11/08/2026
बहुत समय पहले की बात है, जब बैकुंठ लोक दिव्य प्रकाश से जगमगा रहा था। चारों ओर शंख की मधुर ध्वनि गूंज रही थी और देवता भगवान श्रीहरि के दर्शन के लिए उपस्थित थे। उसी समय वीणा बजाते हुए नारद मुनि वहां पहुंचे और उनके मुख से “नारायण, नारायण” की ध्वनि सुनाई देने लगी। माता लक्ष्मी ने अपने प्रिय भक्त को देखा तो उनके चेहरे पर प्रसन्नता छा गई। उन्होंने नारद मुनि का प्रेमपूर्वक स्वागत किया और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर कहा, “वत्स, आज मैं तुम्हारी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूं। मांगो, जो इच्छा हो मांग लो।” नारद मुनि ने हाथ जोड़कर कहा, “माता, यदि आप सचमुच प्रसन्न हैं तो मुझे कोई धन, वैभव या रत्न नहीं चाहिए। मुझे केवल भगवान श्रीहरि के चरणों से स्पर्श हुआ दिव्य महाप्रसाद चाहिए।”
नारद मुनि की यह बात सुनते ही माता लक्ष्मी कुछ क्षणों के लिए मौन हो गईं। उनकी प्रसन्नता अचानक चिंता में बदल गई। क्योंकि उन्होंने अपने भक्त को वचन तो दे दिया था, लेकिन भगवान श्रीहरि की आज्ञा भी थी कि वह दिव्य प्रसाद किसी को नहीं दिया जाना चाहिए। अब माता लक्ष्मी के सामने धर्म का कठिन प्रश्न खड़ा था। एक ओर अपने स्वामी की आज्ञा थी और दूसरी ओर अपने भक्त को दिया हुआ वचन। नारद मुनि भी उनकी परेशानी समझ गए और विनम्रता से बोले, “माता, यदि मेरी इच्छा से आपको किसी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है तो मुझे क्षमा कर दीजिए। लेकिन मैंने आपकी कृपा पर विश्वास करके ही यह मांग रखी है।” माता लक्ष्मी ने अपने भक्त की ओर देखा और अंततः भगवान श्रीहरि का स्मरण करते हुए उनके पास पहुंचीं।
भगवान विष्णु पहले से ही सब जानते थे। माता लक्ष्मी ने उनके सामने पूरी बात रख दी। उन्होंने बताया कि नारद मुनि ने उनसे चरण-स्पर्श वाला महाप्रसाद मांगा है और वह पहले ही उन्हें वचन दे चुकी हैं। भगवान श्रीहरि मुस्कुराए और बोले, “देवी, तुम्हारा वचन धर्म से बंधा हुआ है। तुमने कोई भूल नहीं की। मेरे सच्चे भक्त को खाली हाथ लौटाना उचित नहीं। आज तुम नारद को मेरा महाप्रसाद दे सकती हो।” माता लक्ष्मी के चेहरे पर फिर से प्रसन्नता लौट आई। भगवान ने मुस्कुराकर कहा, “लेकिन देवी, इसे ऐसे देना कि मुझे पता ही न चले।” माता लक्ष्मी समझ गईं कि यह स्वयं भगवान की मधुर लीला है, क्योंकि उनसे कुछ भी छिपा नहीं हो सकता।
कुछ समय बाद माता लक्ष्मी ने अत्यंत श्रद्धा से वह दिव्य महाप्रसाद एक पात्र में रखा और नारद मुनि के पास पहुंचीं। उन्होंने कहा, “वत्स नारद, यह वही दुर्लभ प्रसाद है जिसकी तुमने इच्छा की थी। इसे अत्यंत श्रद्धा से ग्रहण करना।” नारद मुनि की आंखों में आनंद के आंसू आ गए। उन्होंने उस प्रसाद को पहले अपने मस्तक से लगाया, फिर आंखों से लगाया और भगवान का स्मरण करते हुए उसे ग्रहण किया। जैसे ही वह प्रसाद उनके भीतर गया, उनके रोम-रोम में भक्ति का अद्भुत भाव उमड़ पड़ा। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे और उनके हाथों में मौजूद वीणा के तार बिना छुए ही जैसे मधुर ध्वनि करने लगे। नारद मुनि भाव-विभोर होकर “नारायण, नारायण” का कीर्तन करने लगे। वे कभी नाचते, कभी हंसते और कभी प्रेम से रो पड़ते। बैकुंठ का वातावरण उनके भक्ति-रस से भर गया।
कुछ समय बाद नारद मुनि उसी दिव्य आनंद में डूबे हुए कैलाश की ओर चल पड़े। वहां भगवान शिव ध्यान में लीन थे। जैसे ही उनके कानों में नारद के कीर्तन की ध्वनि पहुंची, उन्होंने अपनी आंखें खोलीं। नारद मुनि के चेहरे पर ऐसा आनंद देखकर महादेव भी आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने पूछा, “नारद, आज तुम्हारे भीतर इतना अद्भुत आनंद क्यों है? तुम तो सदैव नारायण का नाम लेते हो, लेकिन आज तुम्हारी भक्ति में कुछ अलग ही दिव्यता दिखाई दे रही है।” नारद मुनि ने भगवान शिव को प्रणाम किया और उन्हें बैकुंठ में हुई पूरी घटना सुनाई। उन्होंने बताया कि माता लक्ष्मी ने उन्हें भगवान श्रीहरि का दिव्य महाप्रसाद दिया है।
भगवान शिव ने प्रेम से कहा, “नारद, तुम सचमुच धन्य हो। भगवान का ऐसा प्रसाद प्राप्त होना स्वयं में महान सौभाग्य है। लेकिन क्या तुम मेरे लिए भी थोड़ा सा प्रसाद लेकर आए हो?” यह सुनकर नारद मुनि अचानक शांत हो गए। उन्होंने अपने पास देखा, लेकिन प्रसाद का एक भी टुकड़ा शेष नहीं था। आनंद में डूबकर उन्होंने पूरा प्रसाद ग्रहण कर लिया था। वे कुछ क्षण तक सिर झुकाकर खड़े रहे। तभी अचानक उनकी नजर अपनी उंगली पर पड़ी। वहां महाप्रसाद का एक अत्यंत छोटा सा कण अभी भी लगा हुआ था। नारद मुनि की आंखों में खुशी चमक उठी। उन्होंने कहा, “महादेव, मैं आपके लिए प्रसाद बचा नहीं सका, लेकिन देखिए, इसका एक छोटा सा कण अभी भी मेरी उंगली पर लगा हुआ है। यदि आप इसे स्वीकार कर लें तो मेरा जीवन धन्य हो जाएगा।”
भगवान शिव ने उस छोटे से कण को अत्यंत श्रद्धा से ग्रहण किया। उन्होंने उसे पहले अपनी आंखों से लगाया, फिर मस्तक से लगाया और भगवान श्रीहरि का स्मरण करते हुए उसे अपने मुख में रख लिया। जैसे ही वह दिव्य प्रसाद उनके भीतर पहुंचा, महादेव के रोम-रोम में भक्ति का सागर उमड़ पड़ा। उनकी आंखों से आनंद के आंसू बहने लगे और उनके मुख से “हरि, हरि” की ध्वनि निकलने लगी। अचानक उन्होंने अपना डमरू उठा लिया और आनंद में तांडव करने लगे। यह क्रोध या विनाश का तांडव नहीं था, बल्कि भगवान श्रीहरि के प्रेम में डूबे एक भक्त का दिव्य आनंद था। डमरू की ध्वनि से कैलाश गूंज उठा। धरती में कंपन होने लगा और देवताओं को लगा कि कहीं महादेव के इस अद्भुत नृत्य से सृष्टि का संतुलन न बिगड़ जाए।
सभी देवता चिंतित होकर एकत्र हुए। ब्रह्मा जी ने कहा, “इस समय केवल माता पार्वती ही महादेव को शांत कर सकती हैं।” देवताओं ने माता पार्वती को सारी बात बताई। माता तुरंत उस स्थान पर पहुंचीं जहां भगवान शिव प्रेम में डूबकर तांडव कर रहे थे। उन्होंने महादेव को देखा और धीरे से कहा, “स्वामी।” केवल इस एक शब्द ने जैसे महादेव के भीतर की लहरों को शांत कर दिया। उन्होंने आंखें खोलीं और सामने माता पार्वती को देखकर धीरे-धीरे अपना तांडव रोक दिया।
माता पार्वती ने प्रेम से पूछा, “स्वामी, आज ऐसा क्या हुआ कि आप इतने आनंद में डूब गए?” भगवान शिव ने उन्हें पूरी घटना बताई और कहा कि भगवान श्रीहरि के महाप्रसाद के केवल एक छोटे से कण ने उनके भीतर ऐसा दिव्य प्रेम जगा दिया। माता पार्वती ने मुस्कुराकर पूछा, “तो क्या आपने मेरे लिए भी उस प्रसाद का थोड़ा सा भाग बचाकर रखा था?” यह सुनकर महादेव कुछ क्षण मौन हो गए। उनके पास वह एक कण भी नहीं बचा था। उन्होंने सरलता से कहा, “देवी, जो मिला था वह मैंने पूरा ग्रहण कर लिया। तुम्हारे लिए कुछ बचा नहीं।”
माता पार्वती के मन में प्रसाद पाने की इच्छा से अधिक उस दिव्य प्रेम को अनुभव करने की इच्छा थी। उन्होंने सोचा कि यदि भगवान का यह प्रसाद इतना अद्भुत है कि इसके एक कण से स्वयं महादेव प्रेम में तांडव करने लगें, तो संसार के सामान्य जीवों को भी यदि इसका लाभ मिले तो कितना बड़ा कल्याण होगा। इसी समय भगवान श्रीहरि स्वयं वहां प्रकट हुए। माता पार्वती ने उन्हें प्रणाम किया। भगवान विष्णु ने कहा, “देवी, मैं तुम्हारे मन की इच्छा जानता हूं। बताओ, क्या चाहती हो?” माता पार्वती ने अपने लिए कुछ नहीं मांगा। उन्होंने कहा, “प्रभु, यदि आपका प्रसाद केवल देवताओं तक सीमित रहे तो मेरा मन संतुष्ट नहीं होगा। मैं चाहती हूं कि ऐसा समय आए जब आपका महाप्रसाद हर प्राणी को उपलब्ध हो। कोई गरीब हो या अमीर, किसी भी कुल या परिस्थिति में जन्मा हो, यदि वह श्रद्धा से आपका प्रसाद ग्रहण करे तो उसे आपकी कृपा प्राप्त हो।”
भगवान श्रीहरि माता पार्वती की करुणा देखकर प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, “देवी, आज तुमने अपने लिए कुछ नहीं मांगा, बल्कि पूरी सृष्टि के लिए मांग लिया है। तुम्हारी यह इच्छा अवश्य पूरी होगी। कलियुग में मैं नीलाचल धाम में भगवान जगन्नाथ के रूप में प्रकट होऊंगा। वहां मेरा महाप्रसाद किसी एक व्यक्ति का नहीं, पूरी सृष्टि का होगा। जो भी श्रद्धा से उसे ग्रहण करेगा, वह मेरी कृपा का अधिकारी होगा।” फिर भगवान ने माता पार्वती से कहा, “और तुम उसी धाम में विमला देवी के रूप में विराजमान रहोगी। मेरे मंदिर में अर्पित भोग तुम्हें समर्पित किए जाने के बाद ही महाप्रसाद के रूप में प्रतिष्ठित होगा।”
माता पार्वती ने भगवान श्रीहरि को प्रणाम किया। भगवान शिव मंद-मंद मुस्कुराने लगे और नारद मुनि अपनी वीणा बजाते हुए “नारायण, नारायण” का कीर्तन करने लगे। कहते हैं कि इसी दिव्य संकल्प से जुड़ी परंपरा के कारण पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर में भगवान को अर्पित भोग मां विमला देवी को समर्पित किए जाने के बाद महाप्रसाद के रूप में माना जाता है। जगन्नाथ परंपरा में महाप्रसाद केवल भोजन नहीं, बल्कि भक्ति, समानता और भगवान की कृपा का प्रतीक माना जाता है। यही संदेश इस कथा के केंद्र में है कि भगवान की कृपा में भेदभाव नहीं होता और सच्ची भक्ति में सबसे बड़ा स्थान करुणा का होता है। जय जगन्नाथ, हर हर महादेव।