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20/12/2023

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🌹गुरु तेग बहादुरजी शहीदी दिवस : 24 नवम्बर 2023🌹धर्म की रक्षा के लिए किया प्राणों का बलिदान🌹भगवत्प्राप्त महापुरुष परमात्म...
24/11/2023

🌹गुरु तेग बहादुरजी शहीदी दिवस : 24 नवम्बर 2023

🌹धर्म की रक्षा के लिए किया प्राणों का बलिदान

🌹भगवत्प्राप्त महापुरुष परमात्मा के नित्य अवतार हैं । वे नश्वर संसार व शरीर की ममता को हटाकर शाश्वत परमात्मा में प्रीति कराते हैं । कामनाओं को मिटाते हैं। निर्भयता का दान देते हैं । साधकों-भक्तों को ईश्वरीय आनन्द व अनुभव में सराबोर करके जीवन्मुक्ति का पथ प्रशस्त करते हैं ।

🌹 ऐसे उदार हृदय, करुणाशील, धैर्यवान सत्पुरुषों ने ही समय-समय पर समाज को संकटों से उबारा है । इसी शृंखला में गुरु तेगबहादुरजी हुए हैं। जिन्होंने बुझे हुए दीपकों में सत्य की ज्योति जगाने के लिए, धर्म की रक्षा के लिए, भारत को क्रूर, आततायी, धर्मान्ध राज्य-सत्ता की दासता की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए अपने प्राणों का भी बलिदान कर दिया ।

🌹 हिन्दुस्तान में मुगल बादशाह औरंगजेब का शासनकाल था । औरंगजेब ने यह हुक्म किया कि कोई हिन्दू राज्य के कार्य में किसी उच्च स्थान पर नियुक्त न किया जाय तथा हिन्दुओं पर जजिया (कर) लगा दिया जाय । उस समय अनेकों नये कर केवल हिन्दुओं पर लगाये गये । इस भय से अनेकों हिन्दू मुसलमान हो गये । हर ओर जुल्म का बोलबाला था । निरपराध लोग बंदी बनाये जा रहे थे । प्रजा को स्वधर्म-पालन को भी आजादी नहीं थी ।

🌹 जबरन धर्म-परिवर्तन कराया जा रहा था । किसी की भी धर्म, जीवन और सम्पत्ति सुरक्षित नहीं रह गयी थी । पाठशालाएँ बलात् बन्द कर दी गयीं ।
हिन्दुओं के पूजा-आरती तथा अन्य सभी धार्मिक कार्य बंद होने लगे । मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बनवायी गयीं एवं अनेकों धर्मात्मा मरवा दिये गये । सिपाही यदि किसी के शरीर पर यज्ञोपवीत या किसी के मस्तक पर तिलक लगा हुआ देख लें तो शिकारी कुत्तों की तरह उन पर टूट पड़ते थे । उसी समय की उक्ति है कि रोजाना सवा मन यज्ञोपवीत उतरवाकर ही औरंगजेब रोटी खाता था...

🌹उस समय कश्मीर के कुछ पंडित निराश्रितों के आश्रय, बेसहारों के सहारे गुरु तेगबहादुरजी के पास मदद की आशा और विश्वास से पहुँचे ।
पंडित कृपाराम ने गुरु तेगबहादुरजी से कहा : ‘‘सद्गुरुदेव ! औरंगजेब हमारे ऊपर बड़े अत्याचार कर रहा है । जो उसके कहने पर मुसलमान नहीं हो रहा, उसका कत्ल किया जा रहा है । हम उससे छः माह की मोहलत लेकर हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए आपकी शरण आये हैं । ऐसा लगता है, हममें से कोई नहीं बचेगा । हमारे पास दो ही रास्ते हैं-‘धर्मांतरित होओ या सिर कटाओ ।’

🌹पंडित धर्मदास ने कहा : ‘‘सद्गुरुदेव ! हम समझ रहे हैं कि हमारे साथ अन्याय हो रहा है । फिर भी हम चुप हैं और सब कुछ सह रहे हैं । कारण भी आप जानते हैं । हम भयभीत हैं, डरे हुए हैं । अन्याय के सामने कौन खड़ा हो?’’
‘‘जीवन की बाजी कौन लगाये ?’’ गुरु तेगबहादुर के मुँह से अस्फुट स्वर में निकला । फिर वे गुरुनानक की पंक्तियाँ दोहराने लगे ।

🌹जे तउ प्रेम खेलण का चाउ । सिर धर तली गली मेरी आउ ।।
इत मारग पैर धरो जै । सिर दीजै कणि न कीजै ।।

🌹गुरु तेगबहादुर का स्वर गंभीर होता जा रहा था । उनकी आँखों में एक दृढ़ निश्चय के साथ गहरा आश्वासन झाँक रहा था । वे बोले : ‘‘पंडितजी ! यह भय शासन का है । उसकी ताकत का है, पर इस बाहरी भय से कहीं अधिक भय हमारे मन का है । हमारी आत्मिक शक्ति दुर्बल हो गयी है । हमारा आत्मबल नष्ट हो गया है । इस बल को प्राप्त किये बिना यह समाज भयमुक्त नहीं होगा । बिना भयमुक्त हुए यह समाज अन्याय और अत्याचार का सामना नहीं कर सकेगा ।’’

🌹पंडित कृपाराम : ‘‘परन्तु सद्गुरुदेव । सदियों से विदेशी पराधीनता और आन्तरिक कलह में डूबे हुए इस समाज को भय से छुटकारा किस तरह मिलेगा ?’’

🌹गुरु तेगबहादुर : ‘‘हमारे साथ सदा बसनेवाला परमात्मा ही हमें वह शक्ति देगा कि हम निर्भय होकर अन्याय का सामना कर सकें ।’’
उनके मुँह से शब्द फूटने लगे : पतित उधारन भै हरन हरि अनाथ के नाथ । कहु नानक तिह जानिए सदा बसत तुम साथ ।।
इस बीच नौ वर्ष के बालक गोबिन्द भी पिता के पास आकर बैठ गये ।

🌹गुरु तेगबहादुर : ‘‘अँधेरा बहुत घना है । प्रकाश भी उसी मात्रा में चाहिए । एक दीपक से अनेक दीपक जलेंगे । एक जीवन की आहुति अनेक जीवनों को इस रास्ते पर लायेगी ।

🌹पं. कृपाराम : ‘‘आपने क्या निश्चय किया है, यह ठीक-ठीक हमारी समझ में नहीं आया । यह भी बताइये कि हमें क्या करना होगा ?’’

🌹गुरु तेगबहादुर मुस्कराये और बोले : ‘‘पंडितजी ! भयग्रस्त और पीड़ितों को जगाने के लिए आवश्यक है कि कोई ऐसा व्यक्ति अपने जीवन का बलिदान दे, जिसके बलिदान से लोग हिल उठें, जिससे उनके अंदर की आत्मा चीत्कार कर उठे । मैंने निश्चय किया है कि समाज की आत्मा को जगाने के लिए सबसे पहले मैं अपने प्राण दूँगा और फिर सिर देनेवालों की एक शृंखला बन जायेगी । लोग हँसते-हँसते मौत को गले लगा लेंगे ।

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01/10/2023

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25/08/2023

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सच्ची आज़ादी वही है जब इन्द्रिय, मन और विषय विकारों के बंधन से पर अपना परमेश्वरीय सुख मिले उस समय सच्ची आज़ादी। बाकी काल...
15/08/2023

सच्ची आज़ादी वही है जब इन्द्रिय, मन और विषय विकारों के बंधन से पर अपना परमेश्वरीय सुख मिले उस समय सच्ची आज़ादी। बाकी काल्पनिक आज़ादियाँ कई बार धरती पर आई अपने अपने अपने अपने राज्यों की अपने अपने देशों की, अपने अपने मज़हब की।
पति-पत्नी झगड़ा चल रहा था divorce हो गया चलो आज़ाद हो गए, कैदी जेल से आज़ाद हो गया लेकिन ये सब काल्पनिक सापेक्ष्य आज़ादियाँ है।
ऐसे ही देश गुलाम था, अब आज़ाद हो गया। चलो आज़ादी दिवस मनाओ... ये सब सापेक्ष्य काल्पनिक आज़ादियाँ है।
सच्ची आज़ादी इस जीवात्मा की तब है जब विषय-विकारों के प्रभाव से अपने को विनिर्मुक्त भगवत रस सम्पन्न पाएं।

दिले तस्वीरे है यार, जब भी गर्दन झुका ली और मुलाकात कर ली,
वो सच्चा आज़ाद है।

वो आज़ाद आत्मा किसी भी देश, किसी भी काल, किसी भी वस्तु-परिस्थिति से प्रभावित नहीं होता।
किसी भी बंधन में और कर्म में कर्तृत्व जाल में नहीं फँसता। वो पूर्ण आज़ाद तो ब्रह्मवेत्ता होता है बाकी सब कल्पना की आज़ादियाँ मानते रहो
काल्पनिक जगत में ठीक है
#स्वतंत्रतादिवस

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26/05/2023

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महाराणा प्रताप की उदारताजिसका चरित्र पवित्र है, वही दूसरों में पवित्र भावना का संचार कर सकता है  । उसीका जीवन सुरभित सुम...
09/05/2023

महाराणा प्रताप की उदारता

जिसका चरित्र पवित्र है, वही दूसरों में पवित्र भावना का संचार कर सकता है । उसीका जीवन सुरभित सुमन की भाँति संसार-वाटिका को सौरभ से परिपूर्ण कर सकता है । चरित्रबल की बड़ी महत्ता है ।

बात उन दिनों की है जब भामाशाह की सहायता से महाराणा प्रताप पुनः सेना एकत्र करके मुगलों के छक्के छुड़ाते हुए डूँगरपुर,बाँसवाड़ा आदि स्थानों पर अपना अधिकार जमाते जा रहे थे ।

एक दिन तेज ज्वर के कारण महाराणा प्रताप युद्ध में न जा सके । इस कारण युद्ध का नेतृत्व उनके पुत्र कुँवर अमरसिंह कर रहे थे । उनकी मुठभेड़ अब्दुर्रहीम खानखाना की सेना से हुई । खानखाना और उसकी सेना जान बचाकर भाग खड़ी हुई । अमरसिंह ने महिलाओं तथा बचे हुए सैनिकों को वहीं कैद कर लिया । जब यह समाचार महाराणा को मिला तो वे अमरसिंह पर बहुत क्रुद्ध हुए और बोले : ‘‘किसी स्त्री पर राजपूत हाथ उठाये, यह मैं सहन नहीं कर सकता । यह हमारे लिए शर्म से डूब मरने की बात है ।’’ वे तेज ज्वर में ही युद्धभूमि के उस क्षेत्र में जा पहुँचे, जहाँ खानखाना परिवार की महिलाएँ बंदी बनाकर रखी गयी थीं ।

महाराणा प्रताप खानखाना की बेगम से विनीत स्वर में बोले : ‘‘खानखाना मेरे बड़े भाई हैं । इसलिएरिश्ते में आप मेरी भाभी हैं । यद्यपि यह मस्तक आज तक किसी व्यक्ति के सामने नहीं झुका, परंतु मेरे पुत्र अमरसिंह ने आप लोगों को कैद कर लिया है, उसके इस व्यवहार से आपको जो कष्ट हुआ उसके लिए मैं माफी चाहता हूँ और आप लोगों को ससम्मान मुगल छावनी में पहुँचाने का वचन देता हूँ ।’’

उधर हताश-निराश खानखाना जब अकबर के पास पहुँचे तो उसने व्यंग्यपूर्ण वाणी में उनका स्वागत किया कि ‘‘जनानखाने को युद्धभूमि में छोड़कर आप लोग जान बचाकर यहाँ तक कुशलता से पहुँच गये ?’’ खानखाना मस्तक नीचा करके बोले : ‘‘जहाँपनाह ! आप चाहे मुझे जितना भी शर्मिंदा कर लें, परंतु महाराणा प्रताप के रहते वहाँ महिलाओं को कोई खतरा नहीं है ।’’ तब तक खानखाना परिवार की महिलाएँ कुशलतापूर्वक वहाँ पहुँच गयीं ।

यह दृश्य देखकर अकबर गंभीर होकर खानखाना से कहने लगा : ‘‘राणा प्रताप ने आपकी बेगम व पुत्रवधू को यों ससम्मान पहुँचाकर आपकी ही नहीं, पूरे मुगल खानदान की इज्जत की रक्षा की है । महाराणा प्रताप की महानता के आगे मेरा मस्तक झुका जा रहा है । उनके जैसे उदार, धर्मात्मा योद्धा को कोई गुलाम नहीं बना सकता ।’’ (लोक कल्याण सेतु : फरवरी 2005)

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