25/11/2025
माड़वी हिड़मा के एनकाउंटर से छत्तीसगढ़ में पूंजीवादियों का तो विकास के कई रास्ते खुल सकते हैं..
लेकिन आतंकवादी/नक्सलवादी/पाखंडवादी/जातिवादी जैसे समस्या कभी खत्म नहीं हो सकती है..!
सवाल हिड़मा के मौत का नहीं है...सवाल उस सोच और सिस्टम का है जो हर बार गरीब को ही लड़ाई में धकेल देता है। अगर नक्सलवाद को सच में खत्म करना है, तो सिर्फ नक्सली लीडर मारने से नक्सलवाद खत्म होगा ऐसा वहम पालना बिल्कुल साफ ग़लत बात है, नक्सलवाद खत्म करने के लिए पहले उनके सिस्टम को बदलना होगा नक्सलवाद अपने आप खत्म हो जाएगा।
१. जंगल इलाकों में स्कूल खोलने होंगे
२. नौकरियां देनी होंगी
३. आदिवासियों की आवाज़ को सम्मान देना होगा
४. आदिवासियों की जल,जंगल, जमीन की रक्षा करनी होगी।
वर्ना एक हिड़मा जाएगा, सौ हिड़मा और पैदा हो जाएगा। मजबूरी में गरीब बंदूक उठाता है, अमीर सिस्टम उठा लेता है।
याद रहे - हिड़मा का केवल शरीर मरा है उनके विचार नहीं कुछ दिन शांत रह सकता है पर जुल्म होने से फिर नई पीढ़ी इसके विचार को नई रूप देने में ताकत बस्तर का माटी जरूर रखेगी।
क्या वास्तव में हिड़मा नक्सली था इसलिए उनका एनकाउंटर किया गया एवं अब समस्या खत्म हो गया?
- ऐसा कुछ भी नहीं है हमारे आजाद भारत के भारतीय संविधान में स्वतंत्र रूप से जीने के लिए स्वतंत्रता दी गई है लेकिन हम अब भी सरकार की नितियों व नियमों से गुलामी की जंजीरों में बंधे हुए हैं।
यह भारत सरकार कौन है? यहां नियम नीति किसके विकास और किनके विनाश के लिए बन रही है, यह आजादी, स्वतंत्रता की भाषा व अर्थ सिर्फ वही समझ सकता है जिनके पूर्वज आजादी से जिया हो, एवं वर्तमान में जिसने किसी एक दिन भी आजादी व स्वतंत्रता की सांस ली हो..
हम आदिवासियों की धरती है जिसे भारत कहते हैं जो बाहरी के साथ-साथ मनुवादी मानसिकता से ग्रसीत लोग नहीं समझ पाएंगे इस धरती के लिए हम आदिवासियों ने आजादी से जीने व भारत को संवारने के लिए कितने खून पसीना बहाए हैं।
हिड़मा कौन था?
- हिड़मा खुली हवा में आजादी, स्वतंत्रता से सांस लेने व दिलाने वाले स्वतंत्रता सेनानी था।