26/12/2022
भर्ती परीक्षा में नकल माफिया के पैदा होने के कारण और उपचार
**************************************************
अगर भर्ती परीक्षाओं में नक़ल और पेपर लीक के माफिया पर अंकुश लगाना है तो किसी एक पेपर या एक परीक्षा में कामयाबी या मेरिट हासिल करने से नौकरी मिल जाने की पद्वति को बदलना होगा.
नक़ल गैंग हमेशा भर्ती परीक्षाओं में एक साथ दसियों लाख अभ्यर्थी के भाग लेने से उत्पन्न अव्यवस्था और अफ़रातफ़री का फ़ायदा उठाते है.
इन दस बीस लाख में कुछ हज़ार मेरिट वालों को एक परीक्षा से सीधी नौकरी तक का स्तर हासिल हो जाता है. चाहे वो मेरिट नकल से ही क्यों न हासिल कर ली गई हो.
यही नक़ल गैंग या नकल माफिया के उद्भव का मूल है.
अब अगर नक़ल का कोई गैंग है तो वह एक व्यक्ति को नौकरी की गारंटी देने की स्थिति में 15 लाख (या ज्यादा)वसूल सकता है.
मान लीजिए वह दो सौ ऐसे ग्राहक ढूँढ लेता है जो अन्यथा कुछ नहीं बन सकते तो वह 15 लाख के हिसाब से दो सौ आदमी से सीधा तीस करोड़ एक परीक्षा में कमा सकता है. साल में बीस परीक्षाओं में वह 6 सौ करोड़ कमा सकता है.
इस प्रकार नकल गिरोह के सस्टेनेबल आर्थिक चक्र का आधार तैयार हो जाता है.
अब वह नकल गिरोह भारी पैसे खर्च कर नक़ल के आधुनिक संसाधन और पेपर हासिल करने के लिए सेंटर, प्रिंटिंग स्थान, परीक्षा आयोजक और परीक्षा आयोजन स्थल तक पेपर हासिल करने और नकल कराने की कमजोर कड़ी ढूँढ सकता है.
और वह ऐसा ही करता है.
गैंग के पास ग्राहक है, पैसा है, लीक करने की कमजोर कड़ी है प्रचुर संसाधन है और दसियों लाख बेरोज़गार अभ्यर्थियों के बोझ तले सभी लचर और कमजोर परीक्षा प्रणाली है जो उनके कार्य को आसान कर देती है.
रिस्क भी आर्थिक अपराध से मिलने वाली सजा से ज़्यादा कुछ नहीं. जमानत कुछ समय में हो ही जाती है.
गैंगके मेम्बर से ज़्यादा फ़ोकट की नौकरी के लालच में पड़े युवा पकड़े जाते है.
जिनके पकड़े जाने पर उनकी जगह पैसे देने वाले थोक में और मिल जाते है. इन नक़ल गिरोह का धंधा निर्बाध रूप से चलता है.
इस तरह नकल पर रोक लगानी है तो हमें सोचना होगा कि हमारी परीक्षा प्रणाली में ऐसी क्या कमी है कि एक पेपर हासिल करने के लिए कोई अभ्यर्थी 15 लाख खर्च करने को तैयार हो जाता है.
वह कमी यह है कि बस एक पेपर हासिल करते ही उसकी सरकारी नौकरी पक्की हो जाती है.
वह पेपर के नहीं अपनी नौकरी हासिल करने के 15 लाख देता है.
एक गैंग के लिए पेपर हासिल करना उतना ही आसान हो जाता है जब लाखों लोगों के लिए एक साथ एक दिन परीक्षा का आयोजन किया जाता है.
दसियों लाख अभ्यर्थी हज़ारों सेंटर्स. भारी आवागमन और रेलम पेल. नकल रोकने के दबाव में आई हुई सरकारी मशीनरी .
पुलिस इतने लाखों अभ्यर्थियों के परीक्षा देने से उत्पन्न ट्रेफ़िक, बस रेलस्टेशन पर भारी भीड़.. होटलों धर्मशालाओं में ठहरने की स्थिति में सुरक्षा और ट्रेफ़िक व्यवस्था में लग जाती है.
इसके अलावा अलग से हर सेंटर पर पुलिस ज़ाब्ता, पेपर सुरक्षा में रखने, सेंटर पर पहुँचाने की व्यवस्था आदि में पुलिस इतनी अधिक व्यस्त होती है कि वह उसकी क्षमता से कहीं अधिक परीक्षा को नकल मुक्त कराने दायित्व में फँस जाती है.
पुलिस को लाखों अभ्यर्थी, हज़ारों सेंटर, दसियों हज़ार प्राइवेट स्कूल के और अनुबंधित परीक्षा कराने वाले स्टाफ़ पेपर के आवागमन उसकी सुरक्षा, समय पर पहुँचाना सभी कार्यों में पूरे राज्य में हर समय स्थान पर सिद्धांततः अपना कर्तव्य पूरे परफ़ेक़्शन से साबित करना होता है.
जबकि नक़ल करवाने वाले गैंग को इसमें से सिर्फ़ एक कमजोर कड़ी चाहिए जिसको लालच देकर या तोड़कर पेपर की सिर्फ़ एक फ़ोटो व्हाट्सएप पर हासिल कर ले.
निश्चित ही नकल माफिया का काम पुलिस की तुलना में कहीं ज़्यादा आसान है.
पर इसका इलाज क्या है?
इसका इलाज है कि ऐसी परीक्षा व्यवस्था बनाई जावे कि कोई व्यक्ति न तो इस माफिया को नौकरी की गारंटी देने के बदले पंद्रह लाख देने की सोच सके और न कोई माफिया नक़ल करा या पेपर लीक के बदले पंद्रह लाख ले कर नौकरी या उसकी गारंटी दे सके.
ऐसा सिर्फ़ एक स्थिति में हो सकता है.
वो है अंतिम चयन से पहले स्क्रीनिंग टेस्ट की व्यवस्था की जावे.
टेस्ट में नकल रोकने के लिए एक और टेस्ट?
आप इसे अज़ीब कह सकते है. मगर यहाँ कुछ फर्क है.
पहली बात यह है कि यह स्क्रीनिंग टेस्ट होगा जो नकल के माध्यम से किसी वृहद पैमाने पर आयोजित परीक्षा व्यवस्था की कमज़ोरियों का दुरुपयोग कर मेरिट में स्थान ले आने वाले नक़लचियों को बाहर कर देगा.
दूसरा इसमें स्क्रीनिंग टेस्ट के नंबर मेरिट को प्रभावित नहीं करेंगे इसलिए मूल परीक्षा में अपनी मेहनत से स्थान पाए अभ्यर्थियों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा.
चूँकि नकल से स्थान पाने वाले अभ्यर्थी बहुत कम होते है लेकिन अंतिम मेरिट में ऐसे किसी भी नकलची के स्थान प्राप्त करने से पूरी भर्ती परीक्षा दूषित हो जाती है और लाखों अभ्यर्थियों का भविष्य प्रभावित होता है इसलिए उनको फ़िल्टर करना सही है.
स्क्रीनिंग टेस्ट में नकल गिरोह का प्रभाव इसलिए नहीं पड़ सकता है क्योंकि इसमें कुल पदों के दुगने या ढाई गुने लोगों का ही स्क्रीन टेस्ट होगा जो कि कम संख्या होने से नकल मुक्त रखना आसान होगा.
चूँकि लाखों परीक्षार्थी केवल कुछ हज़ार पदों के लिए एक एग्ज़ाम देते है. उसमें मेरिट घोषित होती है. नक़ल में सफल हो जाने के बाद उस मेरिट में नाम आ जाता है. उसके बाद उसको नौकरी लेने से कोई रोक नहीं सकता है.
अब मान लीजिए एक प्रतियोगी परीक्षा में दो हज़ार पद है. परीक्षा के रिज़ल्ट में उससे दो गुना अभ्यर्थी स्क्रीनिंग हेतु मेरिट से चयनित किए जाएँ. मगर मेरिट घोषित न की जावे.
इन चार हज़ार लोगों में मान लीजिए कुछ व्यक्ति नक़ल से आ भी गये है.इनको स्क्रीनिंग में फिल्टर किया जा सकता है.
स्क्रीनिंग पूरी तरह सीसी टी वी की रिकॉर्डिंग और निगरानी वाले आधुनिक तकनीक से सुसज्जित केंद्र पर भारी सुरक्षा व्यवस्था के अन्तर्गत आयोजित होगी.
इस बार कम परीक्षार्थी होने से नकल को रोकना ज़्यादा आसान है. इस स्क्रीनिंग टेस्ट में मूल परीक्षा के अंक भार के अनुपातिक अंक भार वाला पेपर हो जिसमें आये अंक के प्रतिशत का अंतर अभ्यर्थी के मूल परीक्षा के अंक से बीस प्रतिशत से अधिक होने पर उसे स्क्रीनिंग में बाहर करते हुए शेष लोगों की अंतिम मेरिट घोषित की जाए.
यह स्क्रीनिंग परीक्षा भर्ती परीक्षा व्यवस्था के प्रमुख भाग के रूप में भर्ती नियमों में अधिसूचित की जावे.
जिसने नकल से मेरिट क्लीयर की है वह व्यक्ति बिना नकल अपने प्रदर्शन को कभी दोहरा नहीं सकता. और तैयारी कर परीक्षा देने वाला व्यक्ति अपने प्रदर्शन के आसपास ही रहेगा.
साथ ही नकल गैंग कड़ी सुरक्षा में होने वाली स्क्रीनिंग परीक्षा में नकल कराने में सफल नहीं हो सकता है. क्योंकि वहाँ कम अभ्यर्थी होने से नकल रोकने के लिए कई गुना पर्याप्त संसाधन उपलब्ध होंगे जो लाखों अभ्यर्थियों के एक साथ परीक्षा में बैठने पर अन्यथा उपलब्ध नहीं हो सकते है.
चूँकि केवल मूल परीक्षा में नकल या पेपर हासिल कर लेने से भी नौकरी की गारंटी नहीं होगी ऐसी स्थिति में नकल गैंग को पंद्रह लाख देने वाले अभ्यर्थी नहीं मिलेंगे. तब फिर नकल गैंग पैसे के अभाव में मूल परीक्षा में भी नकल करवाने लायक साधन या कमजोर कड़ी नहीं हासिल कर पाएगा न पेपर हासिल कर पाएगा.
इस तरह से नकल माफिया की आर्थिक क्षमता कमजोर हो जाएगी जो अंततः इन गैंग और माफिया को प्रभावहीन कर देगा. और साथ ही तैयारी कर परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों को मनोबल देगा कि अगर कोई नकलची परीक्षा में सफल हो भी गया तो स्क्रीनिंग में फ़िल्टर हो जाएगा.
इस प्रकार नकल माफिया का आर्थिक चक्र तोड़ कर ही उस पर रोक लगाई जा सकती है.
-प्रकाश सिंह