17/12/2015
एक दिन रात 11 बजे मुझे अपनी बेटी की तकलीफ़ का ध्यान आया. बातें होती हैं, उसके बाद मन कहीं न कहीं जाता ही है. सफ़दरजंग (अस्पताल) का कुछ ऐसा (वाकया) जो हमने देखा था वो मुझे कुछ ध्यान आया. मुझे कुछ ऐसा अजीब सा महसूस हुआ. मैंने कलम कागज़ लिया और प्रधानमंत्री को उसी