18/06/2017
हमारे आदरणीय पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी के वाक्य थे की - जय जवान ,जय किसान, और दोनों जय की पत्र भी है क्यों की दोनों की वजह सी ही आज हमारा अस्तित्य्व है, आज जो भी जिस भी है चैन और सुख शांति से रह रहे है खा रहे है इन दोनों की बदौलत है, जवान जो की दिन रात हर बद्तर हालात में देश की रक्षा की लिए सीमा पर डाटा है ,ताकि हम चैन से रह सके, एअक वाक्य में बोले तो सेना का महत्व तो सब जानते है पर दूसरी और किसान जो की हमारा अन्ना दाता है और भगवान से काम नहीं है जो उस सेना का भी पेट भरता है जो हमारी लिए सीमा पर खड़ी है, तो मुझे लगता है की उसका महत्व और भी जाता बढ़ जाता है पर क्या वास्तविकता में आज ऐंसा है, आज जो किसानो की दुर्दसा है उसका दोषी कौन है, आज हमारा देश पीछे है गरीब है क्यों ,
क्यों की सब को अपनी पड़ी है सब एअक दूसरे से जुड़े है तो सब आगे बढ़ रहे है पर हम भूल जाते है की हम जिस देश में रह रहे है वह एअक किसान प्रधान देश था,और आज भी कृषि प्रधान देश है, और आज भी देश की ५०% से अधिक आबादी किसानी और खेती पर आश्रित है, और यहाँ तो हम सबने ही ५० % सी ज्यादा लोगो को सिस्टम से ही अलग कर दिया है, सिस्टम में वो सबसे नीचे है क्यों की वो सीधे सरल है, सब मिल कर बारी बारी से उसे बेवकूफ बाना रहे है, तो भला जिस देश की ५०% सी ज्यादा आबादी इस हाल में है तो वो देश कैसे आगे हो सकता है भाई!
मुझे लगता है की अब कुछ वर्षो की लिए किसानों को अब खेती करना बंद कर देना चाहिए और केवल अपने परिवार के लायक उपजा कर बाकी ज़मीन को खाली छोड़ देना चाहिए। तब जा कर इस समाज को, देश को, अंधे नेता को , उस सरकारी कर्मचारियो को ,पटवारी को, बैंक के उस क्लार्क को जो किसान को सरकारी रहत का आधा पैसा देता है बांकी आधा घूस में ले लेता है , दलालो को, सरकारी अधिकारियो को, छोटे बड़े व्यापारिओं को, खुद को प्रोफेसनल कहने वाले लोगो को और उन सब को जो किसानो को देख कर मू बनाते है, गंदे,फटे कपडे, पसीने से महकते किसान, जो लोग अपने बच्चों को एक लाख की मोटर साइकल, हजारो का मोबाइल लेकर देने में एक बार भी नहीं कहते कि महँगा है, वे लोग किसानों की माँग पर बहस कर रहे है , सरकार को बोलते है कि सरकार जीने नहीं दे रही , धंधा बंद करना पड़ेगा,खुद लाखो की विदेश यात्रा करते है । माल्स में जाकर अंधाधुंध पैसा उजाड़ने वाले गेंहूँ की कीमत बढ़ जाने से डर रहे हैं। पिज़्ज़ा हब में जा कर एअक बार में सिर्फ ५० ग्राम गेहू की आटे की रोटी जिसे कुछ मसालों से चटपटा और स्वादनुमा कर दिया जाता है- को चाव से ३००-५०० रु में खाना पसंद है लेकिन उस गेहू को पैदा करने वाले
किसान को कुछ रुपये किलो से अधिक न मिलें इस पर बहस कर रहे हैं टीवी पर ऑनलाइन भी। एक बार भी कोई नहीं कह रहा कि मैगी, पास्ता, कॉर्नफ़्लैक्स के दाम बहुत हैं। सबको किसान और उसे दी जाने वाली रियायत दिख रही है जो की आप सब जानती हो की सरकारी चेक की द्वारा केवल १०० -२०० या १००० -५००० सी ज्यादा नहीं होती और यह कि क़र्ज़ की माफी की माँग करके किसान बहुत नाजायज़ माँग कर रहा है। यह जान लीजिए कि किसान क़र्ज़ में आप और हमारे कारण डूबा है। उसकी फसल का उस को वाजिब दाम इसलिए नहीं दिया जाता क्योंकि उससे खाद्यान्न महँगे हो जाएँगे।एक व्यापारी अपने उत्पाद की कीमत खुद तय करता है, और बाजार मे उस उत्पाद की लागत का कई गुना दाम में बेचते है, पर किसानो के साथ एसा नहीं है, क्यों की वो बिचारा सीधा साधा है चीजो को नई जनता समझता है, सरकार और नेता उन्हें मुर्ख बना रही है नए नए क़ानून का हवाला दे कर डरती भी है, अरे जब सब को अपनी लागत का कई गुना मिलता हे तो भाई हम तो सिर्फ लागत से उतना ही ज्यादा मांग रहे है जिसमे वो जी खा सके अपनी परिवार का पालन पोसड़ कर सके, उनका इलाज करा सके, बच्चों को पढ़ा लिखा सके, समाज में तोड़े सम्मान से रह सके, अपना लिया कर्ज खुद भर सके, किसान को न तो बड़ी बंगल्य चाहिए न ही बड़ी लम्बी कार न कुछ खाश, बस चाहिए तो कपडा माकन और कुछ मूलभूत सुविधा, पर नहीं ये भी हमे गवारा नहीं है | हम उसी दबा कर रखना चाहते है ताकि हम मजे से रहे, हमारी खाने पीने में लगनी वाली पैसो की लगत न बढ़े, वो बड़ी बसह हम खुद को बड़ा बताने में लगाते है| बड़ा दुर्भाग्य है की हम कुछ विकसित देश को अच्छा बोलते है, वहां रहना चाहते है, क्यों की वहां सब कुछ बहुत अच्छा है, नियम कानून है, वहां ज्यादा पैसा है, वहां की मुद्रा बड़ी है, पर यह भूल जाती है की वहां कान पीना सबसे ज्यादा महंगा है और हमारे देश भारत में गली गली रॉड रोड में मिलता है सब सस्ता है |
"1975 में सोने का दाम 500 रुपये प्रति दस ग्राम था और गेंहू का समर्थन मूल्य किसान को मिलता था 100 रुपये। आज चालीस साल बाद गेंहू लगभग 1500 रुपये प्रति क्विंटल है मतलब पन्द्रह गुना बढ़ा केवल और उसकी तुलना में सोना आज तीस हज़ार रुपये प्रति दस ग्राम है मतलब 60 गुना की दर से महँगाई बढ़ी मगर किसान के लिए उसे पन्द्रह गुना ही रखा गया। रखा गया ज़बरदस्ती ताकी खाद्यान्न महँगे न हो जाएँ। 1975 में एक सरकारी अधिकारी को 400 रुपये वेतन मिलता था जो आज साठ हज़ार मिल रहा है मतलब एक सौ पचास गुना की राक्षसी वृद्धि उसमें हुई है। इसके बाद भी सबको किसान से ही परेशानी है। किसानों को आंदोलन करने की बजाय खेती करना छोड़ देना चाहिए। बस अपने परिवार के लायक उपजाए और कुछ न करे। उसे पता ही नहीं कि उसे असल में आज़ादी के बाद से ही ठगा जा रहा है।“
किसान क्यों हिंसक हो गया है यह समझना होगा, जनता को भी और सरकार को भी। किसान अब मूर्ख बनने को तैयार नहीं है। बरसों तक किया जा रहा शोषण अंततः हिंसा को ही जन्म देता है। आदिवासियों पर हुए अत्याचार ने नक्सल आंदोलन को जन्म दिया और अब किसान भी उसी रास्ते पर बढ़ रहा है। आप क्या चाहते हैं कि आप समर्थन मूल्य के झाँसे में फँसे किसान के खून में सनी रोटियाँ अपनी कांच या मार्बल की टॉप वाली डाइनिंग टेबल पर खाते रहें और जब किसान को समझ में आए सारा खेल तो वह विरोध भी नहीं करे। आपको पता है आपका एक सांसद साल भर में चार लाख की बिजली मुफ़्त फूँकने का अधिकारी होता है,एक साल में एअक नेता औसतन ५० लाख फ्री में खर्च कर डालता है अपनी ऊपर, उसका घर पानी बिजली, यात्रा खाना रहना सब फ्री है उस पर भी सबसे ज्यादा तनख्वाह लेता है वो भी टेक्स फ्री जो की जनता की टैक्स का पैसा है लेकिन किसान का चार हजार का बिजली का बिल माफ करने के नाम पर आप टीवी चैनल देखते हुए बहस करते हैं। यह चेत जाने का समय है। कहिए कि आप 50रु से 100रु रुपये लीटर दूध, 200 रु - 500रु लीटर तेल और कम से कम 50 रुपये किलो गेंहू चावल और 200रु-400रु किलो दाल खरीदने के लिए तैयार हैं, कुछ कटौती अपने ऐश और आराम में कर लीजिएगा। नहीं तो कल जब अन्न ही नहीं उपजेगा तो फिर तो आप बहुराष्ट्रीय कंपनियों से उस दाम पर खरीदेंगे ही जिस दाम पर वे बेचना चाहेंगी। और हम किसान सीधा अपनी ऊपज उन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बेच देगी जो हमे अच्छे दाम देगी, फिर खरीदना उन्ही से , तब समाज में आएगा की किसान इतने सालो सी चुप चाप क्या दे रहा है समाज को ......अभी भी वक्त है जाग जाओ..... किसानो को उसका हक, और सम्मान दो, जिसका वो हकदार है.
जय जवान जय किसान जो कहा है वो बस यू ही नहीं है उसकी पीछे की अर्थ को समझने की जरूरत है |
प्रशांत कुमार
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