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शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह की दहशत इतनी कि बिना मुकदमा चलाए अंग्रेजों ने चुटूपालू घाटी के पेड़ पर दे दी थी फांसीअमर ...
08/01/2026

शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह की दहशत इतनी कि बिना मुकदमा चलाए अंग्रेजों ने चुटूपालू घाटी के पेड़ पर दे दी थी फांसी
अमर शहीद शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह का आज शहादत दिवस है. 1857 की क्रांति का बिगुल फूंकनेवाले दोनों वीरों को चुटूपालू घाटी के निकट पेड़ पर बिना मुकदमा चलाए अंग्रेजों ने आठ जनवरी 1858 को फांसी दे दी थी.

साधारण परिवार में हुआ था जन्म

अमर शहीद शेख भिखारी का जन्म साधारण परिवार में 1819 में ओरमांझी प्रखंड मुख्यालय से आठ किमी दूर पूर्वी इलाके की कुटे पंचायत के खुदिया लोटवा गांव में और अमर शहीद टिकैत उमराव का पश्चिमी इलाके के खटंगा गांव में जन्म हुआ था. शेख भिखारी की बहादुरी को देखते उन्हें राजा ठाकुर विश्वनाथ के बुलावे पर राजकीय फौज सहित दीवान बनाया गया था.

अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का नारा बुलंद किया

लार्ड डलहौजी के जुल्म से बेबस होकर शेख भिखारी और राजा टिकैत उमराव ने विद्रोहियों की सहायता की और अपने सहयोगियों तथा शेख होरो अंसारी, अमानत अली और करामत अली अंसारी को विद्रोहियों के पास भेज कर विद्रोह का नारा बुलंद किया. शेख भिखारी ने 1857 में रामगढ़ स्थित अंग्रेजी सेना के हवलदार राम विजय सिंह और नादिर अली को अपने में मिला लिया और रामगढ़ छावनी पर अचानक हमला कर दिया. वहां सफलता मिलते ही चाईबासा की तरफ अपनी सेना के साथ कूच कर वहां के डिप्टी कमिश्नर की हत्या कर दी. उनके कई सहयोगी युद्ध में लड़ते हुए शहीद हो गए थे. इसके बाद वहां से शेख भिखारी संताल परगना की ओर प्रस्थान कर गए थे. तब दुमका में भी भीषण युद्ध हुआ था. फिर दुमका से शेख भिखारी रांची आ गए थे और युद्ध में जीत घोषित होने के उपलक्ष्य में राजा विश्वनाथ शाहदेव ने डोरंडा में एक से सात नवंबर 1857 तक विजय का जश्न मनाया. भारतीयों का यह प्रथम जागरण दिवस था.

चुटूपालू घाटी के पास हुआ था भीषण युद्ध

अंग्रेज निराश होकर दानापुर छावनी से काफी बड़ी संख्या में सेना और अस्त्र-शस्त्र लेकर रामगढ़ की तरफ बढ़े. यहां उनसे लोहा लेने के लिए शेख भिखारी और टिकैत उमराव सिंह ने रामगढ़ जाकर मोर्चाबंदी आरंभ कर दी. वहां अंग्रेजी सेना के पहुंचते ही जमकर जंग हुई. शेख ने अपना अड्डा चुटूपालू घाटी में बनाया था. छह जनवरी 1857 को अंग्रेजी सेना के कमांडर मैकडोनाल्ड ने शेख भिखारी तक पहुंचाने के गुप्त रास्ते का पता लगा लिया. इसके बाद शेख भिखारी को गिरफ्तार कर लिया और उनके साथ टिकैत उमराव सिंह भी पकड़े गये. चुटूपालू घाटी के निकट पेड़ पर बिना मुकदमा चलाए दोनों वीरों को आठ जनवरी 1858 को फांसी दे दी गयी थी.

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