साफ-सुथरी भोजपुरी

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08/09/2021

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Jila Gajipur - Official Trailer | Amit Mishra "GoodLuck" | New Bhojpuri Movie | Bhojpuri Film 2021Chanda Cassettes Present “ Jila Gajipur ” a Latest New Bhoj...

17/03/2016

संक्रमण काल से गुजर रहा है भोजपुरी सिनेमा

आज से लगभग 50 साल पहले डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद, नाज़िर हुसैन और विश्वनाथ शाहाबादी जी जैसे लोगों ने भोजपुरी सिनेमा के लिए जो सपने देखे थे, आज लगता है कि वो सपने कहीं खो से गए हैं. अपनी भाषा और संस्कृति के संवाहक सिनेमा को आगे बढ़ाने की आज कोई कोशिश नहीं हो रही है. वैसे तो भोजपुरी सिनेमा के 50 साल होने को हैं, लेकिन आज की भोजपुरी फिल्मों को देखकर यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि हमारी भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री वो इंडस्ट्री नहीं रह गई है, जिसकी नींव भोजपुरी सिनेमा के पितामह नाज़िर हुसैन साहब ने रखी थी ।

आज भोजपुरी सिनेमा का एक बड़ा बाजार है, लेकिन इस बाजार में जो माल (फिल्में) तैयार हो रहा है और बिक रहा है, वह न सिर्फ भोजपुरी सिनेमा को, बल्कि पूरे भोजपुरी समाज को बदनामी के गर्त में ढकेल देने पर उतारू है. जिस भोजपुरी सिनेमा को भोजपुरीअस्मिता और भोजपुरी समाज का प्रतिनिधि होना चाहिए था, वही आज भोजपुरी की अस्मत उतारने पर उतारू है. अगर यह कहें कि आज भोजपुरी सिनेमा के नाम पर भोजपुरी भाषा व संस्कृति के साथ खुलेआम बलात्कार किया जा रहा है, तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।

आप आजकल की भोजपुरी फिल्में देख लीजिए और साथ ही हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में भी. आप पाएंगे कि अन्य भाषाओं के सिनेमा में जहां नए नए प्रयोग हो रहे हैं. कुछ सार्थक रचने की कोशिश हो रही है, भोजपुरी फिल्में फूहड़पन और वल्गैरिटी की कीचड़ में आकंठ धंसी हुई हैं. इक्का-दुक्का नाम छोड़ दें तो आज कोई भी यह कोशिश नहीं कर रहा है की कुछ अच्छा और सार्थक किया जाए, ताकि भोजपुरी सिनेमा फिर से अपने पुराने गौरव को दुहरा सके. आज सबकी कोशिश बस 100 का 1000 बनाने की है. कोई भी निर्माता, निर्देशक या कलाकार नया व अलग करने का जोखिम नहीं लेना चाहता. सभी एक बनी बनायी लीक पर चल रहे हैं.दरअसल यहां लोगों को यही पता नहीं है कि उन्हें बनाना क्या है. बस यह पता है कि उन्हें कमाना है और ये भोजपुरी फिल्मों के जरिए आसानी से हो जाता है. ऐसे लोगों को कथा-पटकथा से कोई खास मतलब नहीं है. गाने कहीं से चोरी किये हुए अश्लील व बाजारू, द्विअर्थी संवाद और उपर से दो आईटम डांस का तड़का. इन सब को मिला दीजिए, एक अदद भोजपुरी फिल्म तैयार हो गई ।

रचनात्मकता क्या होती है न जानते हैं न जानने की जरूरत है. आखिर उसमें दिमाग खपाना पड़ेगा. किसी भी फिल्म की सबसे प्रमुख चीज है पटकथा और यहां इसपर मेहनत करने को कोई तैयार हीं नहीं है. यहां सारा जोड़-तोड़ आईटम सॉन्ग और डांस पर केंद्रित है. भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री शायद इकलौती ऐसी फिल्म इंडस्ट्री होगी जहां स्क्रिप्ट फाइनल हो या ना हो फिल्म में आईटम नम्बर की संख्या और आईटम डांसर पहले फाइनल हो जाते हैं ।

पिछले 10 सालों में भोजपुरी सिनेमा ने काफी बदलाव देखें हैं और ये बदलाव अब भी जारी हैं. लेकिन विडम्बना यह कि ये जो बदलाव हैं वो बेहतरी के लिए नहीं भोजपुरी सिनेमा के स्तर को और गर्त में ले जाने के लिए हो रहे हैं. दरअसल यह भोजपुरी सिनेमा के लिए संक्रमण काल है. इंतजार इस संक्रमण के दौर के खत्म हो जाने का है, फिर यकीनन भोजपुरी सिनेमा बेहतरी और कामयाबी की नई इबारत लिखेगा. डर बस यह है कि इस इंतजार में कहीं देर न हो जाय और भोजपुरी सिनेमा के आखिरी बचे दर्शकों का भी भोजपुरी सिनेमा से मोहभंग न हो जाए.

राघवेन्द्र आर सिंह
भोजपुरी पटकथा लेखक

http://www.facebook.com/rpsingh.faizabad

01/11/2014

भोजपुरी सिनेमा के चिट-पट

उतार-चढ़ाव सभे के जिनगी में आवेला। भोजपुरी सिनेमा के जिनगी में भी उतार-चढ़ाव आएल बा। आगे अइबो करी। लेकिन समझदार लोग बितल समय से कुछ सीख लेला कि आगे कवनो अइसन गलती ना होखे, जवना से फेर उहे हाल हो जाए। सुरू में तअ भोजपुरी सिनेमा खूब चमकल, खूब चलल। राजश्री प्रोडक्शन के साथे-साथे हिन्दी सिनेमा के बड़का-बड़का कलाकार लोग भोजपुरी में आ गइलन। भोजपुरी सिनेमा के पूरा दुनिया में धूम मच गइल। बाकि भोजपुरी के ई सौभाग्य दस बारह साल से जादा ना रह पाइल।दाम के बल पर दांव खेलेवाला लोग भोजपुरी सिनेमा के अइसन हाल करअ देलस कि भोजपुरी सिनेमा के कलाकार लोगन के उ बुरा हाल भइल कि अब का कहल जाव।हाल ई रहे कि कब फ़िल्म आवे, कब जावे, केहू के पतो ना चले। ई काल भोजपुरी सिनेमा खातिर अंधकार युग रहे। ई समय 1982 से 2002 तक के रहे। एह समय में साल दु साल में एगो दुगो फिल्म बने।लेकिन सोचे के बात ई बा कि आखिर कौन कारण रहे कि 1982 के बाद भोजपुरी में सिनेमा बनल बंद हो गइल? लोग काहे भोजपुरी सिनेमा देखल छोड़ देलक? सब लोग हिन्दी सिनेमा के ही दीवाना काहे हो गइल? ई घटना तमिल, तेलगू, कन्नड़ आउर मलयालम सिनेमा के साथे काहे ना घटल?एकरा कारण पर जादा दिमाग खपावला के जरूत नइखे। तनिसा दिमाग लगाईं पूरा बात समझ में आ जाई। एकर मुख्य कारण रहे भोजपुरी सिनेमा के स्तर। समय के साथ भोजपुरी सिनेमा सयान ना भइल, बल्कि नादाने रह गइल।भोजपुरी सिनेमा के स्तर एतना नीचे गिरा देलक लोग कि गंदा-गंदा सीन आउर गीत देख सुन के लोग उब गइल।भोजपुरी सिनेमा के इतिहास में नया रचना ना भइल। जइसे तमिल, तेलगू, कन्नड़ आउर मलयालम में भइल। आज तक एको भोजपुरी सिनेमा अइसन ना बनल, जवना के रिमेक हिन्दी आ दोसरा भासा में बनल होखे। जबकि तमिल, तेलगू, कन्नड़ आउर मलयालम सिनेमा के रिमेक दुनिया के कई भाषा में बनल बा। हअ, बाकि भोजपुरी लोकगीत आउर लोक धुन के रिमेक हिन्दी सिनेमा में खूब बनल बा। हर राष्ट्रीय भा क्षेत्रीय सिनेमा में कुछ अइसन कलाकार होले जेकर मान सम्मान पूरा दुनिया करेला। बाकि भोजपुरी सिनेमा में आज तक ऐगो अइसन कलाकार पैदा ना भइले जेकर नाव पूरा दुनिया का भारतो में लोग जानत होखे।

बाजारवाद के समय बा।

पइसा हर चीज के पैमाना बन गइल बा।एही पैमाना पर अब कुछ लो कुछ दाम कमा लेले बा। तनि नाम कमा ले ले बा। 2002में आइल ‘’ससुरा बड़ा पइसावाला’’ एकर आछा उदाहरण बा। बाकि भोजपुरी सिनेमा के जवनहाल बा उ बड़ले बा।अशुद्ध संवाद, अश्लील सीन, दुअर्थी संवाद, हिन्दी के कॉपी कहानी, हेरफेर कइल संगीत, अनचलू हीरोइन, हिन्दी के रिटायर आ भोजपुरी के चालू किस्म के गायक अभिनेता।कुल मिलाके इहे भोजपुरी सिनमा के विश्वस्तरीय पहचान बन गइल बा। ई पहचान कब डूब जाई भगवान जानस। 1982 के बाद डूबल रहे, फेर उहे हाल मत हो जावो। काहे कि अबही जवन भोजपुरी सिनेमा खाली कमाऊ आउर उबाऊ बनतअ। ई कमाऊ-उबाऊ सांचा कब टूट जाई केहू नइखे जानत। केद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सलाना रिपोर्ट के मुताबिक 2010 में भोजपुरी में कुल 67 गो फिलम बनल रहे।जवना में कुल 13 गो के ‘‘यू’’ प्रमाण-पत्र मिलल रहे। 39 गो ‘‘यूए’’ आउर 15 गो के ‘‘ए-एडल्ट’’ मिलल रहे।अब ई आंकड़ा 2011 में देखीं। कइसे उतार –चढ़ाव आवता। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के सलाना रिपोर्ट के मुताबिक 2011 में भोजपुरी में कुल 74गो फिलम बनल। जवना में 8 गो के ‘‘यू’’ प्रमाण-पत्र मिलल। 22 गो के ‘‘यूए’’ कैटगरी मिलल। 44 गो ‘‘ए-एडल्ट’’ प्रमाण-पत्र मिलल। अब अंदाजा लगा लीं कि 2010 में 12 गो ‘‘यू’’ और 2011 में 8 गो ‘‘यू’’ प्रमाण-पत्र मिलल।आछा फिलम के संख्या घटते आवता और अश्लील फिलम के संख्या बढ़त जाता। 2010 में 15 गो तअ 2011 में 44 गो ’’ए-एडल्ट’’ बनल।अब अंदाजा लगा लीं कि भोजपुरी सिनेमा के कवन राह पकड़ले बा। ई राह भोजपुरी सिनेमा के कहंवा ले जाई। अंदाजा लगावल मुसकिल नइखे। भगवान मत करअस कि 1982-2002 अंधकार युग वाला समय फेर आ जावो। दक्षिण भारत के फिल्मी कलाकार से भोजपुरी सिनेमा के कलाकार लोग के कुछ सिखे के चाहीं, आखिर फिलम सुटिंग करे दक्षिणे भारत नू जाला लोग।

राघवेन्द्र आर सिंह
भोजपुरी पटकथा लेखक

18/10/2014

अवश्य पढ़े। धन्यबाद ।।

अच्छे लेखकों को अहमियत देनी होगी-- जीतेन्द्र सुमन

जिसने कभी बिहार-यूपी के गांवों में, पूस की ठिठुरती रात में सियारों का सप्तम सुर न सुना हो... सावन की झड़ी से लबलबाते खेतों के किनारे बैठे मेढकों का समवेत गान न सुना हो...जेठ की तपती दुपहरी में पीपल की फुनगी पर बैठी कोयल की कूक न सुनी हो...वह लेखक कभी भी अच्छी भोजपुरी फिल्म नहीं लिख सकता! और अच्छी भोजपुरी फिल्में लिखनेवाले चंद लेखकों में नाम आता है जीतेन्द्र सुमन का.बिहार के ज़िला भोजपुर, ग्राम बड़कागाँव के मूल निवासी जीतेन्द्र सुमन ने पटना विश्वविद्यालयसे मनोविज्ञान में एम.ए. किया. फिर सिन्हा लायब्रेरी, पटना से पुस्तकालय विज्ञान में डिग्री ली. रंगमंच पर बतौर अभिनेता राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय नाट्य प्रतियोगिताओं में कई पदक प्राप्त किये...और उसके बाद 1984 में सीधे मायानगरी मुम्बई का रास्ता पकड़ लिया. यहां आकर इन्होंने अपने फिल्मी कैरियर की शुरुआत सहायक निर्देशक के रुप में की. उसके बाद धीरे-धीरे लेखन से जुड़ गए। निस्संदेह इतने लम्बे अनुभव के पश्चात, सिनेमा के प्रति लेखक का नजरिया एक खास अहमियत रखताहै. हम जीतेन्द्र सुमन के उसी नजरिये को इस साक्षात्कार के माध्यम से यहां प्रस्तुत कर रहेहैं ।

भोजपुरी हर दस-पंद्रह किलोमीटर पर बदल जाती है. ऐसे में कहां की भोजपुरी ‘’मानक बोली” मानी जाये ?

मानक किसी ने माना नहीं है...जबकि क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों के लिए मानक भाषा का निर्धारण एकदम ज़रूरी है. अन्यथा जो लेखक-गीतकार जहाँ का होगा, जिस क्षेत्र का होगा, उस क्षेत्र की भाषा उस फिल्म में दिखेगी. और उसकी हानि यह होगी कि उस क्षेत्र के दर्शक के अलावा और किसी भाग का दर्शक उस फिल्म से जुड़ नहीं पाएगा...सभी क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों ने अपनी एक मानक भाषा रखी है...मैं अपवाद की बात नहीं करता...इसलिए मुझे लगता है कि हम तमाम लेखकों को एकमत होकर एक मानक भाषा ज़रूर तय करनी चाहिए ताकि फिल्म का आनन्द सभी क्षेत्रों और राज्यों के दर्शक भरपूर उठा सकें...वर्ना “अपनी डफली, अपना राग” से पाएंगे कुछ नहीं, सिवाए खोने के...मेरे विचार से मानक भाषा भोजपुर और पूर्वी उत्तर प्रदेश यानी बनारस की बोली का मिश्रण हो फिल्मों में तो संवाद मधुरता और लोकप्रियता दोनों ही बढ़ जाएगी...

समसामयिक कथानकों और बिहार-यूपी की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं पर फिल्में क्यों नहीं बनतीं ? विषय-प्रधान फिल्मों का निर्माण क्यों नहीं हो रहा ?

यह सवाल फिल्ममेकर की दृष्टि से जुड़ा हुआ है...जिसकी दृष्टि जितनी सम्पन्न और पैनी होगी, वह वहाँ तक पहुँचेगा...विषय-प्रधान फिल्में नहीं बनने का दूसरा कारण है- भय...आर्थिक नुकसान का भय...इसलिए फिल्ममेकर फॉर्मूले से बाहर नहीं आ पाते ।

विषय-प्रधान फिल्में मराठी और तमिल में खूब बनती हैं, वहां आर्थिक क्षति का भय क्यों नहीं होता ?

इसलिए कि वहाँ के लोग “जात भी गँवाया और भात भी न खाया” वाली मानसिकता के नहीं हैं... वो पहले काम करते हैं रिज्लट नहीं सोचते. क्योंकि एक फैक्टर है- अच्छे काम का अच्छा नतीज़ा. वो रिस्क लेते हैं, हम नहीं लेते. रिस्क उठाने का माद्दा भी तो होना चाहिए. या फिर जुनून हो. आप जिस अंतर की बात कर रहे हैं, उस अंतर का कारण है कहीं न कहीं असंतोष, चाहे वो जिस भी चीज़ का हो. दूसरा हमने इसे केवल अपने प्रोफेशन के रूप में अडोप्ट किया है. भोजपुरी फिल्म को पैशन नहीं बनाया है, जबकि वहीं मराठी या तमिल या अन्य किसी भी भाषा की फिल्म से जुड़े लोगों में पैशन है. उनमें अपने काम के प्रति समर्पण भाव है ।

आजकल की फिल्मों के मुख्य चरित्र (नायक-नायिका-खलनायक) विचित्र वेश-भूषा में नज़र आते हैं. इस तरह से वे खुद को स्वाभाविकता से कोसों दूर कर लेते हैं. इसके पीछे क्या कारण है ?

देखिए, ये सारी बातें व्यक्ति के सोच पर निर्भर करती हैं, उसके आत्मविश्वास पर निर्भर करतीहैं. स्वाभाविकता की सही परिभाषा जानना ज़रूरी है कि आखिर यह स्वाभाविकता भला है क्या बला?वेश-भूषा से शीर्ष पर पहुँचने या स्टार बनने के सोच रेत पर महल बनाने के समान है. निर्देशकों को लगता है कि हम अपने इन तीन पात्रों को सामान्य से अलग कर देंगे, तो किसी बहुत भारी फल की प्राप्ति हो जाएगी, जबकि ऐसा होता नहीं है. यह कथानक और मौलिकता से अलग जाने का संकेत है. यह दोष स्टारों की चापलूसी की वजह से है. फिल्मकारों को इससे निकलना होगा. निर्देशक को अपना महत्व समझना होगा. लेखक को महत्व देना होगा, तभी यह अस्वाभाविक प्रक्रिया बंद होगी, अन्यथा तो जै-जै सियाराम चल ही रहा है ।

आपके अनुसार चरित्र की स्वाभाविकता क्या है ?

चरित्र की स्वाभाविकता से मेरा अभिप्राय है कि चरित्र को हम किस तरह से गढ़ रहे हैं. हम फिल्म किसकी और किसको ध्यान में रखकर बनाते हैं. जैसे हम superficial चरित्र दिखाते हैं, तो क्या हमारे जीवन में या हमारे आस-पास, वैसे चरित्र होते हैं क्या? निश्चित रूप से नहीं. और जो इत्तफाकन होते हैं, वे अपवाद होते हैं. वे मुख्यधारा के चरित्र नहीं गिने जाते, फिर भी जब उसे हम कथानक का पात्र बनाते हैं, उसका चरित्र गढ़ते हैं, तो हम उसमें विश्वसनीयता समोते हैं. अवास्तविक से चरित्र को भी वास्तविक सा गढ़ते हैं. जैसे हनुमान के चरित्र को ही लीजिए. बेहद अवास्तविक सा चरित्र है, मगर उस चरित्र को इस तरह से गढ़ा गया है कि वह हमें वास्तविक लगता है ।

लगभग हर निर्देशक भोजपुरी फिल्म बनाने के समय कहानी में लेखक से भोजपुरी संस्कृति का समावेश करने पर ज़ोर देता है. पर फिल्मी पर्दे पर वह “संस्कृति” गायब दिखाई देती है. आपकी दृष्टि में संस्कृति क्या है ?

संस्कृति तब दिखेगी, जब फिल्म में मानवीय संस्कार और संस्कारवान व्यक्तियों-परिवारों की कहानी कही जाएगी, जब आप कहानी ही लफंगों की कहेंगे, तब संस्कार और संस्कृति कैसे दिखेगी ?संस्कार और संस्कृति का तात्पर्य खान-पान और पहनावे के साथ-साथ मानवीय विचार, व्यवहार और उसकी सुधारवादी परंपराओं से है. देश में औद्योगीकरण और नगरीकरण की प्रक्रिया ने हमारे जीवन-स्तर में कई सकारात्मक और नकारात्मक परिवर्तन किये हैं, उनका प्रभाव हमारी संस्कृति पर भी पड़ा है और हमारी फिल्में भी उनसे अछूती नहीं हैं. अब संस्कृति और अपसंस्कृति का फर्क लेखक को समझ में आना चाहिए. दुखद यह है कि भोजपुरी फिल्मों में जड़ता को ही संस्कृति समझ लिया जाता है. लेखक खुद संस्कृति को नहीं समझ पा रहे हैं. और भोजपुरी फिल्मों में दिक्कत यह है कि अच्छे लेखकों की कीमत नहीं है. यहाँ हीरो का चमचा सबसे बड़ा लेखक है।

भोजपुरी फिल्मों में तकनीकी गुणवत्ता का अभाव तो है ही, कथानक में मौलिकता का भी जबर्दस्त अभाव है. ज़्यादातर कहानियां हिन्दी फिल्मों से चुराकर लिखी जा रही हैं. आप इसकी क्या वजह मानते हैं ?

नहीं, अब तो तकनीकी गुणवत्ता आ गयी है. ऐसा नहीं कह सकते कि उसका अभाव है. आज के सारे निर्देशक उस तकनीक का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं. हाँ, यह बात अवश्य विचारणीय है कि उसका उपयोग कैसे और कितनी दक्षता से किया जा रहा है. किसी भी तकनीक का उपयोग व्यक्ति की बुद्धि और कौशल पर निर्भर करता है. रही बात कहानियों की तो हमें खुद पर विश्वास नहीं है. हम मान चुके हैं कि भइया हमारे पास इतनी बुद्धि नहीं है कि अच्छी कहानी, समसामयिक कहानी लिख सकें.बिना चोरी किये फिल्म लिखने के लिए हमें खोजी बनना होगा. हमें पढ़ना होगा. बिना उसके नकल तो नहीं रुकने वाली. और दूसरी बात जो सबसे महत्वपूर्ण है, वह यह कि जो भाषा लिखना-पढ़ना जानता है, सी. डी. देखकर लिख सकता है. लेकिन सीडी देखकर कोई भी लेखक नहीं बन सकता. अगर ऎसे लेखकों के भरोसे भोजपुरी फिल्में बनती रहीं, तो फिर स्वर्णिम भविष्य की आशा मत कीजिए. अरे भाई, लेखकों पर भरोसा तो करो, उसे अपना सर्वोत्तम देने का मौका तो दो. ठीक है आप पैसे लगा रहे हैं, आप निर्णय लेने को स्वतंत्र हैं, मगर फिल्म प्रोडक्ट नहीं है, यह रिश्तों और भावनाओं से गढ़ा गया जीवन है. और जीवन गढ़ना व्यापारियों का नहीं शिल्पकारों का काम है ।

कहानियों में मौलिकता बिल्कुल नहीं है. पटकथा भी बिना चप्पू की नाव की तरह इधर-उधर डोलती नज़र आती है. संवाद की तो पूछिये ही मत. अक्सर कई फिल्मों में इस तरह के संवाद सुनने को मिलते हैं, “रऊआ कहां जात बाड़S”. आखिर दर्शकों को ये सब कबतक झेलना पड़ेगा?

तबतक जबतक साँप और रस्सी का फर्क समझ नहीं आ जाएगा. मौलिकता के लिए ज्ञान का होना ज़रूरी है. पठन-पाठन ज़रूरी है लेखक के लिए. जबतक हमारे पास ज्ञान का भंडार नहीं होगा हम नहीं समझ पाएंगे कि मौलिक क्या है और नकल क्या. रही बात पटकथा की तो सर, पटकथा लेखन बहुत ही technical विधा है, बिल्कुल सर्जरी की तरह. इसके साथ खिलवाड़ समझ लीजिए प्राणघाती ही है. आज तो हाल यह है कि सबके पास कहानी है और सभी पटकथा लिखते हैं. बिल्कुल मास्टरी है सबकी. दुर्भाग्य है कि हम बिना तैरना सीखे देखा-देखी में सागर में कूद जाते हैं. फिल्म की रीढ़ होती है पटकथा. मगर दुखद तथ्य यह है कि भोजपुरी फिल्मों में स्किल्ड लेखक नहीं के बराबर ही काम कर रहे हैं ।

आजकल भोजपुरी फिल्मों के नाम हिन्दी फिल्मों से उड़ाकर रखे जाने का प्रचलन चल पड़ा है. भोजपुरी सिनेमा पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा ?

बुरा असर पड़ेगा, बल्कि पड़ रहा है. गालियाँ मिल रहीं हैं. यह भी एक प्रकार से संस्कृति को रौंदना ही है..

शुरुआती दौर की फिल्मों और वर्त्तमान दौर की फिल्मों में लेखन के स्तर पर कैसा अंतर नज़र आता है आपको?

इस विषय पर क्या कहूँ... समय के साथ लेखन भी बदलता है, लेकिन भोजपुरी फिल्मों में जिस तरह का बदलाव आया वह फूहड़ है, गंदा है, लिजलिजा है. भोजपुरी समाज में कहानियों की कमी नहीं है,किंतु आज के भोजपुरी फिल्मकार और लेखक उसे पहचान नहीं पा रहे हैं. सब कुछ जीवन में है, समाज में है. अच्छा भी और बुरा भी.सुन्दर भी और लिजलिजा भी लेकिन किसको कब, कहाँ और कैसे प्रस्तुत करना है, इसका ज्ञान बहुत ज़रूरी है. फिल्म भी एक तरह का डॉक्यूमेंटशन ही है, जो सदियों बाद भी हमारे समाज, हमारी संस्कृति का प्रमाण देगी. इसे सोचना ज़रूरी हैं ।

ज़्यादातर फिल्मों में हर दस मिनट पर गाना और पंद्रह मिनट पर माड़धाड़ दिखाया जाता है. निर्माता-निर्देशक यह भी कहते हैं, आयटम सॉंग के बिना फिल्में बिकती नहीं. कथानक पर उतना बल नहीं दिया जाता. क्या फिल्मों को चलाने का यही एकमात्र फॉर्मूला है ?

यह प्रदूषित मानसिकता का प्रमाण है. जबकि सच्चाई यह है कि item song वाली फिल्म भी बिकती नहीं है. निर्माता-निर्देशक मुगालते में जीते हैं. यह सबको समझना चाहिए कि गुलाब का महत्व, उसकी सुन्दरता जितनी समग्रता में है, उतनी उसकी टूटी हुई पंखुड़ियों में नहीं है.हम बहुमंजिली इमारत बनाने का इरादा तो रखते हैं, पर जब बनाने चलते हैं तो दलदल पर बनाने लग जाते हैं. और नतीज़ा यह होता है कि एक दिन जब इमारत गिरती है तो दबकर मरनेवाले की चीख भी नहीं निकलती. ये आयटम सांग, फाइट, कॉमेडी, ये सब अंग हैं, मूल आत्मा नहीं. आत्मा कहानी है, उसको पकड़ने की ज़रूरत है ।

भोजपुरी इंडस्ट्री में लेखकों की वर्त्तमान दशा पर आपकी टिप्पणी ? उनकी दशा को बेहतर बनाने के लिए फिल्म राईटर्स असोसिएशन क्या ठोस कदम उठा सकता है ?

जब निर्मातों-निर्देशकों ने भोजपुरी फिल्म के स्टैंडर्ड को इतने ऊपर तक उठाया है, तो भोजपुरी फिल्म के लेखकों को भी मुंशी के पद से ऊपर उठाएँ. यह समझें कि वह ही आपके राजमहल की नींव का पहला पत्थर है जिसके कारण आप उस राजमहल के मालिक होते हैं और उसके सुख को भोगतेहैं. प्लीज पहचानें लेखक की अहमियत को मित्रों. निश्चित तौर पर फिल्म राईटर्स असोशिएशन बहुत कुछ कर सकता है और कर रहा है. पिछले दिनों भोजपुरी के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर पर कार्यक्रम हुआ, फिर भोजपुरी फिल्म लेखकों के लिए लेखन को लेकर एक दिन का वर्कशॉप हुआ. सुना है अगले महीने पुरबी के जनक महान भोजपुरी गीतकार महेन्दर मिसिर पर एक कार्यक्रम करने जा रहा है. ये सब बड़े ही सकारात्मक कदम हैं ।
राघवेन्द्र आर सिंह
भोजपुरी पटकथा लेखक

http://www.facebook.com/rpsingh.faizabad

24/09/2014

वर्ष 2016 में भारतीय सिनेमा ने अपने एक सौ दो वर्ष पूरे किये साथ ही भोजपुरी सिनेमा ने अपना अर्द्धशतक लगाया। 1963 में प्रदर्शित विश्वनाथ शाहाजादी की फिल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’से भोजपुरी सिनेमा की शुरूआत होती है। हालांकि मुम्बई के फिल्म उद्योग में 20वीं सदी के पांचवे दशक में भोजपुरी के कई लेखक कवि कलाकार सक्रिय थे। हिन्दी फिल्मों से भोजपुरी के प्रथम परिचय का श्रेय बरहज के मोती बी0ए0 का दिया जाना चाहिए जिन्होंने ‘फिल्मीस्तान’ स्टूडियों में अशोक कुमार तथा निर्माण विभाग के कर्ता-धर्ता शशिधर मुखर्जी को एक गीत सुनाया जिसके बोल थे-

‘काटेना कटे मोरा दिनवा, गवनवा कब होई।
पिया के अगनवा मिलनवा कब होई।

यह गीत ‘एक कदम’ फिल्म के लिए रिकार्ड किया गया था पर यह फिल्म प्रदर्शित नहीं हुई।पचास के दशक में जब आजादी के बाद भाषाई आधार पर भारत का पुनर्गठन हो रहा था। उसी दौर में फिल्म उद्योग की भी दशा और दिशा में बदलाव हो रहा था। सत्यजीत रे ने “पाथेर पांचाली” बनाकर प्रादेशिक अथवा आंचलिक भाषाओं में सिनेमा बनाने की संभावना की और बल दिया। भोजपुरी सिनेमा बनाने की तत्कालीन समय में ललक इस एक प्रसंग में भी दिखती है जब कलकता से प्रकाशित होने वाली पत्रिका “भोजपुरी” के सम्पादक रघुवंश नारायण सिंह को 6 मई 1954 को सनराइजपिक्चर के प्रबंधन जवाहर चतुर्वेदी ने एक पत्र लिखा- “ए सवाल पर विचार करे खातिर कुछ छन दिहल जाय। का ई सम्भव बा कि उत्तर प्रदेश औ बिहार के स्थानीय भाषा में सिनेमा बनावल जा सकेला”। सन् 1961 में नितिन बोस के निर्देशन मे बनी “गंगा जमुना” में पहली बार अवधी भाषा संवाद का इस्तेमाल और भोजपुरी गीतों के प्रयोग ने भारतीय बोलियों में फिल्म निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।

काशी से हुई विधिवत शुरूआत- भोजपुरी सिनेमा के क्षेत्र में काशी ने नेतृत्वकर्ता की भूमिकापर्दे पर तथा पर्दे के पीछे दोनों रूपों में निभाई। सन् 1961 में ही जब फिल्म उद्योग भयंकर मंदी के दौर से गुजर रहा था और ऊँचे “स्टार कॉस्ट” की वजह से फिल्म बनाना कठिन कार्य था तब बनारस ने इसकी अगुवाई की।

बिहार के धनबाद के गिरीडीह के अभ्रक व्यापारी विश्वनाथ प्रसाद शाहाबादी जिन्हें भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ0 राजेन्द्र प्रसाद ने भोजपुरी में फिल्म बनाने के लिए प्रेरित किया था वे मुम्बई पहुंचे। दादर में प्रीतम होटल में नजीर हुसैन से मिले जो वर्षों से एक पटकथा तैयार करके भोजपुरी फिल्म बनाना चाहते थे। इस प्रकार जनवरी 1961 में नजीर हुसैनके नेतृत्व में ‘गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो’ के निर्माण की योजना बनी। फिल्म का निर्देशन बनारस के कुंदन कुमार को सौंपा गया। बिहार के गीतकार शैलेन्द्र को गीत और संगीत निर्देशन की जिम्मेदारी चित्रगुप्त को दी गयी। बनारस के ही रहने वाली कुमकुम और असीम को फिल्म में नायिका और नायक बनाया गया तथा खलनायक के रूप में बिहार के रामायण तिवारी ने भूमिका निभाई। 16 फरवरी 1962 को पटना के ऐतिहासिक शहीद स्मारक पर फिल्म का मुहुर्त सम्पन्न हुआ। फिल्म की शूटिंग का भी श्री गणेश वाराणसी से हुआ इस प्रकार पूरी यूनिट बनारस आई। जहां नायक असीम कुमार के जंगमबाड़ी स्थित बंगले पर सभी कलाकार रूके। केवल नाजीर हुसैन और नायिका कुमकुम होटल डी पेरिस में ठहरे।

सन् 1963 में फिल्म के बनके तैयार हो जाने पर फिल्म का मुम्बईया फिल्म की तरह प्रीमियर हुआ। बनारस में पहली बार किसी फिल्म का प्रीमियर हुआ प्रकाश टाकीज में हुए इस प्रीमियर में शहर के गणमान्य लोगों को आमंत्रित किया गया था जिसमें पत्रकार मोहन लाल गुप्त(भैया जी बनारसी) कृष्णदेव प्रसाद गौंड, बृजपाल दास, सुधाकर पाण्डेय जैसी हस्तियां थी। प्रदर्शन के एक सप्ताह के भीतर ही फिल्म की खबर दूर-दूर तक फैल गयी। प्रकाश टाकीज के बाहर लोगों का तांता लगने लगा और कहा जाने लगा “गंगा नहा, विश्वनाथ जी के दरसन कर।, गंगा मइया देख आ तब घरे जा।

इसके बाद भोजपुरी फिल्म निर्माण में काफी तेजी आई 1963 से लेकर 1967 के बीच सौ से ज्यादा भोजपुरी फिल्म बनी जिनमें लागी नाहीं छूटे रामा, विदेशिया हमार संसार, बलमा बड़ानादान, कब होई गवना हमार आदि फिल्मे रहीं।

यहाँ 1964 में प्रदर्शित विदेशिया का उल्लेख आवश्यक होगा जिसमें भोजपुरी के सर्वाधिक प्रतिष्ठित नाटककार और कवि भिखारी ठाकुर को गाते हुए दिखाया गया है। जिनको पर्दें पर जीवित देखना भोजपुरी को सिनेमा जैसा सशक्त माध्यम मिले बिना सम्भव नहीं था। इस प्रकार भोजपुरी फिल्मों में बनारस की सहभागिता प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से बनी हुई है। भोजपुरी में फिल्म निर्माण के तेजी के दौरान कई फिल्मे फ्लाप भी हुई क्योंकि भोजपुरी से अनजान लोग भी इस क्षेत्र में कूद पड़े और जल्दी ही भोजपुरी के मिठास फिल्मों से खोने लगी और एक दशक तक भोजपुरी फिल्म निर्माण क्षेत्र में सन्नाटा छा गया।

लम्बे समय बाद फिल्म दंगल (1977) से भोजपुरी का रंगीन दौर शुरू हुआ जब सामन्तवादी ठाकुर और परिवर्तनवादी नायक के संघर्ष पर निर्देशक रवि कुमार व निर्माता बच्चू भाई शाह ने फिल्म बनाई जिसमें बनारस के सुजीत कुमार तथा प्रेमनारायण, राम सिंह, शोभाखोटे, अरूणा ईरानीने अभिनय किया गया था। इस दौर की उपलब्धि रही कि फिल्म ‘गंगा किनारे मोरा गांव’ जिसके निर्देशक दिलीप बोस निर्माता अशोक जैन और कलाकारों में कुणाल के साथ जाज, गौरी खुराना, अरुणा ईरानी, हरीश, जय श्री आदि थे। इस फिल्म में चित्रगुप्त के संगीत ने धूम मचा दी थी। यह फिल्म बनारस छपरा पटना, गोरखपुर के अलावा मुम्बई के मिनर्वा टाकीज में चार हफ्ते से ज्यादा चली और उस दौर में यह मॉरीशस में प्रदर्शित हुई और पुनः 20-28 फरवरी 2000 में द्वितीय भोजपुरी महासम्मेलन (मॉरीशस) में भी प्रदर्शित हुई थी।भोजपुरी फिल्मों में बनारस में बोली जाने वाली कासिका को लाने का श्रेय एस0एन0 त्रिपाठी फिल्म ‘विदेशिया’ में किया था। कुमकुम द्वारा निर्मित फिल्म-लागी नहीं छूटे राम और नाजिर हुसैन कि हमार संसार में भी यही बोली रही।

इस प्रकार बनारस से शुरू हुआ भोजपुरी फिल्मों का सफर बदस्तूर जारी है और भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के रूप में फल-फूल रहा है, भोजपुरी सिनेमा ने ना सिर्फ भारत बल्कि विश्व के अनेक देशों में लोकेशन शूटिंग से लेकर प्रदर्शन तक का सफर तय किया है। नये कलाकारों में रवि किशन, मनोज तिवारी, दिनेश लाल यादव (निरहुआ) के साथ हिन्दी सिनेमा के दिग्गज कलाकार (अरूणा ईरानी, अरूण गोविल, राज बब्बर, रजा मुराद) भी भोजपुरी सिनेमा में काम कर रहे हैं। सन् 2006 में प्रदर्शित गंगा, में महानायक अमिताभ बच्चन ने भी अभिनय किया। भोजपुरी फिल्म का उद्योग सलाना 1000 करोड़ रुपये का हो गया है और फिल्मे करोड़ों में व्यवसाय कर रही है। मनोज तिवारी, अभिनीत, “ससुरा बड़ा पइसा वाला” कमाई के नये रिकार्ड बनाये हैं और दर्शकों में मॉरीशस, सूरीनाम, वेस्टइंडीज, फिजी, नेपाल, जैसे देशों को शामिल किया। बनारस में भोजपुरी सिनेमा को बहुत सी प्रतिभाएं दी है जिनमें कलाकारों में स्व0 कन्हैया लाल, लीला मिश्रा, कुमकुम, सुजीत कुमार, पदमा खन्ना, साधना सिंह, नारायण तिवारी, मधु मिश्रा, जे0 मोहन, देव मलहोत्रा, केवल कृष्ण, रत्नेश्वरी, रामचन्द्र विश्वकर्मा, पूनम मिश्रा, सोनी राठौर, अशोक सेठ, मास्टर संजय, स्मृति मिश्रा, मनोज तिवारी, दिनेश लाल यादव निर्माता-निर्देशकों की कड़ी में कुन्दन कुमार, देवी शर्मा, सुन्दर दार, हरिमोहन सिंह आदि थे।

राघवेन्द्र आर सिंह
भोजपुरी पटकथा लेखक

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17/01/2014

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