23/08/2023
ऐसा कोई ज्ञान नही जो आपकी गहराई मे ना पड़ा हो..!
तुम अव्यक्त हो और परमात्मा भी अव्यक्त है..!
जो व्यक्त है वो बदल जाता है ..अव्यक्त ज्यो का त्यों रहता है..!
तुमको मार सके ऐसी दुनिया मे कोई मौत पैदा नही हुई..!
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भारत की 'चंद्रयान-3' और रसिया की 'लूना-25' में से, कौन चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहले उतरेगा? यह चन्द्रमा का एक ऐसा हिस्सा है, जहां आज तक किसी भी देश का "लेंडर" नहीं पहुंच सका है।
भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, ISRO की ओर से भेजे गए चंद्रयान-3 ने चंद्रमा की 'कक्षा' में प्रवेश कर लिया है। और वहीं कल ही रूस ने भी चांद के लिए, अपना लूना-25 मिशन लॉन्च कर दिया है "चंद्रयान-3 और लूना-25" को चन्द्रमा के उसी दक्षिणी ध्रुव पर लैंड करना है!! जहां पर करोड़ों सालों से सूरज की रोशनी नहीं पहुंची है, और जहां दुनिया का कोई देश आज तक नहीं पहुंचा है!! ऐसे में इस मिशन का यह पल बेहद हैरतअंगेज कर देने वाला होगा। हालांकि, दोनों के बीच लैंडिंग की दूरी करीब '120 किलोमीटर' की होगी। और दोनों के एक ही दिन चन्द्रमा के सतह पर उतरने के दावे किए जा रहे हैं। तो मित्रों... चलिए जानते हैं इन दावों की सच्चाई। मुझे भी बहुत सारे मित्रों ने, मैसेज बॉक्स और कॉमेंट में पुछा है कि क्या 15 तारीख को भारत की चन्द्रयान-3 चन्द्रमा पर लैंडिंग करेगी!?
एक तरफ भारत के चंद्रयान-3 को चन्द्रमा पे पहुंचने में करीब 27 दिनों का वक्त लग रहा है, तो वहीं लूना-25 केवल 10 से 11 दिनों में चांद पर लैंड कर सकता है!? दरअसल इसे बहुत ही शक्तिशाली 'सोयूज 2.1' रॉकेट से लॉन्च किया गया है, जो लूना-25 को धरती की कक्षा की परिक्रमा के बगैर, सीधे चांद के ऑर्बिट में पहुंचा देगा! ऐसे में चंद्रयान-3 और लूना-25 में से कौन चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पे पहले उतरेगा, इसे लेकर पूरी दुनिया में "चर्चा" छिड़ गई है। यह चन्द्रमा का एक ऐसा हिस्सा है, जहां आज तक किसी भी देश का "लेंडर" नहीं पहुंच सका है। ऐसे में चंद्रयान-3 और लूना-25 की लैंडिंग एक दूसरे की प्रतिद्वंदिता के तौर पर भी देखी जा रही है और इसी विषय को लेकर ISRO के एक पूर्व वैज्ञानिक, तपन मिश्रा जी के इंटरव्यू भी बहुत महत्वपूर्ण है!! मिश्रा जी के कथन अनुसार रसिया के चंद्रयान मिशन से हमारे चंद्रयान-3 का कोई मुकाबला ही नहीं है। इसे प्रतिद्वंदिता के तौर पर, बिल्कुल नहीं देखा जाना चाहिए क्योंकि चंद्रयान-3 लूना-25 के मुकाबले अधिक महत्वाकांक्षी मिशन है। भारत के इस महत्वाकांक्षी अभियान में केवल 615 करोड़ रुपये का "खर्च" हुए हैं, जो देश के अंदर एक छोटा सा फ्लाईओवर निर्माण के खर्च के बराबर है और इतने कम राशि में हमारा मिशन चन्द्रमा के उस हिस्से के लिए निकला है जहां दुनिया का कोई देश आज तक नहीं पहुंचा!! ऐसे में लूना-25 का चंद्रयान-3 से कोई मुकाबला ही नहीं हो सकता। मिश्रा जी ने कहा कि भारत के लिए यह बहुत गौरव का क्षण होगा, जब चंद्रयान-3 तय समय से पहले चन्द्रमा की सबसे निचली कक्षा में जा पहुंचा है। (यहां पे नोट करें कि तय समय से पहले) ओर इसके 'वैज्ञानिक' पहलू पर रुख करें तो "चन्द्रमा" की आखिरी कक्षा में जब चंद्रयान-3 को पहुंचना था तो, उसके काफी पहले उसके कक्ष की गणना कर के ISRO के "वैज्ञानिकों" ने इंजन को फायरिंग कर उसे पहुंचा दिया था!! ऐसे में अगर ISRO ने चाहा तो तय तारीख से चार दिन पहले ही मौजूदा साइंटिफिक आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए जीरो एरर के साथ, चंद्रयान-3 को शेड्यूल लैंडिंग साइट पर उतार सकता है! परंतु भारत की इस अति महत्वाकांक्षी मिशन को, लूना-25 के प्रतिद्वंदिता से जोड़कर नहीं देखा जा रहा है, इसलिए भारत कोई रिस्क नहीं लेगा। (यहां पे आप नोट करें कि तय तारीख से चार दिन पहले चन्द्रयान-3 को उतारा जा सकता है और यह बहुत अहम बात है)
मुझे लगता है कि जितनी कम कीमत में हमारा चंद्रयान चन्द्रमा पर गया है, उससे कई गुना अधिक कीमत, रूस के लूना-25 पर लगी है। इसके अलावा हमारा यह मिशन, महज तीन साल में प्लान किया गया है! जबकि रूस ने अपने लूना-25 मिशन को 1990 के दशक से ही 'प्लानिंग और प्रक्रिया' शुरू कर दी थी। इसके अलावा लूना 25 की लॉन्चिंग में कम से कम 160 मिलियन रुपये का खर्च हुआ है जो चंद्रयान-3 के बजट से कई गुना ज्यादा है!! इसीलिए हमारा चंद्रयान मिशन लूना-25 के मुकाबले, अधिक महत्वाकांक्षी व देश को गौरवान्वित करने वाला है... मिश्रा जी का कहना है कि जैसे लूना-25 को लॉन्च करने के लिए, अति शक्तिशाली रॉकेट का इस्तेमाल किया गया जो सीधे धरती की कक्षा से उपग्रह को ले जाकर, सीधे चन्द्रमा की कक्षा में प्रवेश करा सकता है, वैसी टेक्नोलॉजी हमारे पास फिलहाल 'मौजूद' नहीं है। बावजूद इसके हमने चंद्रयान-3 को स्लिंगशॉट मेकानिजम के तहत पहले "धरती" के गुरुत्वाकर्षण की मदद से धरती के परिक्रमा कराते हुए कक्षा से बाहर फेंका उसके बाद चन्द्रमा की कक्षा में, सबसे आखरी वलय तक उसे पहुंचा दिया है। इस "मेकानिजम" को सरल शब्दों में समझें तो जैसे एक गुलेल में रबड़ लगी होती है। उसमें से जिस वस्तु को दूर फेंकना है तो पहले रबड़ में उस वस्तु को डाल कर हथेलियों से पीछे खींचा जाता है। और खिंचने वाले की, मांसपेशियों की ऊर्जा रबड़ में जाती है, और स्टोर हो जाती है। उसके बाद जब गुलेल को छोड़ा जाता है तो रबड़ में 'एकत्रित' हुई मांसपेशियों की ऊर्जा एकजुट होकर, गुलेल से छोड़े जाने वाली 'वस्तु' को काफी तेज रफ्तार से दूर फेंक देती है। इसी तकनीक से हमारा चंद्रयान-3 को चंद्रमा की दक्षिणी ध्रुव तक पहुंचा दिया गया है और इससे बहुत बड़ी ईंधन की खपत बचाई गई है, जो भारत के वैज्ञानिकों की सूझबूझ और दक्षता को दर्शाती है। इसीलिए लूना-25 और चंद्रयान-3 में कोई तुलना नहीं है।
जिस सटीकता के साथ भारतीय वैज्ञानिक, मिशन को अंजाम दे रहे है, वह निश्चित तौर पर चंद्रमा की 'दक्षिणी ध्रुव' पर लैंड करेगा। चन्द्रयान-2 के Orbiter से भेजे गए डाटा व सर्वेक्षण से पता चला है कि जहां हमारा चन्द्रयान-3 लैंडिंग करेगा वहां बहुत बर्फ जमी है, और चंद्रयान-3 का मकसद भी यही है कि वहां ऑक्सीजन और पानी की खोज करेगा और यही मकसद लूना-25 का भी है! लेकिन रसिया को यह अभियान करने में 40 साल लग गए। 47 सालों के बाद रसिया ने, अपना चन्द्रमा का मिशन किया है, जबकि भारत के वैज्ञानिको ने, महज तीन वर्षों में इसे सफलता तक पहुंचाया है। चंद्रमा की उत्पत्ति 450 करोड़ साल पहले हुई थी! और तब से लेकर अब तक उसपर लगातार अंतरिक्ष से आने वाले "पत्थर" और उल्कापिंड गिरते रहते हैं। इनके गिरने से गड्ढे यानी 'Crater' बनते हैं और इन्हें Impact Crater भी कहते हैं!! चंद्रमा पर करीब "14 लाख गड्ढे" हैं। 9137 से ज्यादा क्रेटर की पहचान की गई है। 1675 की तो उम्र भी पता की गई है। परंतु वहां हजारों गड्ढे हैं, जिन्हें इंसान देख भी नहीं पाया है। क्योंकि उसके अंधेरे वाले हिस्से में देखना मुश्किल है। ऐसा नहीं है कि चन्द्रमा की "सतह" पर मौजूद गड्ढे सिर्फ इम्पैक्ट क्रेटर हैं!! कुछ ज्वालामुखी विस्फोट की वजह से भी बने हैं करोड़ों साल पहले।
मित्रों... मैंने जितना इस विषय पर अध्ययन किया है वह सभी जानकारी आप लोगों के सामने रखा है, मेरे बहुत सारे मित्रों ने मुझे जितने सारे सवाल किए थे, मैंने हर सवालों के जवाब को तथ्य के साथ विश्लेषण करके आप लोगों के सामने रखा है...
सदा जय हो मेरे देश के वैज्ञानिको की, जय भारत