12/11/2022
पूनासा मठ के महंत श्री 1008 श्री बाबूगिरी जी महाराज के शिष्य संत श्री सोमगिरि जी महाराज कुटुंब यात्रा के लिए रविवार को उनके जन्म स्थली किरवाला गांव पधारें। रात को भजन संध्या रखी। आज सन्त श्री सोमगिरि जी महाराज की कुटुंब यात्रा के उपलक्ष्य में देवासी गलसर परिवार की तरफ से भोजन - प्रसादी, बैठक एवं संत समागम समारोह रखा गया। सन्यास के बाद किसी भी संत द्वारा कुटुंब यात्रा पर आना सिर्फ जन्म देने वाले माँ- बाप, भाई- बहन के लिए ही नहीं वरन सगे सम्बन्धियों, गांव वालों और हर संवेदनशील व्यक्ति के लिए ये बड़ा भावुक कर देने वाला क्षण होता है। उमड़ते भावनाओं के ज्वार, परिवार एवं सगे सम्बन्धियों से बिछोह का दर्द, वेदना, उनके प्रति राग- अनुराग, लगाव आदि को लेकर मन पर कठोर नियंत्रण एवं निर्मम निर्णय लेकर ही सांसारिक मोह माया से विरक्ति के भाव लाने का समय होता है। जो सद्गुरु की कृपा और ईश्वर के प्रति प्रेम जगाने से ही सम्भव है। तभी वैराग्य के भाव जागृत हो सकते हैं। ईश्वर की भक्ति से मन पर कठोर नियंत्रण, ह्रदय पर पत्थर रखने के बाद ही वैराग्य भाव जागृत होकर संसार से ईश्वर की तरफ यात्रा का शुभारंभ होता है। संत के लिए तो ये सुगम हो सकता है, लेकिन परिवारजनों के लिए ये कलेजे से टुकड़ा काटकर देने के समान तकलीफदेह होता है। ये तो जिन पर बितती है, वो ही इस दर्द को जान, समझ और महसूस कर सकते हैं। ये परिवार और सन्त दोनों के लिए परीक्षा की घड़ी है। संसार से नाते रिश्तों को भूल जाने का कठिन समय होता है। ईश्वर की लीला ईश्वर ही समझते है। इस यात्रा में बिरले ही आगे बढ़ पाते है। जो आगे बढ़ गए हो भवसागर से तर जाते है, बाकी मठों के मैनेजर बनकर रह जाते है। ये बात सत्य है कि संतों की जाति नहीं होती। परंतु ये सत्य है कि देवासी समाज में जन्में लोगों ने सन्यास करके भक्ति की है, उनकी तपस्या और भक्ति जल्दी पकी है। इसका कारण देवासियों का कांच की तरह साफ मन एवं निर्मल भाव होने की वजह से ईश्वर जल्दी प्रसन्न होते आये है। वैसे भी देवासी समाज के चरवाहा रात दिन भेड़, बकरी, ऊंट और गायों को चराकर जो सेवा करते है, वो साधुओं की तरह ही तपस्या करने जैसा कठिन काम होता है। ऐसा ये पीढ़ियों से करते आ रहे हैं। इस वजह से भगवान देवासियों पर खुश रहते है। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वो संत श्री सोमगिरि जी महाराज की ईश्वर की तरफ यात्रा को सफल बनावें।
ऐसे संत के माता - पिता को भी प्रणाम करता हूँ कि आपने सनातन धर्म की रक्षा के लिए अपने पुत्र का त्याग किया है। मैं संत के साथ ही पूरे परिवार का वंदन एवं अभिनंदन करता हूं।
ुधेश्वर_महादेव_की
ोमगिरि_जी_महाराज_की
ातन_धर्म_की
मलाराम आल जेरण भीनमाल
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