01/10/2026
प्रिय देशवासियों,
मैं यह पत्र दिल्ली की उसी जगह से लिख रहा हूं, जिसे आप आज गांधी स्मृति कहते हैं। जहां मैंने अपने अंतिम कुछ कदम चले थे, आज उस घास पर पत्थर के चरण-चिह्न बने हुए हैं। यहां आज भी लोग आते हैं, धीमे स्वर में बात करते हैं, कुछ फूल रखते हैं, चित्र लेते हैं और लौट जाते हैं। उन्हें देखकर मेरा मन कृतज्ञ भी होता है और बेचैन भी। कृतज्ञ इसलिए कि आपने मुझे भुलाया नहीं। बेचैन इसलिए कि किसी की स्मृति संभालकर रखना सरल है, उसके प्रश्नों को जीवित रखना कठिन। मुझे भय है कि कहीं मैं दीवार पर टंगा हुआ एक आदरणीय चित्र भर न रह जाऊं। इसलिए मैं आपको उपदेश देने के बजाय इन चरण-चिह्नों से आगे, अपने साथ चलने का निमंत्रण देता हूं।
मैं भारत को शक्तिशाली, लेकिन उससे पहले न्यायपूर्ण देखना चाहता हूं। शक्ति यदि न्याय से अलग हो जाए तो सुरक्षा देने के बजाय भय पैदा कर सकती है। हम भारत को महान कहते हैं। मेरे लिए उसकी महानता तभी सार्थक है, जब उसमें वह मनुष्य भी शामिल हो जिसके पास कुछ नहीं। यदि किसी गांव का गरीब भूखा सोता है, मजदूर उस शहर में ही पराया हो जाता है जिसे उसने अपने श्रम से बनाया है, किसी स्त्री को अपनी स्वतंत्रता के लिए हर दिन संघर्ष करना पड़ता है, या किसी बच्चे को उसकी जाति, धर्म अथवा भाषा के कारण छोटा समझा जाता है, तो केवल बड़े आंकड़े हमारी महानता सिद्ध नहीं कर सकते। मैं उस भारत की कल्पना करता हूं जिसमें सबसे कमजोर मनुष्य भी बिना भय और संकोच कह सके- यह मेरा देश है।
मैंने भारत को कभी एक रंग में नहीं देखा। वह अनेक रंगों का देश है। अनेक भाषाओं में बोलता है, अनेक आस्थाओं में ईश्वर को पुकारता है और अनेक रीति-रिवाजों में जीवन जीता है। यदि हम इन अनेकताओं को मिटाकर एक जैसा भारत बनाने का प्रयत्न करेंगे तो शायद एक अधिक व्यवस्थित देश बना लें, लेकिन उसकी आत्मा को छोटा कर देंगे। एकता का अर्थ है भिन्न होकर भी एक-दूसरे के साथ न्याय करना। इसलिए जो मुझसे भिन्न है, उससे मुझे भय नहीं होना चाहिए।
सरकार और देश एक नहीं हैं। कोई नेता, कोई दल और कोई सरकार स्वयं भारत नहीं है। भारत उसके लोगों से बनता है। सरकार जनता की सेवक है, मालिक नहीं। हमारे पास संविधान है। उसका सम्मान केवल उसे पढ़ लेने या उसकी प्रस्तावना दोहरा देने से नहीं होता। संविधान की असली परीक्षा तब होती है, जब उसका कोई सिद्धांत हमारे स्वार्थ के विरुद्ध खड़ा हो। तब हमें अपने को संविधान के अनुकूल बनाना चाहिए, संविधान को अपने अनुकूल नहीं।
धर्म के विषय में मेरी चिंता और गहरी है। धर्म मनुष्य को नम्र बनाता है। वह उसे अपने भीतर देखने की शक्ति और दूसरे के दुख को समझने की करुणा देता है। यदि धर्म हमें अहंकार और घृणा की ओर ले जा रहा है तो दूसरे के धर्म को दोष देने से पहले हमें अपने आचरण को देखना चाहिए। विकास के बारे में भी हमें सावधान रहना होगा। मैं आधुनिकता का विरोध नहीं करता। मैं धन, उद्योग या विज्ञान का विरोध नहीं करता। लेकिन, साधन मनुष्य से बड़े नहीं हो सकते। यदि शहर चमकता है और उसे बनाने वाला मजदूर अंधेरे में रहता है, तो हमारी प्रगति अधूरी है। यदि उत्पादन बढ़ता है और नदी मर जाती है, तो हमें अपनी प्रगति का अर्थ फिर से समझना होगा।
मुझे अपने विश्वविद्यालयों की भी चिंता है। विश्वविद्यालय केवल नौकरी पाने की जगह नहीं। वे प्रश्नों के घर होने चाहिए। विद्यार्थी को यह सिखाया जाना चाहिए कि किसी बात को केवल इसलिए सत्य न माने कि उसे कोई शक्तिशाली व्यक्ति कह रहा है। मेरे देशवासियों, हमारे समय की एक बड़ी बीमारी भय है। डरा हुआ मनुष्य सत्य नहीं बोलता। डरा हुआ विद्यार्थी प्रश्न नहीं पूछता। डरा हुआ पत्रकार अपनी कलम रोक लेता है। डरा हुआ शिक्षक अपने विवेक से समझौता करता है। और डरा हुआ नागरिक अपने पड़ोसी को भी संदेह की दृष्टि से देखने लगता है। भय मनुष्य को धीरे-धीरे भीतर से गुलाम बना देता है। इसलिए निर्भय होना आवश्यक है। लेकिन, निर्भयता का अर्थ दूसरे को डराना नहीं है। अहिंसा भी इसी निर्भयता की संतान है। अहिंसा कायरता नहीं। कायर हिंसा से डरता है, अहिंसक मनुष्य हिंसा का सहारा लेने से इनकार करता है।
हम अपने घरों में भारत बनाते हैं। अपने पड़ोसी के साथ व्यवहार में भारत बनाते हैं। मजदूर से बात करते समय भारत बनाते हैं। असहमत व्यक्ति को सुनते समय भारत बनाते हैं। स्वराज दिल्ली में बैठी सरकार से शुरू नहीं होता, वह हमारे अपने आचरण से शुरू होता है। मुझे भारत पर विश्वास है, पर जानता हूं कि हमसे भूलें होंगी। लेकिन, जिस देश में अपनी भूल स्वीकार करने का साहस बचा रहता है, उसका भविष्य समाप्त नहीं होता।