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13/11/2023
27/10/2021

'गो' शब्द के अनेक अर्थों में एक अर्थ इन्द्रिय भी होता है। जिस घर में गायें रहती हैं, वह गोशाला कहलाता है। यह देह भी एक प्रकार की गोशाला है। इस शरीर -रूपी गृह में इन्द्रियरूपी गौएँ रहती हैं। गायें घास चरती हैं, इन्द्रियाँ विषयों को ग्रहण करती हैं। भूमिस्थ गोशाला की गायों को हम दाना-खल्ली ,घास, जल आदि खिलाते - पिलाते हैं। शरीरस्थ इन्द्रिरूपी गौऔं को रूप, रस, गन्ध , स्पर्श और शब्दरूपी विषयों का भोजन देते हैं ।
-संत सद्गुरु महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज

22/10/2021

!! चिंता !!
एक राजा की पुत्री के मन में वैराग्य की भावनाएं थीं। जब राजकुमारी विवाह योग्य हुई तो राजा को उसके विवाह के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा था।
राजा ने पुत्री की भावनाओं को समझते हुए बहुत सोच-विचार करके उसका विवाह एक गरीब संन्यासी से करवा दिया। राजा ने सोचा कि एक संन्यासी ही राजकुमारी की भावनाओं की कद्र कर सकता है।
विवाह के बाद राजकुमारी खुशी-खुशी संन्यासी की कुटिया में रहने आ गई। कुटिया की सफाई करते समय राजकुमारी को एक बर्तन में दो सूखी रोटियां दिखाई दीं। उसने अपने संन्यासी पति से पूछा कि रोटियां यहां क्यों रखी हैं? संन्यासी ने जवाब दिया कि ये रोटियां कल के लिए रखी हैं, अगर कल खाना नहीं मिला तो हम एक-एक रोटी खा लेंगे। संन्यासी का ये जवाब सुनकर राजकुमारी हंस पड़ी। राजकुमारी ने कहा कि मेरे पिता ने मेरा विवाह आपके साथ इसलिए किया था, क्योंकि उन्हें ये लगता है कि आप भी मेरी ही तरह वैरागी हैं, आप तो सिर्फ भक्ति करते हैं और कल की चिंता करते हैं।
सच्चा भक्त वही है जो कल की चिंता नहीं करता और भगवान पर पूरा भरोसा करता है। अगले दिन की चिंता तो जानवर भी नहीं करते हैं, हम तो इंसान हैं। अगर भगवान चाहेगा तो हमें खाना मिल जाएगा और नहीं मिलेगा तो रातभर आनंद से प्रार्थना करेंगे।
ये बातें सुनकर संन्यासी की आंखें खुल गई। उसे समझ आ गया कि उसकी पत्नी ही असली संन्यासी है। उसने राजकुमारी से कहा कि आप तो राजा की बेटी हैं, राजमहल छोड़कर मेरी छोटी सी कुटिया में आई हैं, जबकि मैं तो पहले से ही एक फकीर हूं, फिर भी मुझे कल की चिंता सता रही थी। सिर्फ कहने से ही कोई संन्यासी नहीं होता, संन्यास को जीवन में उतारना पड़ता है। आपने मुझे वैराग्य का महत्व समझा दिया।
शिक्षा:
अगर हम भगवान की भक्ति करते हैं तो विश्वास भी होना चाहिए कि भगवान हर समय हमारे साथ है। उसको (भगवान) हमारी चिंता हमसे ज्यादा रहती हैं।
कभी आप बहुत परेशान हों, कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा हो तो आप आँखें बंद करके विश्वास के साथ पुकारें, सच मानिये थोड़ी देर में आपकी समस्या का समाधान मिल जायेगा।
सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

17/10/2021

संतमत का अर्थ है - संतो का मत 🌻
इसलिए संत तुलसी साहब ने कहा है-
"संत गुरु और पंथ न जाना। ये ही संत पंथ हित माना।।"
संतों के ज्ञान से अनजान जन का कथन था - "संतो का ज्ञान वेद बाह्य है।" और वेद-ज्ञान-विहीन जन का वचन था कि 'संतों के उच्चतम ज्ञान वेद से हीन है ।' इस भाँति अपनी हीन भावना के कारण वे एक- दूसरे को हीन दृष्टि से देखा करते थे। इस हेतु दोनों के बीच जो हृदय की दूरी बढ़ गई थी - बढ़ती जा रही थी, संतमत इस दूरी को भरपूर दूर करता है अर्थात् उभय के वैमनस्य को मिटाकर परस्पर सामंजस्य स्थापित करता है।
संतमत का उद्घोष है कि संतो और वेदों का आध्यात्मिक-ज्ञान अभिन्न है। अर्थात् पूर्व के संतगण ईश्वर संबंधी ज्ञान जो दे गए हैं और वर्तमान काल में जो संत उस आधार पर ज्ञान दे रहे हैं, वह वेद में विद्यमान है। आवश्यकता है उसकी खोज की। संत कबीर साहब की वाणी में -
जिन ढूँढा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ।
मैं बौरी बूड़न डरी, रही किनारे बैठ॥
ऋषियों एवं संतों की वाणी का अध्ययन और अनुशीलन करने पर परस्पर अद्भुत साम्य का बोध होता है। संत दादू दयाल जी की उदात्त भावना में हम कह सकेंगे -
जे पहुँचे ते कहि गये, तिनकी एकै बाति।
सबै सयाने एक मत, तिनकी एकै जाति।।
परम प्रभु सर्वेश्वर ने देखने के लिए सबको दृष्टि दी है। देखते सभी हैं; किंतु अपनी-अपनी दृष्टि से। अर्थात् अपने अर्जित ज्ञान के आधार पर ही देखते हैं - देख सकते हैं।
मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि लोगों के दृष्टिकोण में भिन्नता हो सकती है; परंतु वस्तुतः तत्व एक ही है । इसी तरह संतों एवं ऋषियों का ज्ञान एक ही है, आज भले ही हम उसे भिन्न-भिन्न दृष्टियों से देखें; किंतु मैं तो दृढ़तापूर्वक कहूँगा कि संतों एवं ऋषियों का ज्ञान एक है और उन्हें देखने के लिए हमको उनकी ही दृष्टि अपनानी आवश्यक है अर्थात् उन ऋषियों एवं संतो की पूत वाणी की अभिज्ञता के लिए हमारी दृष्टि पवित्र होनी चाहिए। हम विवेक-विलोचन प्राप्त कर ही उनकी वाणियों के यथार्थ रूप का अवलोकन कर पाएँगे, अन्यथा नहीं।
अतएव आवश्यकता है हम उनकी वाणियों का अध्ययन, श्रवण और मनन करें। उनके शब्दार्थो और गूढ़ाशयों को जानें। साथ ही संतों के परिभाषिक शब्दों, उनके रहस्य वाणियों और तत्संबंधी साधना का परिज्ञान कर नित्य नियमित रूप से निदिध्यासन भी करें।
- संत सद्गुरु महर्षि संतसेवी परमहंसजी महाराज

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06/12/2018

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