25/10/2020
The Sikh warrior...
जानिए कौन थे खूंखार बाघ का मुँह चीरने वाले हरी सिंह ‘नलवा’
साथियो, सबसे पहले तो मेरी ओर से आप सभी को प्रेम भरा "सत श्री अकाल"।
दोस्तो, यदि आप इंटरनेट की दुनिया से वाक़िफ हैं तो शायद आप जानते ही होंगे कि सिख कौम को पूरे विश्व की सबसे बहादुर कौम कहा जाता है। यह कौम अपनी सेवा और वीरता के लिए विश्व भर में मशहूर है।
इनके शौर्य, वीरता व कौशल की ऐसी बहुत कथाएं है जिन्हे जानने के बाद यह सिद्ध हो जाता है कि सिख कौम बहादुरी व सेवा का दूसरा नाम है।
साथियो, आज मैं आपको एक ऐसे ही सिंह सूरमे हरी सिंह नलवा जी के बारे में बताने जा रहा हूं। यह इतने बहादुर थे की सिर्फ 14 साल की नन्ही सी उम्र में इनकी बहादुरी के चलते इन्हे 800 सैनिकों का लीडर बना दिया गया था।
लेखक सर हेनरी ग्रिफिन ने हरी सिंह को "खालसा मूर्ति" कहा है। ब्रिटिश शासकों ने हरी सिंह नलवा की तुलना नेपोलियन से भी की है।
हरी सिंह नलवा भी एक ऐसे ही शूरवीर का नाम है, जिसके भय से अफ़गानी दुश्मन पूरी तरह कांपते थे।
अफ़्ग़ानिओं के दिल में हरी सिंह नलवा की दहशत इतनी ज़्यादा थी कि आज भी अफगानी महिलाएं अपने बच्चों को 'नलवा रागले' (नलवा आया) बोल कर डराती हैं।
वह महाराजा रणजीत सिंह की सेना के मुख्य स्तम्भ कहे जाते थे। केवल 14 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी वीरता का ऐसा प्रमाण दिया कि उन्हें ‘बाघ मार’ अर्थात (बाघ को मारने वाला) तक कहकर बुलाया गया।
छोटी सी आयु में खूंखार बाघ का शिकार करने वाले हरी सिंह नलवा का जन्म 1791 में पंजाब के गुजरांवाला (पाकिस्तान) में पिता सरदार गुरदियाल सिंह तथा माता धरम कौर के घर हुआ। वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे, इसी कारण उन्हें घर से खूब दुलार मिलता था। लेकिन दुर्भाग्यवश महज़ 7 साल की उम्र में ही उनके सर से पिता का साया उठ गया।
साल 1798 में पिता की मृत्यु के बाद हरी सिंह को उनकी माता ने ही पाला। आगे चलते हुए महज़ 10 साल की आयु में ही इन्होंने अमृतपान करके एक सच्चा सिंह बनने के लिए गुरू के चरण पकड़ लिए।
जिस उम्र में बच्चों को खिलौनों का शौक होता है, उस उम्र में हरी सिंह ने अस्त्र शस्त्र तथा घुड़सवारी की शिक्षा का पूर्ण ज्ञान हासिल कर लिया था। उनके बल तथा पराक्रम का एक छोटा सा नमूना तब देखने को मिला जब 1805 में महाराजा रणजीत सिंह द्वारा प्रतिभा की खोज के लिए एक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इत्तेफाक से इस दौरान हरी सिंह भी अपनी एक विवादित ज़मीन का विवाद सुलझाने महाराजा रणजीत सिंह के पास पहुंचे थे।
यहाँ हरी सिंह ने महाराजा को बताया कि उनके दादा और पिता महाराजा के पूर्वजों महा सिंह और चेतर सिंह के अधीन अपनी सेवाएं दे चुके हैं। उसके बाद हरी सिंह ने प्रतियोगिता में भाला फेंकने, तीरंदाज़ी और घुड़सवारी में अपनी प्रतिभा का सर्वोच्च प्रदर्शन दिखाया। महाराजा रणजीत सिंह उनकी पृष्ठभूमि और छोटी सी उम्र में ही उनके इस बेहतरीन युद्ध कौशल से बहुत प्रभावित हुए।
हरी सिंह से प्रसन्न होकर महाराजा ने उन्हें अपने दरबार में अपने खास सहायक का पद सौंप दिया। परन्तु हरी सिंह को दरबार में नहीं अपितु युद्ध भूमि में अपना कौशल दिखाना था।
पंथ के जानकार बताते हैं कि महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी सेना की एक टुकड़ी, जिसमें 800 सैनिक थे, की कमान 14 वर्षीय बालक हरी सिंह के हाथों में सौंप दी थी। हैरान करने की बात तो यह थी कि इस नन्ही सी उम्र में न सिर्फ उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को संभाला बल्कि जंग में दुश्मनों के साथ पूरी ताक़त के साथ लोहा भी लिया।
हरी सिंह अपने युद्ध कौशल से लगातार कोई न कोई बड़ा कारनामा करते आ रहे थे, जिससे महाराजा से उनकी नजदीकियां काफ़ी हद तक बढ़ गयी थीं। वह अक्सर महाराजा के साथ शिकार के लिए जाया करते थे।
विद्वान बताते हैं कि एक बार शिकार के दौरान एक खूंखार बाघ ने महाराजा की सेना पर हमला कर दिया। बाघ का यह हमला हरी सिंह के ऊपर हुआ था, जिसकी वजह से उनका घोड़ा मारा गया। हमला इतना अप्रत्याशित था कि हरी सिंह को अपनी तलवार निकालने का मौका भी ना मिला।
अब क्या था, एक खूंखार बाघ अपने खूनी पंजों के साथ उन्हें दबोचने के लिए सामने मुंह खोले खड़ा था। ऐसी स्थिति में बड़े से बड़े वीर का साहस एक क्षण के लिए डोल जाना स्वभाविक होता है, परन्तु हरी सिंह बाघ के सामने खाली हाथ ऐसे खड़े थे, जैसे उन्हें पता ही ना हो कि डर किस बला का नाम है।
कहते हैं कि उन्होंने बड़ी फुर्ती के साथ अपने दोनों हाथों से बाघ का जबड़ा पकड़ लिया और देखते ही देखते अपने हाथों से उसका मुंह फाड़ डाला।
चौदह वर्ष के बालक द्वारा इस तरह की घटना के बाद सभी ने दांतो तले उंगली दबा ली। कहते हैं कि इस घटना के बाद हरी सिंह को ‘बाघ मार’ व 'नलवा' के नाम से जाना जाने लगा था।
इतिहास बताता है कि राजा नल शेरों का शिकार करने के लिए प्रसिद्ध थे। इसी कारण से बाघ को मारने के बाद हरी सिंह को महाराजा ने 'नल-वा' (राजा नल जैसा) कहा और उन्हें राजा नल के समान वीर मान कर उन्हें 'नलवा' कहा जाने लगा।
आपको बता दूं कि हरी सिंह नलवा की बहादुरी भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में फैली हुई है। साल 2014 में आस्ट्रेलिया की विश्वप्रसिद्ध पत्रिका ‘बिलिनियर अस्ट्रेलियनस‘ द्वारा जारी की गयी इतिहास के दस सबसे महान विजेताओं की सूची में सबसे पहला स्थान हरी सिंह नलवा को दिया गया।
इतना ही नहीं, यहां तक कहा जाता है कि जब अमेरिका-अफगानिस्तान युद्ध अपने चरम पर था, तब सभी अमेरिकी जनरल अपने सैनिकों में जोश भरने के लिए सिंह सूरमे हरी सिंह नलवा के किस्से सुनाते थे।
हरी सिंह के नाम से उस समय अफगानी थर-थर कांपते थे। कहा जाता है कि जंग के मैदान में दुश्मनों को हरी सिंह के दोनों हाथों में केवल तलवारें ही नहीं बल्कि अपना काल दिखता था। इनके वार में इतना दम था कि इनके मात्र एक वार से दुश्मन का सिर धड़ से अलग हो जाता था।
हरी सिंह नलवा ने 1813 में अटक, 1814 में कश्मीर, 1816 में महमूदकोट, 1818 में मुल्तान, 1822 में मनकेरा, 1823 में नौशहरा आदि समेत 20 से अधिक युद्धों में दुश्मनों के दांत खट्टे करते हुए ऐतिहासिक विजय प्राप्त कीं।
इतिहास की माने तो पता चलता है कि साल 1836 में उन्होंने जमरूद पर भी अपना कब्जा जमा लिया था। इसी बीच मार्च 1838 में महाराजा के पोते नौ निहाल सिंह की शादी का आयोजन रखा गया। इस समारोह में ब्रिटिश कमांडर इन चीफ़ को खास तौर पर न्योता भेजा गया। ब्रिटिश कमांडर इन चीफ़ के आगे अपनी शक्ति प्रदर्शन करने हेतु सारे पंजाब से सिपाहियों को बुला लिया गया।
इसका फायदा उठा कर दुश्मन ने जमरूद पर हमला करने की योजना बना रखी थी। उनको लगा था कि हरी सिंह नलवा शादी समारोह में भाग लेने के लिए अमृतसर चले गए थे, परन्तु ऐसा नहीं था। हरी सिंह को इस बात की भनक पहले ही लग चुकी थी कि उसके जाते ही जमरूद पर हमला हो सकता है। इसी कारण वह पेशावर में ही दुश्मनों का इंतजार करने लगे।
फिर वहीं हुआ जिसकी उम्मीद की जा रही थी। विरोधियों ने जमरूद पर चढ़ाई कर दी। हरी सिंह जी को वह खबर मिलते ही पेशावर से जमरूद पहुँच गए, जहाँ उनके सैनिक अफगानियों द्वारा हर तरफ से घिरे हुए थे। हरी सिंह के अचानक से युद्ध मैदान में आ जाने से अफ़गानी पूरी तरह से बौखला गए। उन्होंने उन पर हमला बोल दिया। वह जल्दी से जल्दी हरी सिंह को मार देना चाहते थे। क्योंकि उन्हें पता था कि जब तक हरी सिंह खड़े हैं, उनके मंसूबे पूरे नहीं हो सकते।
अब दोनों सेनाओं के बीच घमासान मच गया। तलवारों का वह खौफनाक शोर भले ही अफगानी खेमे में डर का मंज़र पैदा कर रहा था। इधर हरी सिंह का स्वास्थ्य ठीक नहीं था। बावजूद इसके उन्होंने दुश्मनों का गोला बारूद छीन लिया। हालांकि इस कोशिश में वह बहुत बुरी तरह से घायल हो गये थे। ऐसी स्थिति में उनका एक कदम भी आगे बढ़ाना आसान नहीं था। फिर भी अपनी धरती को बचाने के लिए उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वह लगातार दुश्मन को मारते रहे। इसी बीच एक सिपाही ने पीछे से आकर उन पर वार कर दिया।
वार इतना जोरदार था कि हरी सिंह नहीं बच सके और लड़ते लड़ते अपनी धरती की गोद में सदा के लिए सो गए। हरी सिंह जी दुश्मनों के दिलों में अपने बनाए हुए डर को जानते थे। इसलिए उन्होंने अपने सैनिकों को यह हिदायत दी कि उनकी मृत्यु की सूचना दुश्मनों को ना मिलने पाए। सैनिकों ने हरी सिंह की आज्ञा का पालन किया। उनकी शहीदी की खबर अफगानियों तक नहीं पहुँचने दी।
चूंकि, दुश्मनों के मन में हरी सिंह नलवा का खौफ़ इस तरह से पसरा हुआ था कि वह हरी सिंह की मृत्यु के बाद भी उन्हें जीवित समझ कर अपने स्थान से आगे नहीं बढ़े। कहते हैं वह एक सप्ताह तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे । इतने समय में लाहौर की खालसा फ़ौज यहाँ पहुँच गई और फिर अफगानियों को अपनी जान बचाकर वहां से भागना पड़ा।
इस तरह से हरी सिंह नलवा ने मृत्यु को प्राप्त कर लेने के बाद भी ना केवल जमरूद तथा पेशावर को बचाया, अपितु अफगानियों को उत्तर भारत की सीमाओं से भी खदेड़ दिया।
अपने पीछे वह एक ऐसा पंजाब छोड़ गये थे जो एक अच्छे भविष्य की आस रख सकता था। लेकिन हम लोग आज उनकी दी हुई सीख से आज कहीं अलग से हो गए हैं। इसलिए शायद आज हमें संकटों ने घेर लिया है। यदि हम आज भी पंथ के ऐसे शूरवीरों के दिखाए हुए मार्ग पर चलें तो यकीनन हम पुनः सपनों का देश बसा सकते है।
साथियो, यह लेख कई अलग अलग जगह से जानकारी जुटा कर लिखा गया है। यदि किसी को भी इसमें किसी भी तरह की कोई भी त्रुटि नज़र आती है तो वह इसे ठीक करने में मेरी मदद कर सकता है।
धन गुरू गोबिंद सिंह जी महाराज 🙏
आपका मित्र
कर्ण।