने वाले, महान धनुर्धर, वीरवर भीम ने अपने बाणों से मेरे शारीर को बहुत ही जर्जरित कर दिया है. वो तो ‘युद्ध में डटा ही रहना चाहिए’, इस नियम के कारण मैं यहाँ खड़ा हुआ हूँ. भीम के विशाल बाणों से व्यथित होने के कारण मेरे अंगों में हिलने डुलने की शक्ति नहीं है. तथापि अर्जुन जयद्रथ को न मार सके, इस उद्देश्य से मैं यथाशक्ति युद्ध करूँगा क्योंकि मेरा जीवन तो आप ही के लिए है.’



इसी दिन सात्यकि ने कर्ण को बुरी तरह से परस्त किया. मार सकने की परिस्थिति होने के बावजूद सात्यकि ने अर्जुन एवं भीमसेन की प्रतिज्ञा ध्यान करते हुए उसके प्राण नहीं लिए.



युधिष्ठिर ने युद्ध में द्रोण द्वारा ब्रह्मास्त्र प्रयोग को भी निष्फल कर दिया. इसके बाद उनके साथ अर्जुन तथा भीम ने भी दुर्योधन, कर्ण तथा द्रोण को परास्त किया. दुर्योधन द्वारा कर्ण को और अधिक पराक्रम दिखाने की याचना किये जाने पर कर्ण बड़ी बड़ी डींगें हांकने लगा. इसपर आचार्य द्रोण ने उसका उपहास उड़ाया और कहा ‘खूब ! खूब ! कर्ण ! तुम तो बड़े बहादुर हो ! यदि बात बनाने से ही काम हो जाये तब तो तुम्हे पाकर कुरुराज सनाथ हो गए. तुम इनके पास बहुत बढ़ बढ़कर बातें किये करते हो; किन्तु न कभी तुम्हारा पराक्रम ही देखा जाता है और न उसका कोई फल ही सामने आता है. संग्राम में पांडवों से तुम्हारी अनेकों बार मुठभेड़ हुई है, किन्तु सर्वत्र तुमने हार ही खायी है. कर्ण ! याद है कि नहीं ? जब गन्धर्व दुर्योधन को पकड़ कर लिए जा रहे थे, उस समय सारी सेना तो युद्ध कर रही थी और अकेले तुम ही सबसे पहले भागे थे. विराटनगर में भी सम्पूर्ण कौरव इकट्ठे हुए थे, वहाँ अकेले अर्जुन ने सबको हराया था. तुम भी अपने भाइयों के साथ परास्त हुए थे. अकेले अर्जुन का सामना करने की शक्ति तो तुममें है नहीं, फिर श्रीकृष्ण सहित सम्पूर्ण पांडवों को जीतने का साहस कैसे करते हो ! भाई ! चुपचाप युद्ध करो. तुम डींग बहुत हांकते हो. बिना कहे ही पराक्रम दिखाया जाय, यही सत्पुरुषों का व्रत है. जबतक अर्जुन के बाण तुम्हारे ऊपर नहीं पड़ रहे हैं, तभी तक गरज रहे हो. जब उनके बाणों से घायल होओगे तो सारी गर्जना भूल जाएगी. क्षत्रिय बाहुबल में शूर होते हैं; ब्राह्मण वाणी में शूर होते हैं, अर्जुन धनुष चलाने में शूर है, किन्तु कर्ण तो मनसूबे बांधने में ही शूर है.’



इसके पश्चात् कर्ण का अश्वत्थामा से भी विवाद हुआ. गुरु एवं अश्वत्थामा को अपशब्द कहने के कारण कर्ण की बड़ी निंदा हुई. इसके पश्चात् पुनः युद्ध में कर्ण को अर्जुन ने बड़ी बुरी तरह से परास्त किया जिसमें वह कृपाचार्य के रथ में सवार हो कर भाग गया.



द्रोणपर्व में ही घटोत्कच्छ द्वारा अनेकों प्रकार से दुर्गति किये जाने एवं बुरी तरह परास्त होने के बाद कर्ण ने ‘वैजयन्ती’ नामक अमोघ शस्त्र का प्रहार किया. यह वही शक्ति थी जिसे उसने इंद्र से प्राप्त किया था और प्रतिदिन उसकी पूजा करता था. इसे उसने बहुत समय तक अर्जुन को मारने के लिए बचा कर रखा हुआ था, किन्तु घटोत्कच्छ द्वारा युद्ध एकतरफा समाप्त होता देख कर एवं अपनी तथा कौरवों की साक्षात् मृत्यु सन्निकट देख कर उसे अर्जुन के निमित्त रखी शक्ति घटोत्कच्छ पर प्रयोग करनी पड़ी.



यदि महाभारत का गहन अध्ययन करें तो पाएंगे कि कर्ण या एकलव्य को किसी भी समय अर्जुन से तुलना के योग्य नहीं समझा गया है. यह कर्ण का महिमामंडन हिन्दी के महान कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ द्वारा रचित प्रसिद्ध खण्डकाव्य “रश्मिरथी” के फलस्वरूप उदित हुआ है. उन्होंने अपने काव्य में कर्ण के उजले एवं एकपक्षीय चरित्र का वर्णन किया है. कर्ण में दानवीरता का गुण अतुलनीय था. किन्तु इस पक्ष के आलावा कर्ण किसी भी तरह से सर्वश्रेष्ठ कहलाने योग्य नहीं था.

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प्राचीन पुराणों में ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड में सरस्वती के स्वरूप के बारे में वर्णन मिलता है। इनके अनुसार दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री और राधा ये पांच देवियां प्रकृति कहलाती हैं। ये श्रीकृष्ण के विभिन्न अंगों से प्रकट हुई थीं। उस समय उनके कंठ से प्रकट होने वाली वाणी, बुद्धि, विद्या और ज्ञान की जो अधिष्ठात्री देवी हैं उन्हें सरस्वती कहा गया है।

वसंत पंचमी को सरस्वती का आविर्भाव दिवस माना जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण ने देवी सरस्वती को प्रसन्न होकर वरदान दिया था।

वसंत पंचमी के दिन शिवजी ने मां पार्वती को धन और सम्पन्नता की देवी होने का वरदान दिया था। इसलिए मां पार्वती का नील सरस्वती नाम पड़ा।

वसंत पंचमी को सरस्वती पूजन क्यों ?
प्रथम तो वसंत पंचमी को सरस्वती का आविर्भाव दिवस माना जाता है। दूसरे, ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण ने देवी सरस्वती को प्रसन्न होकर वरदान दिया था। इसलिए यह मां सरस्वती के जन्मोत्सव व सरस्वती पूजन का महत्ती पर्व है। इस दृष्टि से सरस्वती के प्राकट्य के पीछे जो कथा प्रचलित है। कहते हैं जब प्रजापिता ब्रह्मा ने भगवान विष्णु की आज्ञा से सृष्टि की रचना की तो वे एक बार उसे देखने निकले, देखा तो सर्वत्र उदासी दिखी।

सन्नाटा व उदासीभरा वातावरण देखकर उन्हें लगा जैसे किसी के पास वाणी ही न हो। उस उदासी को दूर करने के प्रयोजन से उन्होंने कमंडल से चारों तरफ जल छिडक़ा। जलकण वृक्षों पर पड़े। वृक्षों से एक देवी प्रकट हुई जिनके चार हाथ थे। दो हाथों से वीणा साधे हुए थी। शेष दो हाथों में से एक हाथ में पुस्तक और दूसरे में माला थी। संसार की मूकता को दूर करने के लिए ब्रह्माजी ने देवी से वीणा बजाने को कहा। वीणा के मधुर नाद से सभी जीवों को वाणी (वाक्शक्ति) मिल गई। सप्तविध स्वरों का ज्ञान प्रदान करने के कारण इनका नाम सरस्वती पड़ा।

इस दिन का है विशेष महत्त्व
इस दिन भगवान श्रीराम शबरी के आश्रम में पधारे थे तो वही वाल्मीकि को सरस्वती मंत्र, कालिदास द्वारा भगवती उपासना आदि इस दिन के महत्त्व को दर्शाते हैं। मत्स्य पुराण में सरस्वती विवाह के प्रसंग हैं तो दूसरी ओर संगीत की देवी की आराधना का महत्त्व भी कम नहीं है। इस दिन कवि, लेखक, गायक, वादक, साहित्यकार आदि से अपने कार्य आरम्भ करते हैं तो वही सैनिक अपने उपकरणों को पूजते हैं। सर्ग सृष्टि का इस दिन से आरम्भ होने के कारण यह संवत्सर का सिर और कल्प पर्व का पर्याय है। यह सारस्वतीय शक्तियों को पुनर्जागृत का दिन है।

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