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बहुत समय पहले की बात है, जब बैकुंठ लोक दिव्य प्रकाश से जगमगा रहा था। चारों ओर शंख की मधुर ध्वनि गूंज रही थी और देवता भगव...
11/08/2026

बहुत समय पहले की बात है, जब बैकुंठ लोक दिव्य प्रकाश से जगमगा रहा था। चारों ओर शंख की मधुर ध्वनि गूंज रही थी और देवता भगवान श्रीहरि के दर्शन के लिए उपस्थित थे। उसी समय वीणा बजाते हुए नारद मुनि वहां पहुंचे और उनके मुख से “नारायण, नारायण” की ध्वनि सुनाई देने लगी। माता लक्ष्मी ने अपने प्रिय भक्त को देखा तो उनके चेहरे पर प्रसन्नता छा गई। उन्होंने नारद मुनि का प्रेमपूर्वक स्वागत किया और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर कहा, “वत्स, आज मैं तुम्हारी भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हूं। मांगो, जो इच्छा हो मांग लो।” नारद मुनि ने हाथ जोड़कर कहा, “माता, यदि आप सचमुच प्रसन्न हैं तो मुझे कोई धन, वैभव या रत्न नहीं चाहिए। मुझे केवल भगवान श्रीहरि के चरणों से स्पर्श हुआ दिव्य महाप्रसाद चाहिए।”

नारद मुनि की यह बात सुनते ही माता लक्ष्मी कुछ क्षणों के लिए मौन हो गईं। उनकी प्रसन्नता अचानक चिंता में बदल गई। क्योंकि उन्होंने अपने भक्त को वचन तो दे दिया था, लेकिन भगवान श्रीहरि की आज्ञा भी थी कि वह दिव्य प्रसाद किसी को नहीं दिया जाना चाहिए। अब माता लक्ष्मी के सामने धर्म का कठिन प्रश्न खड़ा था। एक ओर अपने स्वामी की आज्ञा थी और दूसरी ओर अपने भक्त को दिया हुआ वचन। नारद मुनि भी उनकी परेशानी समझ गए और विनम्रता से बोले, “माता, यदि मेरी इच्छा से आपको किसी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है तो मुझे क्षमा कर दीजिए। लेकिन मैंने आपकी कृपा पर विश्वास करके ही यह मांग रखी है।” माता लक्ष्मी ने अपने भक्त की ओर देखा और अंततः भगवान श्रीहरि का स्मरण करते हुए उनके पास पहुंचीं।

भगवान विष्णु पहले से ही सब जानते थे। माता लक्ष्मी ने उनके सामने पूरी बात रख दी। उन्होंने बताया कि नारद मुनि ने उनसे चरण-स्पर्श वाला महाप्रसाद मांगा है और वह पहले ही उन्हें वचन दे चुकी हैं। भगवान श्रीहरि मुस्कुराए और बोले, “देवी, तुम्हारा वचन धर्म से बंधा हुआ है। तुमने कोई भूल नहीं की। मेरे सच्चे भक्त को खाली हाथ लौटाना उचित नहीं। आज तुम नारद को मेरा महाप्रसाद दे सकती हो।” माता लक्ष्मी के चेहरे पर फिर से प्रसन्नता लौट आई। भगवान ने मुस्कुराकर कहा, “लेकिन देवी, इसे ऐसे देना कि मुझे पता ही न चले।” माता लक्ष्मी समझ गईं कि यह स्वयं भगवान की मधुर लीला है, क्योंकि उनसे कुछ भी छिपा नहीं हो सकता।

कुछ समय बाद माता लक्ष्मी ने अत्यंत श्रद्धा से वह दिव्य महाप्रसाद एक पात्र में रखा और नारद मुनि के पास पहुंचीं। उन्होंने कहा, “वत्स नारद, यह वही दुर्लभ प्रसाद है जिसकी तुमने इच्छा की थी। इसे अत्यंत श्रद्धा से ग्रहण करना।” नारद मुनि की आंखों में आनंद के आंसू आ गए। उन्होंने उस प्रसाद को पहले अपने मस्तक से लगाया, फिर आंखों से लगाया और भगवान का स्मरण करते हुए उसे ग्रहण किया। जैसे ही वह प्रसाद उनके भीतर गया, उनके रोम-रोम में भक्ति का अद्भुत भाव उमड़ पड़ा। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे और उनके हाथों में मौजूद वीणा के तार बिना छुए ही जैसे मधुर ध्वनि करने लगे। नारद मुनि भाव-विभोर होकर “नारायण, नारायण” का कीर्तन करने लगे। वे कभी नाचते, कभी हंसते और कभी प्रेम से रो पड़ते। बैकुंठ का वातावरण उनके भक्ति-रस से भर गया।

कुछ समय बाद नारद मुनि उसी दिव्य आनंद में डूबे हुए कैलाश की ओर चल पड़े। वहां भगवान शिव ध्यान में लीन थे। जैसे ही उनके कानों में नारद के कीर्तन की ध्वनि पहुंची, उन्होंने अपनी आंखें खोलीं। नारद मुनि के चेहरे पर ऐसा आनंद देखकर महादेव भी आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने पूछा, “नारद, आज तुम्हारे भीतर इतना अद्भुत आनंद क्यों है? तुम तो सदैव नारायण का नाम लेते हो, लेकिन आज तुम्हारी भक्ति में कुछ अलग ही दिव्यता दिखाई दे रही है।” नारद मुनि ने भगवान शिव को प्रणाम किया और उन्हें बैकुंठ में हुई पूरी घटना सुनाई। उन्होंने बताया कि माता लक्ष्मी ने उन्हें भगवान श्रीहरि का दिव्य महाप्रसाद दिया है।

भगवान शिव ने प्रेम से कहा, “नारद, तुम सचमुच धन्य हो। भगवान का ऐसा प्रसाद प्राप्त होना स्वयं में महान सौभाग्य है। लेकिन क्या तुम मेरे लिए भी थोड़ा सा प्रसाद लेकर आए हो?” यह सुनकर नारद मुनि अचानक शांत हो गए। उन्होंने अपने पास देखा, लेकिन प्रसाद का एक भी टुकड़ा शेष नहीं था। आनंद में डूबकर उन्होंने पूरा प्रसाद ग्रहण कर लिया था। वे कुछ क्षण तक सिर झुकाकर खड़े रहे। तभी अचानक उनकी नजर अपनी उंगली पर पड़ी। वहां महाप्रसाद का एक अत्यंत छोटा सा कण अभी भी लगा हुआ था। नारद मुनि की आंखों में खुशी चमक उठी। उन्होंने कहा, “महादेव, मैं आपके लिए प्रसाद बचा नहीं सका, लेकिन देखिए, इसका एक छोटा सा कण अभी भी मेरी उंगली पर लगा हुआ है। यदि आप इसे स्वीकार कर लें तो मेरा जीवन धन्य हो जाएगा।”

भगवान शिव ने उस छोटे से कण को अत्यंत श्रद्धा से ग्रहण किया। उन्होंने उसे पहले अपनी आंखों से लगाया, फिर मस्तक से लगाया और भगवान श्रीहरि का स्मरण करते हुए उसे अपने मुख में रख लिया। जैसे ही वह दिव्य प्रसाद उनके भीतर पहुंचा, महादेव के रोम-रोम में भक्ति का सागर उमड़ पड़ा। उनकी आंखों से आनंद के आंसू बहने लगे और उनके मुख से “हरि, हरि” की ध्वनि निकलने लगी। अचानक उन्होंने अपना डमरू उठा लिया और आनंद में तांडव करने लगे। यह क्रोध या विनाश का तांडव नहीं था, बल्कि भगवान श्रीहरि के प्रेम में डूबे एक भक्त का दिव्य आनंद था। डमरू की ध्वनि से कैलाश गूंज उठा। धरती में कंपन होने लगा और देवताओं को लगा कि कहीं महादेव के इस अद्भुत नृत्य से सृष्टि का संतुलन न बिगड़ जाए।

सभी देवता चिंतित होकर एकत्र हुए। ब्रह्मा जी ने कहा, “इस समय केवल माता पार्वती ही महादेव को शांत कर सकती हैं।” देवताओं ने माता पार्वती को सारी बात बताई। माता तुरंत उस स्थान पर पहुंचीं जहां भगवान शिव प्रेम में डूबकर तांडव कर रहे थे। उन्होंने महादेव को देखा और धीरे से कहा, “स्वामी।” केवल इस एक शब्द ने जैसे महादेव के भीतर की लहरों को शांत कर दिया। उन्होंने आंखें खोलीं और सामने माता पार्वती को देखकर धीरे-धीरे अपना तांडव रोक दिया।

माता पार्वती ने प्रेम से पूछा, “स्वामी, आज ऐसा क्या हुआ कि आप इतने आनंद में डूब गए?” भगवान शिव ने उन्हें पूरी घटना बताई और कहा कि भगवान श्रीहरि के महाप्रसाद के केवल एक छोटे से कण ने उनके भीतर ऐसा दिव्य प्रेम जगा दिया। माता पार्वती ने मुस्कुराकर पूछा, “तो क्या आपने मेरे लिए भी उस प्रसाद का थोड़ा सा भाग बचाकर रखा था?” यह सुनकर महादेव कुछ क्षण मौन हो गए। उनके पास वह एक कण भी नहीं बचा था। उन्होंने सरलता से कहा, “देवी, जो मिला था वह मैंने पूरा ग्रहण कर लिया। तुम्हारे लिए कुछ बचा नहीं।”

माता पार्वती के मन में प्रसाद पाने की इच्छा से अधिक उस दिव्य प्रेम को अनुभव करने की इच्छा थी। उन्होंने सोचा कि यदि भगवान का यह प्रसाद इतना अद्भुत है कि इसके एक कण से स्वयं महादेव प्रेम में तांडव करने लगें, तो संसार के सामान्य जीवों को भी यदि इसका लाभ मिले तो कितना बड़ा कल्याण होगा। इसी समय भगवान श्रीहरि स्वयं वहां प्रकट हुए। माता पार्वती ने उन्हें प्रणाम किया। भगवान विष्णु ने कहा, “देवी, मैं तुम्हारे मन की इच्छा जानता हूं। बताओ, क्या चाहती हो?” माता पार्वती ने अपने लिए कुछ नहीं मांगा। उन्होंने कहा, “प्रभु, यदि आपका प्रसाद केवल देवताओं तक सीमित रहे तो मेरा मन संतुष्ट नहीं होगा। मैं चाहती हूं कि ऐसा समय आए जब आपका महाप्रसाद हर प्राणी को उपलब्ध हो। कोई गरीब हो या अमीर, किसी भी कुल या परिस्थिति में जन्मा हो, यदि वह श्रद्धा से आपका प्रसाद ग्रहण करे तो उसे आपकी कृपा प्राप्त हो।”

भगवान श्रीहरि माता पार्वती की करुणा देखकर प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, “देवी, आज तुमने अपने लिए कुछ नहीं मांगा, बल्कि पूरी सृष्टि के लिए मांग लिया है। तुम्हारी यह इच्छा अवश्य पूरी होगी। कलियुग में मैं नीलाचल धाम में भगवान जगन्नाथ के रूप में प्रकट होऊंगा। वहां मेरा महाप्रसाद किसी एक व्यक्ति का नहीं, पूरी सृष्टि का होगा। जो भी श्रद्धा से उसे ग्रहण करेगा, वह मेरी कृपा का अधिकारी होगा।” फिर भगवान ने माता पार्वती से कहा, “और तुम उसी धाम में विमला देवी के रूप में विराजमान रहोगी। मेरे मंदिर में अर्पित भोग तुम्हें समर्पित किए जाने के बाद ही महाप्रसाद के रूप में प्रतिष्ठित होगा।”

माता पार्वती ने भगवान श्रीहरि को प्रणाम किया। भगवान शिव मंद-मंद मुस्कुराने लगे और नारद मुनि अपनी वीणा बजाते हुए “नारायण, नारायण” का कीर्तन करने लगे। कहते हैं कि इसी दिव्य संकल्प से जुड़ी परंपरा के कारण पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर में भगवान को अर्पित भोग मां विमला देवी को समर्पित किए जाने के बाद महाप्रसाद के रूप में माना जाता है। जगन्नाथ परंपरा में महाप्रसाद केवल भोजन नहीं, बल्कि भक्ति, समानता और भगवान की कृपा का प्रतीक माना जाता है। यही संदेश इस कथा के केंद्र में है कि भगवान की कृपा में भेदभाव नहीं होता और सच्ची भक्ति में सबसे बड़ा स्थान करुणा का होता है। जय जगन्नाथ, हर हर महादेव।

क्या होगा अगर मैं आपसे कहूं कि जिस कलयुग को हम अपने वर्तमान का सबसे बड़ा सच समझते हैं, वह वास्तव में ब्रह्मांडीय समय की ...
09/08/2026

क्या होगा अगर मैं आपसे कहूं कि जिस कलयुग को हम अपने वर्तमान का सबसे बड़ा सच समझते हैं, वह वास्तव में ब्रह्मांडीय समय की एक बेहद छोटी सी झलक मात्र हो? जरा कल्पना कीजिए, अनगिनत ब्रह्मांड अस्तित्व में हों और हर ब्रह्मांड अपनी अलग गति से समय की यात्रा कर रहा हो। कहीं अभी सतयुग की शुरुआत हो रही हो, कहीं त्रेता अपने चरम पर हो, कहीं द्वापर युग में श्रीकृष्ण किसी योद्धा को धर्म का रहस्य समझा रहे हों और शायद किसी दूसरे ब्रह्मांड में वही महाभारत का युद्ध अभी शुरू भी न हुआ हो। पहली नजर में यह विचार किसी विज्ञान-कथा जैसा लगता है, लेकिन सनातन परंपरा में मौजूद कुछ अद्भुत कथाएं समय, लोक और ब्रह्मांड को लेकर ऐसी कल्पनाओं के लिए एक गहरा आध्यात्मिक आधार प्रस्तुत करती हैं। इन कथाओं को आधुनिक विज्ञान का प्रमाण मानना सही नहीं होगा, लेकिन इन्हें साथ रखकर देखने पर एक ऐसा सवाल जरूर पैदा होता है, जो हमारी समय और ब्रह्मांड की पूरी समझ को चुनौती देता है।

इस रहस्य की पहली झलक हमें राजा काकुद्मी और उनकी पुत्री रेवती की कथा में मिलती है। रेवती अत्यंत गुणवान, सुंदर और असाधारण कन्या थीं। उनके पिता राजा काकुद्मी चाहते थे कि उनकी पुत्री का विवाह किसी ऐसे पुरुष से हो जो उसके योग्य हो। लेकिन पृथ्वी पर उन्हें कोई भी राजकुमार ऐसा नहीं लगा जो रेवती के योग्य हो। अंततः उन्होंने निश्चय किया कि इस प्रश्न का उत्तर स्वयं ब्रह्मा जी से पूछा जाना चाहिए। राजा काकुद्मी अपनी पुत्री रेवती को साथ लेकर ब्रह्मलोक की ओर चले गए। वहां पहुंचने पर उन्होंने देखा कि दिव्य संगीत का अद्भुत आयोजन चल रहा है। गंधर्वों का संगीत वातावरण में गूंज रहा था और राजा तथा रेवती कुछ समय के लिए उसी संगीत में मग्न हो गए। उन्हें लगा कि संगीत समाप्त होते ही वे ब्रह्मा जी से अपनी समस्या पूछ लेंगे। लेकिन उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि जिस समय को वे कुछ क्षण समझ रहे हैं, वही समय पृथ्वी पर पूरी तरह अलग गति से बीत रहा था।

जब संगीत समाप्त हुआ तो राजा काकुद्मी ब्रह्मा जी के सामने पहुंचे और उन्होंने पृथ्वी के कुछ राजकुमारों के नाम लेकर पूछा कि इनमें से रेवती के लिए कौन योग्य रहेगा। ब्रह्मा जी मुस्कुराए और बोले कि जिन राजकुमारों के नाम तुम ले रहे हो, वे बहुत पहले ही पृथ्वी से विदा हो चुके हैं। इतना ही नहीं, उनके वंश भी अब समाप्त हो चुके हैं। राजा काकुद्मी यह सुनकर स्तब्ध रह गए। उन्हें लगा कि वे तो अभी कुछ ही समय पहले पृथ्वी से निकले थे। तब ब्रह्मा जी ने उन्हें समय की ऐसी गति के बारे में बताया जो पृथ्वी के समय से बिल्कुल अलग थी। कथा के अनुसार, ब्रह्मलोक में बिताया गया वह छोटा सा अंतराल पृथ्वी पर अनेक चतुर्युगों के बीतने के बराबर था। राजा जब पृथ्वी पर वापस लौटे तो उन्हें वही दुनिया नहीं मिली जिसे वे छोड़कर गए थे। युग बदल चुका था, पीढ़ियां बदल चुकी थीं और समय की धारा उन्हें हजारों नहीं बल्कि असंख्य वर्षों आगे ले जा चुकी थी। बाद में रेवती का विवाह भगवान बलराम से हुआ। यह कथा हमें यह विचार देती है कि समय को केवल हमारी मानवीय घड़ी से मापना संभव नहीं है। अलग-अलग लोकों में समय की अनुभूति और उसकी गति अलग हो सकती है।

यहीं से सवाल और गहरा हो जाता है। अगर एक लोक में कुछ क्षण दूसरे लोक में हजारों या लाखों वर्षों के बराबर हो सकते हैं, तो क्या यह संभव है कि ब्रह्मांड के अलग-अलग स्तरों पर समय की अपनी अलग-अलग धाराएं हों? सनातन परंपरा में लोकों की कल्पना केवल एक ही संसार तक सीमित नहीं है। अलग-अलग लोकों, आयामों और अस्तित्व के स्तरों का वर्णन मिलता है। इन कथाओं को आध्यात्मिक और पौराणिक दृष्टि से समझना चाहिए, लेकिन इनके भीतर छिपा समय का विचार आज भी बेहद रोचक है। आधुनिक भौतिकी भी यह बताती है कि समय हर परिस्थिति में एक समान गति से नहीं चलता। आइंस्टीन के सापेक्षता सिद्धांत के अनुसार गति और गुरुत्वाकर्षण जैसी परिस्थितियां समय की दर को प्रभावित कर सकती हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि विज्ञान ने पुराणों की कथाओं को सिद्ध कर दिया है, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि समय के बारे में हमारी सामान्य धारणा जितनी सरल लगती है, वास्तविकता उतनी सरल नहीं है।

अब इस रहस्य को समझने के लिए हमें वृंदावन की ओर जाना होगा, जहां एक और अद्भुत कथा ब्रह्मांडों की विशालता का संकेत देती है। एक बार ब्रह्मा जी को यह जानने की इच्छा हुई कि वृंदावन में बाल रूप में लीला करने वाले श्रीकृष्ण वास्तव में कौन हैं। उनके मन में यह विचार आया कि आखिर एक साधारण ग्वाल बालक में ऐसी कौन सी शक्ति हो सकती है कि देवता तक उसकी महिमा का वर्णन करते हैं। ब्रह्मा जी ने श्रीकृष्ण की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने कृष्ण के ग्वाल मित्रों और बछड़ों को अपनी शक्ति से छिपा दिया और यह देखने लगे कि कृष्ण अब क्या करते हैं। लेकिन श्रीकृष्ण सब समझ चुके थे। उन्होंने ऐसी लीला की जिसे देखकर स्वयं ब्रह्मा जी भी आश्चर्यचकित रह गए। कृष्ण ने उन सभी ग्वाल बालकों और बछड़ों के समान ही अपने अनेक रूप प्रकट कर दिए। वृंदावन में किसी को पता तक नहीं चला कि असली कौन है और कृष्ण की लीला क्या है। समय बीतता गया और जब ब्रह्मा जी वापस लौटे तो उन्होंने देखा कि सब कुछ वैसा ही चल रहा है जैसे पहले चल रहा था।

ब्रह्मा जी के लिए यह रहस्य समझना असंभव हो गया। वे कृष्ण की शक्ति को समझने की कोशिश करने लगे और अंततः उनके सामने ऐसी अनुभूति आई जिसने उनके अहंकार को समाप्त कर दिया। कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने उन्हें अपनी विराट सत्ता का दर्शन कराया और ब्रह्मा जी को यह बोध हुआ कि जिस ब्रह्मांड को वे अपना पूरा संसार समझते हैं, वह वास्तव में अनंत सृष्टि के विशाल विस्तार में केवल एक हिस्सा है। उन्हें असंख्य ब्रह्मांडों का दर्शन हुआ और प्रत्येक ब्रह्मांड में अलग-अलग ब्रह्मा की कल्पना सामने आई। कहीं चार मुख वाले ब्रह्मा, कहीं उससे अधिक मुखों वाले ब्रह्मा। इस कथा का संदेश यही था कि सृष्टि की विशालता को किसी एक ब्रह्मांड या किसी एक सत्ता की सीमा में नहीं बांधा जा सकता। जिस सत्ता को कोई अपने लिए संपूर्ण मानता है, वह भी किसी और बड़े सत्य का केवल एक छोटा सा हिस्सा हो सकती है।

यहीं से एक और रहस्यमय सवाल जन्म लेता है। अगर अनगिनत ब्रह्मांड हैं, तो क्या हर ब्रह्मांड में समय की यात्रा भी अलग हो सकती है? सनातन दर्शन में समय को एक सीधी रेखा की तरह नहीं बल्कि चक्र की तरह देखा जाता है। समय आता है, आगे बढ़ता है, समाप्त होता है और फिर एक नए चक्र की शुरुआत होती है। इस चक्र में चार प्रमुख युग माने जाते हैं—सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। सतयुग को धर्म और सत्य की प्रधानता वाला युग माना जाता है। त्रेतायुग में धर्म का कुछ ह्रास होता है और इसी युग में भगवान राम की कथा जुड़ी है। द्वापरयुग में धर्म और अधर्म का संघर्ष और तीव्र होता है और इसी युग में श्रीकृष्ण तथा महाभारत की कथा आती है। इसके बाद आता है कलियुग, जिसे वर्तमान युग माना जाता है और जिसमें अधर्म तथा नैतिक पतन के बढ़ने की कल्पना की गई है।

इन चारों युगों के पूर्ण चक्र को चतुर्युग या महायुग कहा जाता है। पुराणों में इससे भी विशाल समय की कल्पना की गई है। अनेक महायुग मिलकर ब्रह्मा का एक दिन बनाते हैं, जिसे कल्प कहा जाता है। यहां समय की इकाइयां इतनी विशाल हो जाती हैं कि मानव जीवन की अवधि उनके सामने लगभग नगण्य लगती है। यही कारण है कि पुराणों में ब्रह्मांड का समय मानव इतिहास से कहीं आगे तक फैला हुआ दिखाई देता है। एक मनुष्य के लिए हजार वर्ष बहुत लंबा समय हो सकता है, लेकिन ब्रह्मांडीय पैमाने पर वही समय एक क्षण जैसा प्रतीत हो सकता है।

अब जरा उस विचार की कल्पना कीजिए जिससे यह पूरी कहानी शुरू हुई थी। अगर अनेक ब्रह्मांड हैं और प्रत्येक ब्रह्मांड की अपनी समय-धारा है, तो क्या यह संभव है कि सभी ब्रह्मांड एक ही युग में न हों? क्या ऐसा हो सकता है कि जिस ब्रह्मांड में हम आज कलियुग का अनुभव कर रहे हैं, किसी दूसरे ब्रह्मांड में उसी समय सतयुग चल रहा हो? क्या कहीं किसी दूसरे ब्रह्मांड में त्रेता युग के दौरान भगवान राम की लीला घट रही हो? क्या किसी अन्य ब्रह्मांड में द्वापरयुग की शुरुआत हो रही हो और कहीं किसी और ब्रह्मांड में महाभारत का युद्ध अभी आने वाला हो? और अगर ऐसा हो तो क्या हर ब्रह्मांड की घटनाएं अपने-अपने समय चक्र में अलग-अलग क्षणों पर घटित होती होंगी?

यहां एक बात समझना बहुत जरूरी है। पुराणों की कथाओं में मौजूद अनगिनत ब्रह्मांडों की कल्पना और आधुनिक विज्ञान की मल्टीवर्स जैसी अवधारणाएं एक ही चीज नहीं हैं। विज्ञान के पास अभी ऐसा प्रमाण नहीं है कि अलग-अलग ब्रह्मांडों में अलग-अलग युगों में राम, कृष्ण या महाभारत जैसी घटनाएं वास्तव में चल रही हैं। इसी तरह राजा काकुद्मी की कथा को वैज्ञानिक टाइम डाइलेशन का प्रत्यक्ष प्रमाण मानना भी उचित नहीं होगा। लेकिन दोनों के बीच एक रोचक समानता जरूर दिखाई देती है—हम जिस समय और स्थान को अपनी पूरी वास्तविकता समझते हैं, संभव है कि वास्तविकता उससे कहीं अधिक विशाल और जटिल हो।

आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान हमें बताता है कि हमारा दिखाई देने वाला ब्रह्मांड भी बहुत विशाल है। अरबों आकाशगंगाएं, अनगिनत तारे और उन तारों के चारों ओर घूमते असंख्य ग्रह हमारी कल्पना की सीमाओं को लगातार चुनौती देते हैं। हम जितना अधिक अंतरिक्ष को देखते हैं, उतना ही अधिक हमें यह एहसास होता है कि हमारी जानकारी कितनी सीमित है। हम ब्रह्मांड का केवल वही हिस्सा देख पाते हैं जिसकी रोशनी किसी न किसी रूप में हम तक पहुंच पाई है। इसका अर्थ यह नहीं कि बाकी सब कुछ निश्चित रूप से किसी दूसरी दुनिया में मौजूद है, लेकिन यह जरूर बताता है कि हमारी दृष्टि ब्रह्मांड की पूरी सीमा नहीं है।

सनातन परंपरा की कथाएं इसी विनम्रता की ओर संकेत करती दिखाई देती हैं। ब्रह्मा जैसे सृष्टिकर्ता को भी यह समझना पड़ा कि उनकी सत्ता किसी एक सीमित ब्रह्मांड से आगे नहीं जाती। राजा काकुद्मी को यह समझना पड़ा कि समय उनके अनुमान से कहीं अधिक विशाल है। और श्रीकृष्ण की लीलाओं में ब्रह्मा को यह बोध हुआ कि जिस सृष्टि को वे बहुत बड़ा समझते हैं, वह भी अनंत अस्तित्व के सामने अत्यंत छोटी हो सकती है। इन कथाओं को अगर केवल चमत्कार की तरह देखा जाए तो शायद उनका एक हिस्सा ही समझ में आएगा। लेकिन अगर इन्हें ब्रह्मांड, समय, अहंकार और मनुष्य की सीमित दृष्टि के प्रतीक के रूप में देखा जाए, तो इनकी गहराई और बढ़ जाती है।

शायद इसी वजह से यह सवाल आज भी इतना रोमांचक है कि अगर ब्रह्मांड वास्तव में हमारी कल्पना से कहीं विशाल है, तो हमारी कहानी कितनी छोटी है। हो सकता है हम जिस कलियुग को अंतिम सत्य समझकर जी रहे हैं, वह ब्रह्मांडीय समय के एक विशाल चक्र में केवल एक छोटा सा क्षण हो। हो सकता है किसी दूसरे लोक में समय की गति हमारे समय से अलग हो। और शायद कहीं ऐसा भी हो जहां हमारी वर्तमान दुनिया इतिहास बन चुकी हो, जबकि वहां किसी और युग की कहानी अभी शुरू ही हुई हो। लेकिन यह सब अभी प्रश्न हैं, प्रमाणित तथ्य नहीं।

अंत में शायद इस पूरी कथा का सबसे बड़ा संदेश ब्रह्मांडों की संख्या नहीं, बल्कि मनुष्य का अहंकार है। राजा काकुद्मी ने सीखा कि समय मनुष्य की इच्छा से नहीं चलता। ब्रह्मा ने सीखा कि सृष्टि उनकी कल्पना से कहीं बड़ी है। और हमें भी शायद यही सीखने की जरूरत है कि जिसे हम पूरी दुनिया समझते हैं, वह संभव है कि किसी बहुत बड़ी वास्तविकता का केवल एक छोटा सा हिस्सा हो। हम समय को घड़ी में बांध सकते हैं, दूरी को किलोमीटर में माप सकते हैं और आकाश को दूरबीन से देख सकते हैं, लेकिन अस्तित्व की अंतिम सीमा अभी भी हमारी समझ से बहुत दूर है। इसलिए यह प्रश्न खुला छोड़ देना ही शायद सबसे सुंदर बात है—क्या कहीं किसी दूसरे ब्रह्मांड में अभी सतयुग चल रहा है? क्या कहीं त्रेता की सुबह हो रही है? क्या कहीं द्वापर की शाम उतर रही है? या फिर यह सब केवल हमारी कल्पना है? इसका अंतिम उत्तर आज हमारे पास नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि जिस ब्रह्मांड में हम रहते हैं, वह हमारी कल्पना से कहीं अधिक विशाल, रहस्यमय और अद्भुत है। और शायद इसी अनंत रहस्य के सामने सिर झुकाकर प्राचीन ऋषियों ने कहा था कि जो दिखाई देता है, वह संपूर्ण सत्य नहीं है।

09/08/2026
मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य में वर्णित यह कथा उस समय की है जब अधर्म का अंधकार पूरे ब्रह्मांड पर छा चुका था। असुरराज...
09/08/2026

मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य में वर्णित यह कथा उस समय की है जब अधर्म का अंधकार पूरे ब्रह्मांड पर छा चुका था। असुरराज रंभ और एक महिषी (भैंस) के संयोग से उत्पन्न हुआ महिषासुर जन्म से ही असाधारण शक्ति का स्वामी था। वह इच्छानुसार भैंस, मनुष्य और अनेक रूप धारण कर सकता था। बचपन से ही उसके मन में तीनों लोकों पर अधिकार करने की महत्वाकांक्षा थी। उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया। जब ब्रह्मा जी उसके सामने प्रकट हुए तो महिषासुर ने अमरत्व का वरदान माँगा। ब्रह्मा जी ने कहा कि जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है। तब महिषासुर ने चालाकी से वर माँगा कि उसकी मृत्यु न किसी देवता के हाथों हो, न किसी मनुष्य के हाथों। उसे विश्वास था कि कोई स्त्री उसे कभी पराजित नहीं कर सकती। ब्रह्मा जी ने उसका वर स्वीकार कर लिया। यही वरदान आगे चलकर उसके अहंकार का कारण बना।

वरदान मिलते ही महिषासुर का स्वभाव पूरी तरह बदल गया। उसने अपनी विशाल असुर सेना तैयार की और तीनों लोकों पर आक्रमण शुरू कर दिया। सबसे पहले उसने स्वर्ग पर चढ़ाई की। इंद्र और देवताओं ने उसका सामना किया। यह युद्ध एक-दो दिन नहीं बल्कि लंबे समय तक चलता रहा। अंततः महिषासुर की शक्ति के सामने देवताओं की सेना पराजित हो गई। इंद्र अपना सिंहासन छोड़ने पर विवश हुए। सूर्य, चंद्र, अग्नि, वायु, वरुण, यम और कुबेर तक अपने-अपने अधिकारों से वंचित कर दिए गए। महिषासुर ने स्वयं को स्वर्ग का राजा घोषित कर दिया। देवता दिशाओं में भटकने लगे। तीनों लोकों में अत्याचार बढ़ गया। यज्ञ रुक गए, धर्म कमजोर पड़ गया और चारों ओर भय का वातावरण फैल गया।

जब सभी देवता निराश होकर भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव के पास पहुँचे, तब उन्होंने महिषासुर के अत्याचारों का वर्णन किया। यह सुनते ही भगवान विष्णु और भगवान शिव के मुख पर क्रोध प्रकट हुआ। उनके शरीर से एक दिव्य तेज निकला। उसी समय ब्रह्मा जी और अन्य सभी देवताओं के शरीर से भी प्रकाश की अद्भुत किरणें निकलने लगीं। सभी देवताओं का वह तेज एक स्थान पर एकत्र होकर एक विराट दिव्य प्रकाशपुंज में बदल गया। उसी दिव्य तेज से एक अद्भुत देवी प्रकट हुईं। उनका स्वरूप इतना तेजस्वी था कि सूर्य का प्रकाश भी उसके सामने फीका पड़ गया। यही थीं आदिशक्ति माँ दुर्गा।

माँ दुर्गा का प्रत्येक अंग किसी न किसी देवता के तेज से बना था। भगवान शिव ने उन्हें त्रिशूल दिया। भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र अर्पित किया। इंद्र ने वज्र प्रदान किया। वरुण ने शंख दिया। अग्निदेव ने अपनी अग्निशक्ति दी। वायु ने धनुष और बाण दिए। यमराज ने कालदंड दिया। कुबेर ने गदा दी। विश्वकर्मा ने दिव्य कवच और फरसा प्रदान किया। हिमालय ने सिंह वाहन और अनेक रत्न भेंट किए। इस प्रकार अठारह भुजाओं में दिव्य अस्त्र धारण किए हुए माँ दुर्गा सिंह पर आरूढ़ हुईं। उन्होंने ऐसी प्रचंड गर्जना की कि आकाश, पृथ्वी और पाताल तीनों लोक काँप उठे। पर्वत हिलने लगे, समुद्रों में लहरें उठने लगीं और देवताओं के हृदय में आशा का संचार हो गया।

माँ की गर्जना सुनकर महिषासुर क्रोधित हो उठा। उसने अपनी विशाल सेना को युद्ध के लिए भेज दिया। असंख्य असुर हाथों में तलवार, गदा, भाले और शक्तिशाली अस्त्र लेकर माँ पर टूट पड़े। लेकिन माँ दुर्गा ने अपने दिव्य अस्त्रों से असुरों का संहार करना प्रारंभ कर दिया। उनका सिंह भी युद्धभूमि में असुरों को चीरता हुआ आगे बढ़ रहा था। माँ ने एक-एक करके महिषासुर के प्रमुख सेनापतियों का वध कर दिया। जहाँ उनका चक्र घूमता, वहाँ असुरों के सिर धड़ से अलग हो जाते। जहाँ उनका त्रिशूल चलता, वहाँ पूरी सेना धराशायी हो जाती। देखते ही देखते युद्धभूमि असुरों से खाली होने लगी।

अपनी सेना का विनाश देखकर महिषासुर स्वयं युद्धभूमि में उतरा। उसने पहले विशाल भैंस का रूप धारण किया और अपने सींगों से पर्वतों को उखाड़-उखाड़कर माँ की ओर फेंकने लगा। उसने अपने खुरों से धरती को कंपा दिया। माँ ने उसे अपने पाश से बाँध लिया। तभी वह भैंस का रूप छोड़कर सिंह बन गया। माँ ने उसकी गर्दन पर प्रहार किया। वह तुरंत हाथी बन गया और अपनी सूँड से माँ के सिंह को पकड़ने लगा। माँ ने तलवार से उसकी सूँड काट दी। वह फिर मनुष्य बना और फिर पुनः भैंस का रूप धारण कर लिया। बार-बार रूप बदलकर वह माँ को भ्रमित करना चाहता था, लेकिन आदिशक्ति उसके हर मायावी रूप को तुरंत पहचान लेती थीं।

युद्ध अपने चरम पर पहुँच गया। अंततः माँ दुर्गा ने क्रोध से भरकर एक ऊँची छलाँग लगाई और महिषासुर के भैंस रूप पर अपना चरण रख दिया। उनके चरणों के भार से महिषासुर दब गया। तभी वह आधा मनुष्य और आधा भैंस के रूप में बाहर निकलने लगा ताकि फिर से युद्ध कर सके। उसी क्षण माँ ने अपने त्रिशूल से उसके वक्ष पर प्रहार किया। महिषासुर घायल होकर तड़प उठा। फिर माँ ने अपनी दिव्य तलवार उठाई और एक ही प्रचंड वार में उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। उसी क्षण महिषासुर का अंत हो गया। उसके मरते ही तीनों लोकों में विजय की ध्वनि गूँज उठी।

महिषासुर के वध के बाद आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी। इंद्र सहित सभी देवता अपने-अपने स्थानों पर लौट आए। उन्होंने माँ दुर्गा के चरणों में प्रणाम किया और उनकी स्तुति करते हुए कहा कि आपने केवल महिषासुर का वध नहीं किया, बल्कि अहंकार, अधर्म और अन्याय का भी अंत किया है। संसार में फिर से धर्म, शांति और संतुलन स्थापित हो गया। उसी दिन से माँ दुर्गा महिषासुरमर्दिनी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। यह कथा हमें सिखाती है कि चाहे अधर्म कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, जब उसका अहंकार सीमा पार कर जाता है, तब आदिशक्ति स्वयं प्रकट होकर धर्म की रक्षा करती हैं। यही कारण है कि नवरात्रि और विजयदशमी का पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सत्य की असत्य पर, धर्म की अधर्म पर और देवी शक्ति की दुष्टता पर विजय का सनातन संदेश है। जय माँ दुर्गा। जय महिषासुरमर्दिनी।

आखिर मृत्यु के बाद आत्मा के साथ क्या होता है? क्या मृत्यु के बाद आत्मा अपने परिवार और प्रियजनों को देख सकती है? क्या वह ...
08/08/2026

आखिर मृत्यु के बाद आत्मा के साथ क्या होता है? क्या मृत्यु के बाद आत्मा अपने परिवार और प्रियजनों को देख सकती है? क्या वह अपने घर वापस आती है, या फिर किसी अनजान लोक की यात्रा पर निकल जाती है? इन सवालों का निश्चित वैज्ञानिक प्रमाण हमारे पास नहीं है, लेकिन हिंदू धार्मिक परंपरा में गरुड़ पुराण मृत्यु के बाद की यात्रा का एक विस्तृत वर्णन प्रस्तुत करता है। कथा के अनुसार, एक बार भगवान विष्णु अपने वाहन गरुड़ पर सवार होकर मृत्युलोक का भ्रमण कर रहे थे। गरुड़ ने पृथ्वी पर जन्म, जीवन और मृत्यु का क्रम देखा। उन्होंने देखा कि मनुष्य जीवनभर अपने परिवार, धन, रिश्तों और इच्छाओं में उलझा रहता है, लेकिन अंत में उसका शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है। यह देखकर गरुड़ के मन में एक गहरा प्रश्न उठा कि जब शरीर समाप्त हो जाता है, तब उस जीवात्मा का क्या होता है? क्या उसकी यात्रा वहीं समाप्त हो जाती है या फिर मृत्यु के बाद कोई दूसरा संसार उसका इंतजार कर रहा होता है? गरुड़ ने भगवान विष्णु से यही रहस्य पूछा।

भगवान विष्णु ने गरुड़ से कहा कि मृत्यु शरीर का अंत है, लेकिन धार्मिक मान्यता के अनुसार आत्मा की यात्रा वहीं समाप्त नहीं होती। जब मनुष्य का अंतिम समय आता है, तब उसके जीवन की सांसें धीरे-धीरे शांत होने लगती हैं और शरीर से चेतना का संबंध टूटने लगता है। गरुड़ पुराण की कथा में वर्णन मिलता है कि उस समय जीवात्मा अपने स्थूल शरीर से अलग होने का अनुभव करती है। उसे अपने आसपास खड़े परिवार के लोग दिखाई देते हैं। कोई रो रहा होता है, कोई उसे पुकार रहा होता है, कोई उसके पुराने दिनों को याद कर रहा होता है। आत्मा भी उन्हें पुकारना चाहती है, लेकिन उसकी आवाज संसार के लोगों तक नहीं पहुंचती। वह समझ नहीं पाती कि जिन लोगों से उसने पूरी जिंदगी प्रेम किया, वे उसके सामने होते हुए भी उसकी बात क्यों नहीं सुन रहे। वह अपने पुराने शरीर की ओर देखती है और उसे एहसास होने लगता है कि अब वह शरीर उसका नहीं रहा।

गरुड़ पुराण की परंपरागत कथा के अनुसार, मृत्यु के बाद जीवात्मा को यमदूतों के सामने ले जाया जाता है। वहां उसके जीवन के कर्मों का लेखा-जोखा सामने आता है। मनुष्य ने जीवन में जो कुछ किया, उसके कर्मों का मूल्यांकन किया जाता है। उसने किसके साथ कैसा व्यवहार किया, किसकी सहायता की, किसे दुख पहुंचाया और कौन से अच्छे कार्य किए, इन सभी कर्मों को उसके आगे रखा जाता है। यह विचार इस बात पर जोर देता है कि मनुष्य अपने कर्मों से बच नहीं सकता। संसार में व्यक्ति अपने कर्मों को छिपा सकता है, लेकिन धार्मिक मान्यता के अनुसार कर्मों का फल उससे कभी नहीं छिपता।

इसके बाद गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद की यात्रा का एक विस्तृत वर्णन मिलता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मृत व्यक्ति के परिवार द्वारा किए जाने वाले अंतिम संस्कार, पिंडदान और श्राद्ध कर्म आत्मा की यात्रा से जुड़े माने जाते हैं। इन कर्मों के माध्यम से परिजन अपने दिवंगत सदस्य के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य व्यक्त करते हैं। कथा में यह भी बताया गया है कि मृत्यु के बाद जीवात्मा अपने पुराने घर और परिवार के प्रति आकर्षित रहती है। वह अपने प्रियजनों को देखती है, लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आता है कि उसका संबंध अब उस भौतिक संसार से पहले जैसा नहीं रहा। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में मृत्यु के बाद किए जाने वाले संस्कारों को बहुत महत्व दिया गया है।

गरुड़ पुराण की कथा इसके बाद आत्मा की एक लंबी यात्रा का वर्णन करती है। इस यात्रा में अनेक कठिन पड़ाव और प्रतीकात्मक स्थान बताए गए हैं। इन्हीं में वैतरणी नदी का वर्णन सबसे प्रसिद्ध है। धार्मिक ग्रंथों में इसे एक अत्यंत कठिन मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिसे पार करना जीवात्मा के लिए उसके कर्मों के अनुसार कठिन या सरल हो सकता है। इसी संदर्भ में गौदान जैसी धार्मिक परंपराओं का उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार, जिसने जीवन में धर्म और दान के कार्य किए होते हैं, उसके लिए मृत्यु के बाद की यात्रा अपेक्षाकृत सहज होती है। यहां यह कथा मनुष्य को जीवन में दया, सेवा, दान और सदाचार का महत्व समझाने का प्रयास करती है।

आगे चलकर आत्मा यमलोक पहुंचती है, जहां उसके कर्मों का अंतिम मूल्यांकन होता है। गरुड़ पुराण की मान्यता के अनुसार चित्रगुप्त जीव के कर्मों का लेखा प्रस्तुत करते हैं और यमराज उसके कर्मों के आधार पर निर्णय देते हैं। अच्छे कर्मों का फल अलग बताया गया है और बुरे कर्मों का परिणाम अलग। इस पूरी कथा का मूल संदेश यही है कि मनुष्य के कर्म ही उसकी वास्तविक पूंजी हैं। धन, पद, शक्ति और सांसारिक प्रतिष्ठा मृत्यु के बाद साथ नहीं जाती, लेकिन कर्मों का प्रभाव आत्मा की आगे की यात्रा से जुड़ा माना जाता है।

भगवान विष्णु अंत में गरुड़ से कहते हैं कि मनुष्य को मृत्यु से डरने के बजाय अपने जीवन को सही कर्मों से भरना चाहिए। धार्मिक परंपरा में ईश्वर का स्मरण, सत्य, दया, सेवा, संयम और परोपकार को जीवन का आधार माना गया है। गरुड़ पुराण की यह कथा हमें मृत्यु का भय दिखाने के लिए ही नहीं, बल्कि जीवन का मूल्य समझाने के लिए भी पढ़ी जाती है। मृत्यु कब आएगी, यह कोई नहीं जानता, लेकिन जीवन में हम क्या करते हैं, यह हमारे हाथ में है। इसलिए यदि इस कथा से कोई सबसे बड़ा संदेश लिया जाए, तो वह यही है कि इंसान को ऐसा जीवन जीना चाहिए जिसके कर्म उसके जाने के बाद भी उसके परिवार और समाज में अच्छी याद बनकर जीवित रहें।

जय श्री हरि 🙏🏻

लंका की धरती पर श्रीराम और रावण के बीच धर्म और अधर्म का अंतिम महासंग्राम अपने चरम पर था। आकाश देवताओं के विमानों से भरा ...
07/08/2026

लंका की धरती पर श्रीराम और रावण के बीच धर्म और अधर्म का अंतिम महासंग्राम अपने चरम पर था। आकाश देवताओं के विमानों से भरा था, समुद्र तक युद्ध की गर्जना से कांप रहा था और वानर सेना अपने प्राणों की परवाह किए बिना प्रभु श्रीराम के लिए युद्ध कर रही थी। रावण के एक-एक महायोद्धा के पतन के साथ अधर्म का साम्राज्य डगमगाने लगा था। किंतु उसी समय सातों पाताल लोकों की गहराइयों में एक ऐसी शक्ति जाग उठी, जिसके विषय में देवताओं तक को अधिक ज्ञान नहीं था। वहाँ निवास करती थी मायावी राक्षसी मयंदी। लोककथाओं में उसे मंदोदरी की बहन कहा गया है। जब उसे ज्ञात हुआ कि उसकी बहन का कुल विनाश के कगार पर है और रावण की पराजय निश्चित दिखाई दे रही है, तब उसका हृदय क्रोध और प्रतिशोध की अग्नि से भर उठा। उसने अपनी विशाल गुफा के मध्य खड़े होकर गर्जना की, “यदि लंका का साम्राज्य डूबेगा तो उससे पहले राम की पूरी वानर सेना नष्ट हो जाएगी। आज पाताल की शक्ति धरती पर उतरेगी और ऐसा संहार करेगी जिसे युगों तक याद रखा जाएगा।”

मयंदी ने अपनी प्राचीन तांत्रिक साधना आरंभ की। उसने अग्निकुंड में दुर्लभ औषधियाँ, विषैले नागों का विष, समुद्री जीवों का रक्त और पाताल की रहस्यमयी मिट्टी अर्पित की। जैसे-जैसे उसके मंत्र गूंजने लगे, पूरी पाताल नगरी कांप उठी। देखते ही देखते उसके सामने रखे साठ हजार विशाल अंडों से विचित्र गर्जनाएँ सुनाई देने लगीं। एक-एक कर सभी अंडे फूटने लगे और उनमें से निकले विकराल मकर योद्धा। उनका शरीर मगरमच्छ जैसा, भुजाएँ पर्वत के समान बलवान, दाँत वज्र जैसे कठोर और आँखें अंगारों की भाँति धधक रही थीं। प्रत्येक मकर योद्धा अकेला ही सैकड़ों सैनिकों के बराबर बल रखता था। मयंदी ने अपने त्रिशूल को आकाश की ओर उठाकर आदेश दिया, “जाओ, पृथ्वी पर जाओ। राम की सेना का नामोनिशान मिटा दो। आज कोई भी वानर जीवित वापस नहीं लौटेगा।”

क्षणभर में साठ हजार मकर योद्धाओं की सेना धरती की ओर बढ़ चली। उनके कदमों की गर्जना से पर्वत कांपने लगे, नदियों का जल उफनने लगा और रणभूमि के समीप धरती जगह-जगह फटने लगी। अचानक युद्धभूमि के एक छोर पर विशाल दरारें खुलीं और उनमें से काले बादलों की तरह वह मकर सेना निकल पड़ी। वानर सेना ने ऐसा भयानक दृश्य पहले कभी नहीं देखा था। देखते ही देखते अनेक योद्धा उनके प्रचंड आक्रमण से घायल होने लगे। उनकी गर्जना से हाथियों के समान बलवान वानर भी कुछ क्षणों के लिए भयभीत हो उठे। अंगद, नील, नल, जाम्बवान और अन्य वीरों ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, परंतु मकर योद्धाओं की संख्या और शक्ति दोनों ही असाधारण थीं।

उसी समय पवनपुत्र हनुमान ने यह दृश्य देखा। उन्होंने तुरंत रणभूमि के मध्य पहुँचकर ऊँचे स्वर में कहा, “रामभक्तों! भय मत करो। जब तक हनुमान जीवित है, तब तक प्रभु श्रीराम की सेना का एक भी बाल बाँका नहीं हो सकता।” उनके वचन सुनते ही समस्त वानर सेना का उत्साह लौट आया। बिना एक क्षण गंवाए हनुमान जी अकेले ही उस विशाल मकर सेना की ओर दौड़ पड़े। उनकी गर्जना से दिशाएँ गूँज उठीं। उन्होंने एक विशाल पर्वत उखाड़कर पहली पंक्ति पर दे मारा। दर्जनों मकर योद्धा उसी क्षण धराशायी हो गए। फिर उन्होंने अपनी गदा उठाई और जहाँ-जहाँ उसका प्रहार हुआ, वहाँ पूरी-पूरी टुकड़ियाँ बिखरती चली गईं। कोई उनकी पूँछ की गति नहीं पकड़ सका, कोई उनके वेग का अनुमान नहीं लगा सका। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वयं प्रलय का देवता युद्धभूमि में उतर आया हो।

मकर योद्धाओं ने चारों दिशाओं से हनुमान जी को घेर लिया। किसी ने विषैले अस्त्र चलाए, किसी ने अग्निबाण छोड़े, तो किसी ने मायावी जलधाराओं से उन्हें बाँधने का प्रयास किया। किंतु पवनपुत्र हर बार उन सब बंधनों को क्षणभर में तोड़ देते। कभी वे आकाश में उड़कर हजारों शत्रुओं पर एक साथ टूट पड़ते, कभी धरती पर उतरकर अपने नखों और गदा से उनका संहार कर देते। उनका प्रत्येक प्रहार बिजली के समान तीव्र और पर्वत के समान भारी था। देखते-देखते मकर सेना की पंक्तियाँ टूटने लगीं। हजारों योद्धा परास्त होकर भूमि पर गिर पड़े। रणभूमि में पहली बार मयंदी के चेहरे पर चिंता की रेखाएँ दिखाई देने लगीं।

जब उसे लगा कि उसकी विशाल सेना पराजय के कगार पर पहुँच गई है, तब वह स्वयं युद्धभूमि में उतर आई। उसके प्रकट होते ही आकाश काले बादलों से भर गया, चारों दिशाओं में भयंकर आँधी चलने लगी और धरती पर अंधकार छा गया। उसने क्रोध से गर्जना करते हुए कहा, “वानर! मेरी साठ हजार सेना को कोई देवता भी नहीं हरा सकता था। तू आखिर कौन है?” हनुमान जी ने अत्यंत शांत स्वर में उत्तर दिया, “मैं कोई महान योद्धा नहीं, केवल प्रभु श्रीराम का सेवक हूँ। उनकी कृपा ही मेरी शक्ति है।”

मयंदी ने अपनी समस्त मायावी शक्तियाँ एक साथ प्रकट कर दीं। उसने भ्रम उत्पन्न किया, आकाश से अग्निवर्षा कराई, विषैले नागों को बुलाया, पाताल की ज्वालाएँ रणभूमि में फैला दीं और भयंकर राक्षसी रूप धारण कर हनुमान जी पर टूट पड़ी। किंतु श्रीराम के नाम का स्मरण करते ही हनुमान जी के शरीर से ऐसा दिव्य तेज प्रकट हुआ कि मयंदी की समस्त मायाएँ उसी क्षण नष्ट होने लगीं। उसकी अग्नि शीतल हो गई, उसके अस्त्र निष्प्रभ हो गए और उसका अभिमान धीरे-धीरे टूटने लगा। अंततः जब उसका अंतिम प्रहार भी व्यर्थ हो गया, तब उसने पहली बार हनुमान जी के वास्तविक तेज का अनुभव किया। उसे प्रतीत हुआ मानो उसके सामने कोई साधारण वानर नहीं, स्वयं महादेव का अंश खड़ा हो।

उसका क्रोध शांत हो गया। उसने अपने अस्त्र त्याग दिए, दोनों हाथ जोड़कर हनुमान जी के चरणों में सिर झुका दिया और बोली, “हे वीर हनुमान! अब मैं समझ गई हूँ कि आप सामान्य वानर नहीं हैं। आप तो दिव्य शक्ति के धाम हैं। मेरे अहंकार ने मुझे अंधा बना दिया था। कृपया मेरे अपराधों को क्षमा करें।” हनुमान जी ने उसे करुणा भरी दृष्टि से देखा। वे बोले, “जो अपने दोष को स्वीकार कर लेता है, उसके लिए क्षमा का मार्ग सदैव खुला रहता है।”

मयंदी ने विनम्र स्वर में कहा, “मैं अपने लिए कुछ नहीं चाहती। मेरा वंश भले ही समाप्त हो जाए, पर एक वरदान दीजिए कि मेरे कुल का नाम संसार कभी न भूले।” हनुमान जी मुस्कुराए और बोले, “तुम्हारा अभिमान भले नष्ट हो गया, पर तुम्हारा पश्चाताप सच्चा है। इसलिए मैं तुम्हें वर देता हूँ कि तुम्हारे वंश की कथा युगों तक स्मरण की जाएगी। लोग जानेंगे कि अहंकार का अंत निश्चित है, पर जो समय रहते सत्य को स्वीकार कर ले, उसे मेरी कृपा अवश्य प्राप्त होती है।”

यह सुनते ही मयंदी ने पुनः प्रभु श्रीराम और हनुमान जी को प्रणाम किया। उसके शेष मकर योद्धाओं ने भी अपने अस्त्र त्याग दिए। युद्धभूमि में शांति लौट आई। देवताओं ने आकाश से पुष्पवर्षा की और वानर सेना ने जय श्रीराम तथा जय हनुमान के घोष से समस्त दिशाओं को गुंजा दिया। कहा जाता है कि उसी दिन से पाताल के मकर वंश की कथा अमर हो गई और यह संदेश भी युगों-युगों तक जीवित रहा कि भगवान के सच्चे भक्त के सामने संसार की सबसे प्रबल मायावी शक्ति भी अधिक देर तक टिक नहीं सकती। श्रीराम की भक्ति और हनुमान जी की कृपा जहाँ होती है, वहाँ अंततः विजय केवल धर्म की ही होती है।

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