22/12/2023
इस दुनिया में कितनी दुनियाएं ख़ाली पड़ी रहती हूं और लोग ग़लत जगह पर रहकर जीवन गंवा देते हैं - ये बात निर्मल वर्मा ने कही थी। कितनी सटीक बात है कि हम एक जैसे लोगों, स्थितियों और मुसीबतों के साथ जीवन बिता देते हैं जबकि कितना कुछ जानना बचा रह जाता है।
ये बात बीते दिनों वाइल्ड वाइल्ड कंट्री देखते हुए सोच रही थी। ओशो के रजनीशपुरम पर बना ये वृत्तचित्र मैंने कई साल बाद अब दोबारा देखा और उसके बाद सर्चिंग फ़ॉर शीला भी। वे लोग, कम्यून में रहने वाले लोग कितने अलग थे, वे एक व्यक्ति के प्रेम में, उसके सम्मोहन में सब-कुछ छोड़कर एक दूसरी ही ज़िंदगी जीने चले गए। वे इस पूरे समाज के कटकर एक अलग तरह के डायमेंशन में जीने चले गए थे। जहां बंदिशें नहीं थीं, कोई जोखिम नहीं थे, रूढ़ियां नहीं थीं और सबसे ख़ास की वहां कोई धर्म नहीं था। रजनीश जब धर्म जैसा लगने लगा तो वहां की किताबें जला दी गईं, मालाएं तोड़ने को कहा गया और पहचान बन चुके मरुन चोले को भी बदलने सके आदेश आ गए। हज़ारों-लाखों लोगों का वो कम्यून सिर्फ़ एक आदमी की प्रेम में था- रजनीश यानी ओशो के।
वहां हर कोई उनके प्रेम में ही था, उनकी सेक्रेटरी से लेकर वकील और माली तक। हर कोई। उनकी सेक्रेटरी यानी शीला जिसके लिए एक अलग से किताब लिखी जा सकती है। एक समय पर अमेरिका के वॉस्को काउंटी के एंटेलोप में जिसने मिट्टी के पहाड़ और रेतीले मैदानों को हरे-भरे जंगल और रहने लायक सुंदर जगह में बदल दिया था। वहां उसका एक छत्र शासन चलता था। वो कुछ कहती औग लोग उसे मानने को तैयार रहते, वो मीडिया में मिडल फ़िंगर दिखाती और पिंप जैसे शब्दों का इस्तेमान करती। मीडिया को उसे उकसाने में मज़ा आता था, वो एक तेज़-तर्रार, दिमाग़ से चलने वाली महिला था। जिसके दिल-दिमाग़ पर सिर्फ़ ओशो थे। उसी वक़्त की समकालीन रजीनीशी और मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वो कुछ भी करने को तैयार थीृ, ज़हर देने और मारने तक को भी। जो व्यक्ति उसे ओशो के क़रीब लगता, आंखों में खटकने लगता था।
वृत्तचित्र के हिसाब से ओशो के सपने और विचारों वाले उस कम्यून को बचाने के लिए उसने साम, दाम, दंड, भेद की हर नीति अपनाई लेकिन बात तब बिगड़ी जब हॉलीवुड ओशो के क़रीब आने लगा। शीला को अपने व्यक्तित्व का ख़तरा पैदा हो गया थी कि जिसके लिए सब किया, लड़ाईयां लड़ीं और मेहनत की, उनके क़रीब अब दूसरे लोग जाने लगे थे। उसने कम्यून छोड़ दिया, बिना बताए छोड़ा ऐसा ओशो ने कहा लेकिन शीला ने लिखा है कि उसने चिट्ठियां लिखकर जानकारी दी और ओशो ने कहा कि वो अमेरिका वाले कम्यून को छोड़कर चाहे तो यूरोप जा सकती है, शीला दुखी हो गई। वो तो वहीं क़रीब ही रहना चाहती थी लेकिन उसे पता चल गया कि ओशो को उससे वैसा लगाव नहीं है जैसा उसे उनसे है। ऐसा होता भी है और ज़रूरी भी नहीं कि हम जिससे जितनी शिद्दत से प्रेम करें, दूसरा भी हमें वैसा ही प्रेम करे। पर शीला के जाते ही रजनीशपुरम का अंत शुरु हो गया था। इसलिए नहीं कि अब शीला नहीं थी बल्कि इसलिए कि अमेरिकन सरकार और लोकल पड़ोसी वैसे ही कम्यून के पीछे थे और ओशो ने अचानक बाहर आकर बोलना शुरु कर दिया और शीला पर सीधे इल्ज़ाम लगाए। अब सरकार को सीधे हस्तक्षेप का मौका मिल गया।
ओशो वहां से भागे, ये देखकर मुझे बहुत दुख हुआ, उनको हथकड़ी में देखकर तो और भी ज़्यादा। सदी के हर बड़े इंटेलेक्चुअल को समाज में ये सब झेलना ही पड़ा है यूं तो लेकिन फिर भी। लंबा सा चोगा पहने एक पतली सी देह वाले एक विचारशील मनुष्य को यूं देखना बुरा है। कोई व्यक्ति इसलिए दोषी नहीं होना चाहिए कि उसे विचार समाज की रुढ़ियों के ख़तरा है। पर ओशो को जेल जाना पड़ा था, हर दूसरे दिन इतनी जेलें बदली गईं कि उनकी देह उक्ता गई और आत्मसमर्पण करना पड़ा जबकि उनके खिलाफ़ किसी साजिश में प्रत्यक्ष शामिल होने का कोई सबूत किसी के पास नहीं था। उन्हें अमेरिका छोड़कर भारत आना पड़ा। रजनीशपुरम का अंत हो गया और एंटेलोप के लोगों ने इसका विजय उत्सव मनाया। वे इस कम्यून की विचारधारा, उसके हथियारबंद होने और शीला के तेवरों के डरे हुए थे।
ओशो ने शीला का जाने के बाद कहा कि लव अफ़ेयर्स डॉन्ट एंड, दे टर्न इन्टू हेट अफ़ेयर्स। शीला और ओशो आमने-सामने थे, एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगाते। लेकिन ये थोड़ा वक़्त के लिए ही थी, ओशो ने भारत आने के बाद अपने प्रवचन बंद कर दिए, वे सिर्फ़ दर्शन देने आते, मुस्काते, प्रणाम करते और चले जाते। 5 साल बाद उनके डॉक्टर ने एक रोज़ घोषणा की कि ओशो ने शरीर त्याग दिया है। उनके कुछ शिष्य अमेरिका से भारत साथ आए, कुछ बाद में आए और कुछ अपनी दुनिया में लौट गए लेकिन उन्हें नहीं पता था कि बाहरी दुनिया में जीना कैसे है? उन्हें कई परेशानी उठानी पड़ी पर वे लौट गए। वे अब अपनी उम्र के आख़िरी क्षणों में होंगे, किस तरह अपने अतीत को याद करते होंगे, पता नहीं।
शीला 3 साल 3 महीने जेल में रही, यूरोप गई और वहीं बस गई। ओशो से वापस संपर्क कभी नहीं हुआ, 35 बरस भारत नहीं लौटीं। जब लौटीं तो सब कुछ बदल गया था। ओशो अब नहीं थे। वे कहती हैं कि वो ओशो को प्रेम में थीं, वहां तो हर कोई ओशो के प्रेम में था, लोग उसे सम्मोहन कहते हैं लेकिन प्रेम का सम्मोहन सबसे ख़तरनाक होता है जो कभी ख़त्म नहीं होता। इसकी अपनी एक दुनिया होती है, प्रेमी भूल जाते हैं कि दूसकी जगह जाकर भी बसा जा सकता है। पर वो तो ओशो, उनके एक सन्यासी कहते हैं कि उनमें पूरी धरती के वाइब्रेशन बदलने की क्षमता थी। तो क्या वाकई? ये तो प्रेम की कर सकता है सिर्फ़।