Uttar Pradesh Lekhpal Sangh

Uttar Pradesh Lekhpal Sangh A PLACE FOR ALL LEKHPAAL TO SHARE THERE EXPERIENCES. A UNION FOR UTTAR PADESH LEKHPAL SANGH MEMBERS…

28/11/2025

*लेखपाल सुधीर की मौत—सिस्टम की बेरुखी का खून से लिखा सच**

उत्तर प्रदेश के जनपद फतेहपुर में लेखपाल श्री सुधीर को प्रशासन द्वारा विशेष प्रगण पुनरीक्षण कार्य (SIR) के असहनीय दबाव, धमकी और मानसिक प्रताड़ना के कारण अपनी जान देने जैसा भयावह कदम उठाना पड़ा।

लेकिन यह सिर्फ एक आत्महत्या नहीं…
यह पूरे सिस्टम की असंवेदनशीलता की लानत है।
एक ज़िंदादिल, सरल स्वभाव के युवक के सपने चकनाचूर कर दिए गए।

सबसे दर्दनाक सच्चाई यह है कि—
श्री सुधीर का विवाह 26 नवंबर को होना था।
जिस घर में आज शादी की शहनाइयाँ बजनी थीं,
वहाँ अब चीखें हैं, मातम है, टूटे सपने हैं।
एक परिवार, एक होने वाली दुल्हन, पूरे समाज का भविष्य
एक आदेश, एक धमकी, एक अधिकारी के दबाव ने निगल लिया।
क्या प्रशासन को इतना भी एहसास नहीं कि कर्मचारी भी भावनाएँ रखते हैं?

उपजिलाधिकारी श्री संजय कुमार सक्सेना और राजस्व निरीक्षक श्री शिवराम द्वारा बार–बार डाला गया SIR का अत्यधिक दबाव इतना बढ़ गया कि सुधीर मानसिक रूप से टूट गए।

जिस युवक का मेहंदी का रंग चढ़ना था,
वह अपने जीवन की आखिरी लकीर लिखकर चला गया—
और प्रशासन ने इसे “संपूर्ण” मान लिया?

किसी भी आदेश, किसी भी कार्य, किसी भी लक्ष्य से बड़ा
क्या एक इंसान का जीवन नहीं?
क्या किसी अधिकारी का अहंकार इतना बड़ा हो सकता है
कि वह किसी की आने वाली शादी, सपने और भविष्य पर भारी पड़ जाए?
धरना-प्रदर्शन: पीड़ा का विस्फोट, न्याय की गूंज

तहसील सहावर, जनपद कासगंज में आज लेखपाल साथियों ने भारी विरोध प्रदर्शन कर प्रशासन की संवेदनहीनता के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद की।
यह सिर्फ आक्रोश नहीं था—
यह व्यवस्था को जगाने की अंतिम कोशिश थी।

उनके चेहरे पर गुस्सा नहीं…
दर्द था, असहायता थी, एक साथी को खोने की पीड़ा थी।
सुधीर की आखिरी उम्मीद—क्या किसी ने समझने की कोशिश की?

वह सिर्फ एक लेखपाल नहीं था।
वह एक बेटा था…
एक जिम्मेदार अधिकारी था…
और सबसे बढ़कर—
एक दूल्हा बनने वाला इंसान था।

उसकी शादी की तैयारियाँ चल रही थीं—
घर में रंगाई–पुताई, रिश्तेदारों का इंतजार,
नए कपड़े, कार्ड, खुशी की हलचल…
सब कुछ अचानक एक शवयात्रा में बदल गया।

क्या प्रशासन के किसी अधिकारी ने सोचा होगा
कि उनके द्वारा डाला गया दबाव
किसी की सुहाग की सेज को मौत की सेज में बदल सकता है?

प्रशासन से मांगें—अब सिर्फ मांग नहीं, यह न्याय की पुकार है

1. दोषी अधिकारियों पर कड़ी और तत्काल कार्रवाई।

2. SIR जैसे कार्यों में दबाव, धमकी और अपमान की नीति पर पूर्ण रूप से रोक।

3. राजस्व कर्मचारियों के लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और मानवीय कार्य वातावरण।

4. मानसिक उत्पीड़न की घटनाओं को “साधारण कार्य” समझने की प्रवृत्ति समाप्त हो।

5. ऐसे मामलों को “इंसिडेंट” नहीं, बल्कि “प्रशासनिक हत्या” की तरह देखा जाए।---

अंत में…

आज सुधीर नहीं है,
उसकी दुल्हन के हाथों की मेहंदी सूख गई,
उसकी माँ का कलेजा फट गया,
और पूरा राजस्व परिवार सदमे में है।

अगर अब भी प्रशासन नहीं जागा,
तो याद रखिए—
कल कोई और सुधीर इस सिस्टम की बलि चढ़ जाएगा।

समय आ गया है कि प्रशासन अपने भीतर झाँके और
कर्मचारियों को इंसान समझे—not machines.

16/11/2025
विभिन्न जिलों और तहसीलों से आज के धरना प्रदर्शन की कुछ झलकियां
15/11/2025

विभिन्न जिलों और तहसीलों से आज के धरना प्रदर्शन की कुछ झलकियां

19/02/2020

जय हिंद जय भारत
जय संबिधान जय विज्ञान
छत्रपती शिवाजी महाराज (1630-1680 ई.) भारत के एक महान राजा एवं रणनीतिकार थे जिन्होंने 1674 ई. में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी। उन्होंने कई वर्ष औरंगज़ेब के मुगल साम्राज्य से संघर्ष किया। सन् 1674 में रायगढ़ में उनका राज्यभिषेक हुआ और वह "छत्रपति" बने।छत्रपती शिवाजी महाराज ने अपनी सभी जातियो के लोगो को भर्ती किया अनुशासित सेना एवं सुसंगठित प्रशासनिक इकाइयों कि सहायता से एक योग्य एवं प्रगतिशील प्रशासन प्रदान किया। उन्होंने समर-विद्या में अनेक नवाचार किये तथा छापामार युद्ध (Gorilla War) की नयी शैली विकसित की। उन्होंने प्राचीन हिन्दू राजनीतिक प्रथाओं तथा दरबारी शिष्टाचारों को पुनर्जीवित किया और फारसी के स्थान पर मराठी एवं संस्कृत को राजकाज की भाषा बनाया।।
आपके जन्म दिवस पर शत शत नमन
हमारा देश वीर शासको और राजाओं की पृष्ठभूमि रहा है. इस धरती पर ऐसे महान शासक पैदा हुए है जिन्होंने अपनी योग्यता और कौशल के दम पर इतिहास में अपना नाम बहुत ही स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज किया है. ऐसे ही एक महान योद्धा और रणनीतिकार थे – छत्रपति शिवाजी महाराज. वे शिवाजी महाराज ही थे जिन्होंने भारत में मराठा साम्राज्य की नीवं रखी थीं.

शिवाजी जी ने कई सालों तक मुगलों के साथ युद्ध किया था. सन 1674 ई. रायगड़ महाराष्ट्र में शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक किया गया था, तब से उन्हें छत्रपति की उपाधि प्रदान की गयी थीं. इनका पूरा नाम शिवाजी राजे भोसलें था और छत्रपति इनको उपाधि में मिली थी. शिवाजी महाराज ने अपनी सेना, सुसंगठित प्रशासन इकाईयों की सहायता से एक योग्य एवं प्रगतिशील प्रशासन प्रदान किया था.

शिवाजी महाराज ने भारतीय सामाज के प्राचीन हिन्दू राजनैतिक प्रथाओं और मराठी एवं संस्कृत को राजाओं की भाषा शैली बनाया था. शिवाजी महाराज अपने शासनकाल में बहुत ही ठोस और चतुर किस्म के राजा थे. लोगो ने शिवाजी महाराज के जीवन चरित्र से सीख लेते हुए भारत की आजादी में अपना खून तक बहा दिया था.

शिवाजी महाराज की जीवनी

पूरा नाम – शिवाजी राजे भोंसले
उप नाम – छत्रपति शिवाजी महाराज
जन्म – 19 फ़रवरी 1630, शिवनेरी दुर्ग, महाराष्ट्र
मृत्यु – 3 अप्रैल 1680, महाराष्ट्र
पिता का नाम – शाहजी भोंसले
माता का नाम – जीजाबाई
शादी – सईबाई निम्बालकर के साथ, लाल महल पुणे में सन 14 मई 1640 में हुई.
शिवाजी महाराज का आरम्भिक जीवन :

शिवाजी महाराज का जन्म 19 फ़रवरी 1630 में शिवनेरी दुर्ग में हुआ था. इनके पिता का नाम शाहजी भोसलें और माता का नाम जीजाबाई था. शिवनेरी दुर्ग पुणे के पास हैं, शिवाजी का ज्यादा जीवन अपने माता जीजाबाई के साथ बीता था. शिवाजी महाराज बचपन से ही काफी तेज और चालाक थे. शिवाजी ने बचपन से ही युद्ध कला और राजनीति की शिक्षा प्राप्त कर ली थी.

भोसलें एक मराठी कुंर्मी समाज की एक कृषक जाति हैं. शिवाजी के पिता भी काफी तेज और शूरवीर थे. शिवाजी महाराज के लालन-पालन और शिक्षा में उनके माता और पिता का बहुत ही ज्यादा प्रभाव रहा हैं. उनके माता और पिता शिवाजी को बचपन से ही युद्ध की कहानियां तथा उस युग की घटनाओं को बताती थीं. खासकर उनकी माँ उन्हें रामायण और महाभारत की प्रमुख कहानियाँ सुनाती थी जिन्हें सुनकर शिवाजी के ऊपर बहुत ही गहरा असर पड़ा था. शिवाजी महाराज की शादी सन 14 मई 1640 में सईबाई निम्बलाकर के साथ हुई थीं.

शिवाजी महाराज का सैनिक वर्चस्व :

सन 1640 और 1641 के समय बीजापुर महाराष्ट्र पर विदेशियों और राजाओं के आक्रमण हो रहे थें. शिवाजी महाराज मावलों को बीजापुर के विरुद्ध इकट्ठा करने लगे. मावल राज्य में सभी जाति के लोग निवास करते हैं, बाद में शिवाजी महाराज ने इन मावलो को एक साथ आपस में मिलाया और मावला नाम दिया. इन मावलों ने कई सारे दुर्ग और महलों का निर्माण करवाया था.

इन मावलो ने शिवाजी महाराज का बहुत भी ज्यादा साथ दिया. बीजापुर उस समय आपसी संघर्ष और मुगलों के युद्ध से परेशान था जिस कारण उस समय के बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह ने बहुत से दुर्गो से अपनी सेना हटाकर उन्हें स्थानीय शासकों के हाथों में सौप दी दिया था.


तभी अचानक बीजापुर के सुल्तान बीमार पड़ गए थे और इसी का फायदा देखकर शिवाजी महाराज ने अपना अधिकार जमा लिया था. शिवाजी ने बीजापुर के दुर्गों को हथियाने की नीति अपनायी और पहला दुर्ग तोरण का दुर्ग को अपने कब्जे में ले लिया था.

शिवाजी महाराज का किलों पर अधिकार :

तोरण का दुर्ग पूना (पुणे) में हैं. शिवाजी महाराज ने सुल्तान आदिलशाह के पास अपना एक दूत भेजकर खबर भिजवाई की अगर आपको किला चाहिए तो अच्छी रकम देनी होगी, किले के साथ-साथ उनका क्षेत्र भी उनको सौपं दिया जायेगा. शिवाजी महाराज इतने तेज और चालाक थे की आदिलशाह के दरबारियों को पहले से ही खरीद लिया था.

शिवाजी जी के साम्राज्य विस्तार नीति की भनक जब आदिलशाह को मिली थी तब वह देखते रह गया. उसने शाहजी राजे को अपने पुत्र को नियंत्रण में रखने के लिये कहा लेकिन शिवाजी महाराज ने अपने पिता की परवाह किये बिना अपने पिता के क्षेत्र का प्रबन्ध अपने हाथों में ले लिया था और लगान देना भी बंद कर दिया था.

वे 1647 ई. तक चाकन से लेकर निरा तक के भू-भाग के भी मालिक बन चुके थें. अब शिवाजी महाराज ने पहाड़ी इलाकों से मैदानी इलाकों की और चलना शुरू कर दिया था. शिवाजी जी ने कोंकण और कोंकण के 9 अन्य दुर्गों पर अपना अधिकार जमा लिया था. शिवाजी महाराज को कई देशी और कई विदेशियों राजाओं के साथ-साथ युद्ध करना पड़ा था और सफल भी हुए थे.

शाहजी की बंदी और युद्ध बंद करने की घोषणा :

बीजापुर के सुल्तान शिवाजी महाराज की हरकतों से पहले ही गुस्से में था. सुल्तान ने शिवाजी महाराज के पिता को बंदी बनाने का आदेश दिया था. शाहजी उनके पिता उस समय कर्नाटक राज्य में थें और दुर्भाग्य से शिवाजी महाराज के पिता को सुल्तान के कुछ गुप्तचरों ने बंदी बना लिया था. उनके पिता को एक शर्त पर रिहा किया गया कि शिवाजी महाराज बीजापुर के किले पर आक्रमण नहीं करेगा. पिताजी की रिहाई के लिए शिवाजी महाराज ने भी अपने कर्तव्य का पालन करते हुए 5 सालों तक कोई युद्ध नहीं किया और तब शिवाजी अपनी विशाल सेना को मजबूत करने में लगे रहे.

शिवाजी महाराज का राज्य विस्तार :

शाहजी की रिहा के समय जो शर्ते लागू की थी उन शर्तो में शिवाजी ने पालन तो किया लेकिन बीजापुर के साउथ के इलाकों में अपनी शक्ति को बढ़ाने में ध्यान लगा दिया था पर इस में जावली नामक राज्य बीच में रोड़ा बना हुआ था. उस समय यह राज्य वर्तमान में सतारा महाराष्ट्र के उत्तर और वेस्ट के कृष्णा नदी के पास था. कुछ समय बाद शिवाजी ने जावली पर युद्ध किया और जावली के राजा के बेटों ने शिवाजी के साथ युद्ध किया और शिवाजी ने दोनों बेटों को बंदी बना लिया था और किले की सारी संपति को अपने कब्जे में ले लिया था और इसी बीच कई मावल शिवाजियो के साथ मिल गए थे.

शिवाजी महाराज का मुगलों से पहला मुकाबला :

मुगलों के शासक औरंगजेब का ध्यान उत्तर भारत के बाद साउथ भारत की तरफ गया. उसे शिवाजी के बारे में पहले से ही मालूम था. औरंगजेब ने दक्षिण भारत में अपने मामा शाइस्ता खान को सूबेदार बना दिया था. शाइस्ता खान अपने 150,000 सैनिकों को लेकर पुणे पहुँच गया और उसने 3 साल तक लूटपाट की.

एक बार शिवाजी ने अपने 350 मावलो के साथ उनपर हमला कर दिया था तब शाइस्ता खान अपनी जान निकालकर भाग खड़ा हुआ और शाइस्ता खान को इस हमले में अपनी 4 उँगलियाँ खोनी पड़ी. इस हमले में शिवाजी महाराज ने शाइस्ता खान के पुत्र और उनके 40 सैनिकों का वध कर दिया था. उसके बाद औरंगजेब ने शाइस्ता खान को दक्षिण भारत से हटाकर बंगाल का सूबेदार बना दिया था.

जब हुई सूरत में लूट :

इस जीत से शिवाजी की शक्ति ओर मजबूत हो गयी थीं. लेकिन 6 साल बाद शाइस्ताखान ने अपने 15,000 सैनिको के साथ मिलकर राजा शिवाजी के कई क्षेत्रो को जला कर तबाह कर दिया था. बाद में शिवाजी ने इस तबाही को पूरा करने के लिये मुगलों के क्षेत्रों में जाकर लूटपाट शुरू कर दी. सूरत उस समय हिन्दू मुसलमानों का हज पर जाने का एक प्रवेश द्वार था. शिवाजी ने 4 हजार सैनिको के साथ सूरत के व्यापारियों को लुटा लेकिन उन्होंने किसी भी आम आदमी को अपनी लुट का शिकार नहीं बनाया.

आगरा में आमन्त्रित और पलायन :

शिवाजी महाराज को आगरा बुलाया गया जहाँ उन्हें लगा कि उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया गया है. इसके खिलाफ उन्होंने अपना रोष दरबार पर निकाला और औरंगजेब पर छल का आरोप लगाया. औरंगजेब ने शिवाजी को कैद कर लिया था और शिवाजी पर 500 सैनिको का पहरा लगा दिया. कुछ ही दिनों बाद 1666 को शिवाजी महाराज को जान से मारने का औरंगजेब ने इरादा बनाया था लेकिन अपने बेजोड़ साहस और युक्ति के साथ शिवाजी और संभाजी दोनों कैद से भागने में सफल हो गये.

संभाजी को मथुरा में एक ब्राह्मण के यहाँ छोड़ कर शिवाजी महाराज बनारस चले गये थे और बाद में सकुशल राजगड आ गये. औरंगजेब ने जयसिंह पर शक आया और उसने विष देकर उसकी हत्या करा दी. जसवंत सिंह के द्वारा पहल करने के बाद शिवाजी ने मुगलों से दूसरी बार संधि की. 1670 में सूरत नगर को दूसरी बार शिवाजी ने लुटा था, यहाँ से शिवाजी को 132 लाख की संपति हाथ लगी और शिवाजी ने मुगलों को सूरत में फिर से हराया था.

शिवाजी महाराज का राज्यभिषेक :

सन 1674 तक शिवाजी ने उन सारे प्रदेशों पर अधिकार कर लिया था जो पुरंदर की संधि के अन्तर्गत उन्हें मुगलों को देने पड़े थे. बालाजी राव जी ने शिवाजी का सम्बन्ध मेवाड़ के सिसोदिया वंश से मिलते हुए प्रमाण भेजे थें. इस कार्यक्रम में विदेशी व्यापारियों और विभिन्न राज्यों के दूतों को इस समारोह में बुलाया था. शिवाजी ने छत्रपति की उपाधि धारण की और काशी के पंडित भट्ट को इसमें समारोह में विशेष रूप से बुलाया गया था. शिवाजी के राज्यभिषेक करने के 12वें दिन बाद ही उनकी माता का देहांत हो गया था जो कि एक रहस्य ही रहा और फिर दूसरा राज्याभिषेक हुआ जिसमे उनका सम्बन्ध जोड़ते हुए अष्टप्रधान बनाने पड़े

शिवाजी महाराज की मृत्यु और वारिस :

शिवाजी अपने आखिरी दिनों में बीमार पड़ गये थे और 3 अप्रैल 1680 में शिवाजी की मृत्यु हो गयी थी. उसके बाद उनके पुत्र को राजगद्दी मिली. उस समय मराठों ने शिवाजी को अपना नया राजा मान लिया था. शिवाजी की मौत के बाद औरंगजेब ने पुरे भारत पर राज्य करने की अभिलाषा को पूरा करने के लिए अपनी 5,00,000 सेना को लेकर दक्षिण भारत का रूख किया.

1700 ई. में राजाराम की मृत्यु हो गयी थी उसके बाद राजाराम की पत्नी ताराबाई ने 4 वर्ष के पुत्र शिवाजी 2 की सरंक्षण बनकर राज्य किया. आखिरकार 25 साल मराठा स्वराज के युद्ध थके हुए औरंगजेब की उसी छत्रपति शिवाजी के स्वराज में दफन किये गये.

शिवाजी महाराज का शासन और व्यक्तिगत :

छत्रपति महराज को एक कुशल और प्रबल सम्राट के रूप में जाना जाता हैं. शिवाजी को बचपन में शुरूआती शिक्षा ठीक नहीं मिल पायी थी. लेकिन शिवाजी जी भारतीय इतिहास और राजनीति से परिचित थे. शिवाजी ने शुक्राचार्य और कौटिल्य को आदर्श मानकर कूटनीति का सहारा लेना कई बार ठीक समझा था. शिवाजी महाराज एक तेज और चालाक शासक थे. वे समकालीन मुगलों की तरह कुशल थे. मराठा साम्राज्य 4 भागों में विभाजित था. हर राज्य मे एक सूबेदार होता था जिसको प्रान्तपति कहा जाता था. हर सूबेदार के पास भी एक अष्ट-प्रधान समिति होती थीं.

शिवाजी महाराज की धार्मिक नीति :

शिवाजी महाराज एक दृढ धार्मिक व्यक्ति थे. उनके साम्राज्य में मुसलमानों को धार्मिक आजादी थीं. शिवाजी महाराज कई मुसलमानों के मस्जिदों आदि के निर्माण कार्यो के लिये भी अनुदान देते थे. उनके द्वारा हिन्दू पंडितो, मुसलमानों, संत और फकीरों को सम्मान प्राप्त था. शिवाजी सभी को सम्मान और बल देते थे. शिवाजी ने मानवतावादी मूल्यों और शिक्षा पर भी जोर दिया था एव अपनी सेना में जातिवाद के विरोध में सभी जातियो को भर्ती किया हमेशा विजयी रहे

शिवाजी महाराज का चरित्र :

शिवाजी को अपने पिता से ही शिक्षा मिली थीं, जब उनके पिता को उस समय के सुल्तान बीजापुर के शाह के साथ संधि भी की थीं. शिवाजी ने अपने पिता की हत्या नहीं की अक्सर कई शासक करते हैं. शिवाजी जी की गनिमी कावा नामक कूटनीति जिसमे दुश्मन पर अचानक युद्ध करके उसे परास्त किया जाता था. इस लिये शिवाजी महाराज को एक महान शासक के रूप में याद किया जाता हैं.

कुछ तिथियों के समय घटनाएँ –

* 1594 में शिवाजी महाराज के पिता जी शाहजी भोसलें का जन्म
* 1596 में शिवाजी की माँ का जन्म
* 1627 छत्रपति शिवाजी का जन्म
* 1630 से लेकर 1631 तक महाराष्ट्र राज्य में अकाल की समस्या पैदा हुई थीं
* 1640 में शिवाजी महाराज और साईं-बाई का विवाह
* 1646 में शिवाजी जी ने पुणे के तोरण दुर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया था
* 1656 में शिवाजी ने चंद्रराव मोरे से जावली जीता था
* 1659 में छत्रपति शिवाजी ने अफजल खान का वध किया था
* 1659 के समय शिवाजी ने बीजापुर पर अधिकार किया था
* 1666 में शिवाजी महाराज आगरा के जेल से भाग निकले थें
* 1668 शिवाजी और औरंगजेब के बीच एक संधि
* 1670 में दूसरी बार सूरत पर हमला किया था
* 1674 शिवाजी महाराज को छत्रपति की उपाधि से सम्मानित किया गया था
* 1680 में छत्रपति शिवाजी महाराज की मृत्यु

आज भले ही हम सब के बीच शिवाजी महाराज का इतिहास ही रह गया हो लेकिन उनक जीवन चरित्र आज भी हर व्यक्ति के लिए एक प्रेरणा है. अगर कुछ बड़ा करने की जिद हो तो उसे पाना आसान हो जाता है. शिवाजी महाराज की तरह हमें भी अपना जीवन सामान्य जीने के बदले महान बनाना चाहिए और कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे इस समाज का भला हो सके और हमारा देश उन्नति कर सके.
अपने महान पूर्वज को शत शत नमन

जिसमें अपडेट का ऑप्शन नही आ रहा है वो पुराने वाले app को unstall करके प्लेस्टोर पे जा के इस लिंक पे नया डाउनलोड कर लें
09/01/2020

जिसमें अपडेट का ऑप्शन नही आ रहा है वो पुराने वाले app को unstall करके प्लेस्टोर पे जा के इस लिंक पे नया डाउनलोड कर लें

09/01/2020

सभी लेखपाल साथियों को सूचित किया जाता है कि e lekhpal कृष्णकांत गंगवार unofficial वाली साइट को प्लेस्टोर से जा कर अपडेट कर ले उसके बाद edistrict पे रिपोर्ट लगने लगेगी।धन्यवाद।🙏🙏

14/11/2018

लेखपाल संघ उ0प्र0 के 56 वें स्थापना दिवस की आप सभी को हार्दिक बधाई🙏🙏

19/08/2018

आदरणीय साथियो उत्तर प्रदेश लेखपाल संघ के 32000 साथियो की कमान संभाले प्रांन्त कार्यकरिणी आदरणीय अध्यक्ष जी महामंत्री जी जोन उपाध्यक्ष जी संगठन मंत्री जी कोषाध्यक्ष जी ऑडिटर जी खण्ड मंन्त्री जी के साथ इतना बडे संगठन के अन्य जिम्मेदार पदाधिकारीगण कृपया आम लेखपाल कोअवगत कराने की कृपा करें उत्तर प्रदेश लेखपाल संघ के आन्दोलन को जो एस्मा लगने के बाद भी निरन्तर जारी रहा जिस पर मुख्य सचिव और राजस्व परिषद के अधिकारियों से वार्ता करने के बाद तथा पूर्व में लेखपाल सम्बर्ग की माँगो पर शांसन और सरकार की सहमति और अनुमोदन के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री के आश्वासन वर्तमान मुख्यमंत्री के समर्थन पत्र प्राप्त होने के बाद आप पदाधिकारीगण ने वार्ता के उपरान्त 1 माह का समय लेते हुए कार्यवर्त जारी किया गया वो 1 माह का समय भी व्यतीत हो गया परन्तु लेखपाल सम्बर्ग की मूल मांग 2800 ग्रेड पे, पदनाम परिवर्तन शैक्षिक योग्यता स्नातक, वेतन विसगति, पुंरानी पेंशन बहाली , 1 अनुपात 5 राजस्व निरीक्षक पदों का अनुपात पर वर्ष 2016 से 2 व्रहद आन्दोलन के उपरांत। क्या प्रगति हुई को जानने की इच्छा सभी साथियो को है जो एक माह का समय आन्दोलन के लेखपाल संघ को दिया गया उस बैठक में कई माँगो पर शासनादेश निर्गत होने की बात भी कही गयी थी जिसमे संसाधन की उपलब्धता बैठने की व्यवस्था भत्ते में बढ़ोत्तरी आदि अन्य यहाँ तक कि लैपटॉप मिलने और आय जाति निवास पर प्रति जांच 5 रु मिलने का आदेश भी 1 माह पश्चात भी अभी तक निर्गत नही हो सका 1 माह पश्चात भी जिम्मेदार पदाधिकारियो का इस तरह। मौन धारण करना कोई प्रतिक्रिया न देना संघ के प्रति उनकी जिम्मेदारी और कर्तव्य बोध को नकरात्मक सोच में बदल रहा हैइसी प्रकार अचानक जुलाई 18 आन्दोलन समाप्ति की घोषणा भी मीडिया और न्यूज चैनल से आम साथियो को मिली जबकि आम सदस्य को अवगत करा अपने वाजिब कारण समस्या और तथ्यों को बता आम साथियो को भावना। उनके रोष को कम करने का कार्य भी इतने बड़े सन्गठन से जुड़े पदाधिकारियो को अपनी जिम्मेदारी समझ कर उस समय भी करना चाहिए था क्या कारण है कोई भी जिम्मेदार पदाधिकारीगण जिनका प्रादुर्भाव ही व्हाटसअप से हुआ हो वो आज व्हॉट्सएप पर किसी भी टिप्पड़ी से दूर होता जा रहा जो पहले साथियो की समस्या पर सुलभ सरल रूप में प्रतिक्रिया देता थे वो जबाब से बच रहे किंचित इसका कारण अभिमान अहम उनके पास रहने वाले चापलूस चाटूकार महत्वाकांक्षी और जिनके अपने जिले में तहसील में सर्व मान्य छवि नही उनकी सलाह है। जो लोगो को जोड़ने के स्थान उनका संघ से निलंबन बहिष्कार कार्यवाही पर अधिक विश्वास कर संगठन को कमजोर करने का प्रयास कर रहे है सभी को विचार करने आत्म मंथन करने की आवश्यकता कैसे और क्या प्रयास किये जायें क्या रणनीति बनाई जाए कहाँ क्या कमी रह गयी उन पर विचार हो कैसे साथियो का मनोबल बना रहे कैसे। संगठन को तहसील स्तर पर मजबूत किया जाय कैसे तकनीकी और साथियो की योग्यता का लाभ संगठन को मिले इस पर संगठन से जुड़े हर साथियो को समर्पित भाव के साथ विचार करना होगा

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