21/09/2018
II श्रीहरिः II
“ प्रार्थना ”
हे प्रभो !
मैं दुःखोंसे दबा हूँ, तापोंसे संतप्त हूँ, अभावोंसे आकुल हूँ, व्यवस्थाओंसे व्याकुल हूँ, अपमानोंसे पीड़ित हूँ, अपकीर्तिसे कलंकित हूँ, व्याधियोंसे ग्रस्त हूँ और भयोंसे त्रस्त हूँ । मेरे सामने दुःखी दुनियामें दूसरा कौन होगा ? सारे दुखोंका पहाड़ मानो मुझ पर ही टूट पड़ा है । परन्तु हे मेरे प्रियतम ! क्या यह सच नहीं है कि यह सब तुम्हारी भेजी हुई सौगात है । तुम्हारा ही प्रेमसे दिया हुआ उपहार है ! इस सत्यको जानने पर भी हे मेरे प्यारे ! फिर मुझे इनकी प्राप्तिमें असंतोष क्यों होता है ? तुम्हारी दी हुई प्रत्येक वस्तुमें तुम्हारे हृदयके निर्मल प्रेमको देख कर, ओ मेरे हृदयधन ! तुम्हारे प्रत्येक विधानमें तुम्हारा कोमल कर-स्पर्श पाकर मैं परम सुखी हो सकूँ । ऐसा प्रेमियों-का-सा विलक्षण हृदय दे दो नाथ !
- श्रद्धेय हनुमानप्रसाद पोद्दार भाईजी
(‘प्रार्थना’ पुस्तक से, पुस्तक कोड ३६८, गीताप्रेस गोरखपुर)