National News & Survey

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20/10/2022

बना कर दिये मिट्टी के, जरा सी आस पाली है
मेरी मेहनत खरीदो यारों, मेरे घर भी दीवाली है।

25 October के सूर्य ग्रहण मे इस मंत्र की सिद्धि धन संपदा से परिपूर्ण कर देगी | मंत्र , जाने |
https://youtu.be/l-4ouw-v5_Y

19/10/2022

ये बिलकुल सत्य हैं ।।

दीपावली विशेष -25 अक्टूबर-सूर्यग्रहण-मण्डूक सिद्धि-त्रिशिरा जागरण-वृहत् योगिनी वशीकरण
https://youtu.be/1mWUG3WeUFw

19/10/2022

#छठ #पूजा क्यों शुरू हुई? पहले #कौन #किया था? क्या #विधान है?छठ पूजा #पूर्वी #उत्तरप्रदेश की #प्रधान पूजा है. वैसे तो #देश ....

18/10/2022

ये कब्रिस्तान हरियाणा की झज्जर रियासत के उन बीस सैनिकों का है जिनको 15 अक्टूबर 1857 को गुडियानी गाँव में अंग्रेज़ो द्वारा गोली मारकर शहीद कर दिया गया था।

संकट में हैं? परेशान हैं? कारण पता नहीं? ऐसे जानें -1 #वीडियो **ra
https://youtu.be/OG-h9rYg464

अंग्रेजों के दिल्ली पर कब्ज़े के बाद झज्जर नवाब को पकड़ने के लिए ब्रिगेडियर Shower को भेजा गया था। लेकिन वो गुड़गांव, रिवाड़ी, जटुसाना, गुडियानी, चरखी दादरी, छुच्छकवास और फिर झज्जर होते वहां पहुंचा।

संकट में हैं? परेशान हैं? कारण पता नहीं? ऐसे जानें-2 **ra #वीडियो
https://youtu.be/cbJBCowQcmY

Shower को लग रहा था की अगर वह सीधे दिल्ली से झज्जर गया तो लड़ाई बहुत जबरदस्त होगी। क्योंकि उस समय झज्जर छावनी में झज्जर रियासत की एक तैयार सेना थी। इस ब्रिटिश टुकड़ी ने दादरी जाते समय झज्जर नवाब के 20 घुड़सवारों को से गोली मा'र दी थी।

आवासीय दोष कितने प्रकार का होता है और उनका निदान क्या है? देखें.
https://youtu.be/ujQhKP4Zq2k

लेकिन झज्जर के आखिरी नवाब ने अभी तक अंग्रेजों से लड़ने का फैसला नहीं किया था, यहां तक ​​कि दिल्ली रिज पर भी। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों की मदद के लिए मई 1857 में केवल 200 पुरुषों की एक छोटी घुड़सवार सेना को दिल्ली भेजा था।

वास्तुदोष क्या है? यह कितने प्रकार का होता है. तथा निवारण .
https://youtu.be/3lRzWxZsiVk

एक छोटी सी पहाड़ी के पास गुड़ियानी गांव में झज्जर सैनिकों की याद में 1990 के आसपास एक शिलालेख बनाया गया था। लेकिन बदकिस्मती से वहां के लोग ही इन शहीदों की शहादत को भूल गए।

बीज़ मंत्रों की उत्पत्ति तथा ॐ का समस्त ज्ञान का कोष होना.
https://youtu.be/cLJxtimFvck

14/10/2022

990 AD से 1030 AD तक 2 ऐसे एम्पायर थे जो पूरे हिंदुस्तान को अपने कब्ज़े में लेने लग रहे थे।
ऊपर नार्थ से आ रहे थे गज़नी एम्पायर के महमूद,
और नीचे साउथ से आ रहे थे चोला एम्पायर के राजराजा और राजेंद्र चोला।

इन दोनों ने अपने समय के लगभग हर बड़े राजा को हराया अपने इलाकों में। छोड़ के एक दुसरे को।
दोनों की टक्कर कभी नहीं हुई।

जहां गज़नी का युद्ध करने की स्टाइल था तेज घोड़ों की मदद से लूटपाट और मारकाट से विरोधियों के दिलों में दहशत पैदा कर देना।
वहीँ चोल राजाओं का स्टाइल था दुश्मन को अच्छे से स्टडी करके उसके खिलाफ तैयारी करके युद्ध करने की, जिनमे सीज से लेकर वीक स्पॉट्स पर अचानक हमले जैसी टैक्टिस शामिल थी, जिस वजह से के उन्होंने South से लेकर बंगाल, श्रीलंका, और बाकी साउथ ईस्ट देशों(मलेसिया, बर्मा, इंडोनेशिया) तक सबको धूल चटा रखी थी।

शिविलिंग पर चढ़ाया प्रसाद क्यों नहीं खाना चाहिए?कुबेर एक आँख के काना कैसे हुए? **ra
https://youtu.be/qnPGxUCcAjc

अलबरूनी के हिसाब से गज़नी को चोल फौज की ताकत का पता था और वो उनसे टकराना नहीं चाहता था।
चोल राजाओं के लिए भी गज़नी पर हमला करना बहुत मुश्किल था क्यूंकि गज़नी की सेना जगहों को कब्ज़ाने की बजाय लूटकर वापस लौटने में यकीन रखती थी, और चोलों के लिए गज़नी तक जाना और वहाँ जीत पाना बहुत ही मुश्किल रहना था, शायद वैसी ही गलती रहती जैसी मराठों का पानीपत जाना रहा।
इसलिए ये युद्ध हुआ ही नहीं।
गज़नी नार्थवेस्टर्न इंडिया को जीतता रहा, जबकि चोल साउथ से लेकर ईस्ट इंडिया को।

हाँ एक बार जरूर है के ये दोनों फौजें टकरा सकती थी !

1022 में राजेंद्र चोल के राज के समय उत्तर प्रदेश के बाँदा डिस्ट्रिक्ट में पड़ने वाले कलिंजर के पास गज़नी की सेना खड़ी थी, और वहाँ 70-80 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश के सतना इलाके में चोल आर्मी खड़ी थी,
दोनों को एक दुसरे की मौजूदगी का पता था, लेकिन तब भी ये युद्ध टल गया था।

क्या आप अपनी कुण्डली में छिपे राजयोग को जानते हैं? **ra #वीडियो
https://youtu.be/-AroOnQm8B4

अगर ये युद्ध हुआ होता तो इतिहास के बाकी बड़े युद्धों की तरह ही बेहद महान युद्ध कहलाता, क्यूंकि दोनों ही सेनाएं अपने प्राइम पर थी, और जो भी रिजल्ट निकलता हिंदुस्तान का इतिहास पूरी तरह बदल जाता ।

12/10/2022

हमारे पास फोन रिचार्ज के पैसे नहीं हैं.... Outgoing ही नहीं है जी.....

कभी कभी Chartered Flight से चले जाते हैं बस... पिछले 6 महीने में सिर्फ 50 बार ही तो गए हैं.... हम तो आम आदमी हैं जी 😀😀
#सड़जी

शिविलिंग पर चढ़ाया प्रसाद क्यों नहीं खाना चाहिए?कुबेर एक आँख के काना कैसे हुए? **ra
https://youtu.be/qnPGxUCcAjc

11/10/2022

80 90 का दशक
ना सोशल मीडिया
ना ही उच्च स्तरीय VFX
ना घर घर टीवी
सिनेमा तो दूर की बात

बी आर चोपड़ा जी जब महाभारत शूट कर रहे थे तो उनके लिए बड़ा Challange तब आया जब भीष्म पितामह को मारा जाना था। मुकेश साहब ने अपने अभिनय मे जान डाल दी थी।

मुकेश उम्र मे तब तमाम लोग से छोटे थे पर उनके अभिनय ने उनको बहुत बढ़ा दिया था।

पहले यह तय हुआ था की उनको सामान्य तरीके से मार कर फिर अर्जुन अपने तीर से बाद मे एक शैया (तीर की चिता) बनाते और गंगा पुत्र उस पर जाकर गिरते।

पर पूरी टीम के लिए एक बड़ा challenge बन गया की End of Bishma कैसे दिखाया जाए क्यों की मुकेश को कोई मुकेश नही कहता था सभी लोग उनको "पितामह" ही कहते थे....... even पितामह का किरदार श्री केशव पर भी भारी था.........

अब वो समय आ गया जब भीष्म का अंत होने वाला था......

Body shape की प्लेट बनाई गयी आगे और पीछे दोनो ओर के लिए ! आगे थार्मा लगाया गया जिसमे तीर लग सके। प्लेट स्टील की थी जिसमे बाद मे असली लोहे की राड तीर के आकार की Build की गयी थी......

इस दिन के टेक के लिए एक सौ बीस घोड़े चालीस हाथी और बारह हजार सैनिक की भीड़ इकट्ठा की गयी थी...!!!

ये seen shoot के बाद (पितामह के गिरने के बाद) आधे घंटे तक सेट पर सन्नाटा पसरा रहा कुरु और पांडु दोनो ओर से लोग वास्तव मे रोते रहे।

महाभारत के सेट पर अंग्रेजी बोलना मना था लोग अपनी चप्पल बाहर ही उतार कर आते थे......!!

महाभारत रामायण आप के लिए मंचन होगा किरदार होगा हमारे लिए आस्था है!!!!!! आज भी मैं जब सुबह महाभारत देखती हूं तो मैं जमीन पर बैठ कर देखती हूं ....."मैं समय हूं" का म्युजिक जब गूंजता हैं तब मैं उस visual स्क्रीन को ईश्वर समझ कर हाथ जोड़कर प्रणाम करती हूं।

तो कुल मिलाजुलाकर बात यही है की आप रामायण महाभारत के नाम पर अब कुछ भी कूड़ा नही परोस सकते, कलाकार के चयन से लेकर परिधान तक आप को बारीकी से ध्यान रखना होगा।

यदि आप कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र है तो देश का हिंदू भी अपने आराध्य के अपमान के लिए कुछ भी करने को स्वतंत्र है।

क्या हैं बुधादित्य योग? बुध चंद्रमा का पुत्र कैसे हुआ ? साक्ष्य , एवं प्रभाव |
https://youtu.be/Y82Bpqe0dcc

11/10/2022

सरदार भगत सिंह का नाम अमर शहीदों में सबसे प्रमुख रूप से लिया जाता है। भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को पंजाब के जिला लायलपुर में बंगा गांव (जो अभी पाकिस्तान में है) के एक देशभक्त सिख परिवार में हुआ था, जिसका अनुकूल प्रभाव उन पर पड़ा था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था।


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https://youtu.be/Y82Bpqe0dcc

यह एक सिख परिवार था जिसने आर्य समाज के विचार को अपना लिया था। उनके परिवार पर आर्य समाज व महर्षि दयानंद की विचारधारा का गहरा प्रभाव था। भगत सिंह के जन्म के समय उनके पिता 'सरदार किशन सिंह' एवं उनके दो चाचा 'अजीत सिंह' तथा 'स्वर्ण सिंह' अंग्रेजों के खिलाफ होने के कारण जेल में बंद थे।


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https://youtu.be/YVCzjCFKW4U

जिस दिन भगत सिंह पैदा हुए उनके पिता एवं चाचा को जेल से रिहा किया गया। इस शुभ घड़ी के अवसर पर भगत सिंह के घर में खुशी और भी बढ़ गई थी। भगत सिंह के जन्म के बाद उनकी दादी ने उनका नाम 'भागो वाला' रखा था। जिसका मतलब होता है 'अच्छे भाग्य वाला'। बाद में उन्हें 'भगत सिंह' कहा जाने लगा।


कौन थी देवी निकुम्भला?? साक्ष्य ,तंत्र प्रयोग विधि एवं प्रभाव l **ra
https://youtu.be/6lT4b_l9pj8

वह 14 वर्ष की आयु से ही पंजाब की क्रांतिकारी संस्थाओं में कार्य करने लगे थे। डी.ए.वी. स्कूल से उन्होंने नौवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1923 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद उन्हें विवाह बंधन में बांधने की तैयारियां होने लगी तो वह लाहौर से भागकर कानपुर आ गए। फिर देश की आजादी के संघर्ष में ऐसे रमें कि पूरा जीवन ही देश को समर्पित कर दिया।


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https://youtu.be/Wos5A7Jkh2U

भगत सिंह ने देश की आजादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुकाबला किया, वह युवकों के लिए हमेशा ही एक बहुत बड़ा आदर्श बना रहेगा। भगत सिंह को हिन्दी, उर्दू, पंजाबी तथा अंग्रेजी के अलावा बांग्ला भी आती थी जो उन्होंने बटुकेश्वर दत्त से सीखी थी। जेल के दिनों में उनके लिखे खतों व लेखों से उनके विचारों का अंदाजा लगता है। उन्होंने भारतीय समाज में भाषा, जाति और धर्म के कारण आई दूरियों पर दुख व्यक्त किया था।


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https://youtu.be/BFyqbtBUex0

उन्होंने समाज के कमजोर वर्ग पर किसी भारतीय के प्रहार को भी उसी सख्ती से सोचा जितना कि किसी अंग्रेज के द्वारा किए गए अत्याचार को। उनका विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उग्र हो जाएगी, लेकिन जब तक वह जिंदा रहेंगे ऐसा नहीं हो पाएगा। इसी कारण उन्होंने मौत की सजा सुनाने के बाद भी माफीनामा लिखने से साफ मना कर दिया था।
अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह की सोच पर इतना गहरा प्रभाव डाला कि लाहौर के नेशनल कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आजादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की।


धनतेरस और आवश्यक कृत्य:- क्या मंत्र पाठ और विग्रह पूजन ही आवश्यक है?
https://youtu.be/vkzivHjpeS0

काकोरी कांड में रामप्रसाद 'बिस्मिल' सहित 4 क्रांतिकारियों को फांसी व 16 अन्य को कारावास की सजा से भगत सिंह इतने ज्यादा बेचैन हुए कि चंद्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ गए और उसे एक नया नाम दिया 'हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन'। इस संगठन का उद्देश्य सेवा, त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था।


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https://youtu.be/xl2KqvbFiDI

इसके बाद भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज अधिकारी जेपी सांडर्स को मारा। इस कार्रवाई में क्रां‍तिकारी चंद्रशेखर आजाद ने भी उनकी पूरी सहायता की। इसके बाद भगत सिंह ने अपने क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर अलीपुर रोड़ दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेंट्रल असेंबली के सभागार में 8 अप्रैल 1929 को अंग्रेज सरकार को जगाने के लिए बम और पर्चे फेंके। बम फेंकने के बाद वहीं पर उन दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी।


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https://youtu.be/kE_r9GIcawI

इसके बाद 'लाहौर षडयंत्र' के इस मुकदमें में भगत सिंह को और उनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव को 23 मार्च, 1931 को एक साथ फांसी पर लटका दिया गया। यह माना जाता है कि मृत्यु दंड के लिए 24 मार्च की सुबह ही तय थी, लेकिन लोगों के भय से डरी सरकार ने 23-24 मार्च की मध्यरात्रि ही इन वीरों की जीवनलीला समाप्त कर दी और रात के अंधेरे में ही सतलज के किनारे उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया।


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https://youtu.be/D6tX-3SxriM

यह एक संयोग ही था कि जब उन्हें फांसी दी गई और उन्होंने संसार से विदा ली, उस वक्त उनकी उम्र 23 वर्ष 5 माह और 23 दिन थी और दिन भी था 23 मार्च। अपने फांसी से पहले भगत सिंह ने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा था, जिसमें कहा था कि उन्हें अंग्रेजी सरकार के खिलाफ भारतीयों के युद्ध का प्रतीक एक युद्धबंदी समझा जाए तथा फांसी देने के बजाए गोली से उड़ा दिया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।


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https://youtu.be/pviGH2joVQY

भगत सिंह की शहादत से न केवल अपने देश के स्वतंत्रता संघर्ष को गति मिली बल्कि नवयुवकों के लिए भी वह प्रेरणा स्रोत बन गए। वह देश के समस्त शहीदों के सिरमौर बन गए। भारत और पाकिस्तान की जनता उन्हें आजादी के दीवाने के रूप में देखती है जिसने अपनी जवानीसहित सारी जिंदगी देश के लिए समर्पित कर दी। उनके जीवन पर आधारित कई हिन्दी फिल्में भी बनी हैं जिनमें- द लीजेंड ऑफ भगत सिंह, शहीद, शहीद भगत सिंह आदि। आज भी सारा देश उनके बलिदान को बड़ी गंभीरता व सम्मान से याद करता है।❤️🙏❤️
HR 83 Kalayat ..

10/10/2022

आजीवन हिन्दू रहे गौतम बुद्ध..!

हमारे अनेक बुद्धिजीवी एक भ्रांति के शिकार हैं, जो समझते हैं कि गौतम बुद्ध के साथ भारत में कोई नया ‘धर्म’ आरंभ हुआ। तथा यह पूर्ववर्ती हिन्दू धर्म के विरुद्ध ‘विद्रोह’ था। यह पूरी तरह कपोल-कल्पना है कि बुद्ध ने जाति-भेदों को तोड़ डाला, और किसी समता-मूलक दर्शन या समाज की स्थापना की। कुछ वामपंथी लेखकों ने तो बुद्ध को मानो कार्ल मार्क्स का पूर्व-रूप जैसा दिखाने का यत्न किया है। मानो वर्ग-विहीन समाज बनाने का विचार बुद्ध से ही शुरू हुआ देखा जा सकता है, आदि।

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https://youtu.be/kE_r9GIcawI

लेकिन यदि गौतम बुद्ध के जीवन, विचार और कार्यों पर संपूर्ण दृष्टि डालें, तो उन के जीवन में एक भी प्रसंग नहीं कि उन्होंने वंश और जाति-व्यवहार की अवहेलना करने को कहा हो। उलटे, जब उन के मित्रों या अनुयायों के बीच दुविधा के प्रसंग आए, तो बुद्ध ने स्पष्ट रूप से पहले से चली आ रही रीतियों का सम्मान करने को कहा।

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एक बार जब गौतम बुद्ध के मित्र प्रसेनादी को पता चला कि उन की पत्नी पूरी शाक्य नहीं, बल्कि एक दासी से उत्पन्न शाक्य राजा की पुत्री है, तब उस ने उस का और उस से हुए अपने पुत्र का परित्याग कर दिया। किन्तु बुद्ध ने अपने मित्र को समझा कर उस का कदम वापस करवाया। तर्क यही दिया कि पंरपरा से संतान की जाति पिता से निर्धारित होती है, इसलिए शाक्य राजा की पुत्री शाक्य है। यदि बुद्ध को जाति-प्रथा से कोई विद्रोह करना होता, या नया मत चलाना होता, तो उपयुक्त होता कि वे सामाजिक, जातीय परंपराओं का तिरस्कार करने को कहते। बुद्ध ने ऐसा कुछ नहीं किया। कभी नहीं किया।

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https://youtu.be/Wos5A7Jkh2U

बुद्ध का यह व्यवहार सुसंगत था। तुलनात्मक धर्म के प्रसिद्ध ज्ञाता डॉ. कोएनराड एल्स्ट ने इस पर बड़ी मार्के की बात कही है कि जिसे संसार को आध्यात्मिक शिक्षा देनी हो, वह सामाजिक मामलों में कम से कम दखल देगा। कोई क्रांति करना, नया राजनीतिक-आर्थिक कार्यक्रम चलाना तो बड़ी दूर की बात रही! एल्स्ट के अनुसार, ‘यदि किसी आदमी के लिए अपनी ही मामूली कामनाएं संतुष्ट करना एक विकट काम होता है, तब किसी कल्पित समानतावादी समाज की अंतहीन इच्छाएं पूरी करने की ठानना कितना अंतहीन भटकाव होगा!’

क्या होता हैं अज्ञात भूत प्रेत बाधा?? प्रभाव एवं निवारण **ra #वीडियो
https://youtu.be/BFyqbtBUex0

अतः यदि बुद्ध को अपना आध्यात्मिक संदेश देना था, तो यह तर्कपूर्ण था कि वे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व्यवस्थाओं में कम-से-कम हस्तक्षेप करते। उन की चिन्ता कोई ‘ब्राह्मण-वाद के विरुद्ध विद्रोह’, राजनीतिक कार्यक्रम, आदि की थी ही नहीं, जो आज के मार्क्सवादी, नेहरूवादी या कुछ अंबेदकरवादी उन में देखते या भरते रहते हैं। इसीलिए स्वभावतः बुद्ध के चुने हुए शिष्यों में लगभग आधे लोग ब्राह्मण थे। उन्हीं के बीच से वे अधिकांश प्रखर दार्शनिक उभरे, जिन्होंने समय के साथ बौद्ध-दर्शन और ग्रंथों को महान-चिंतन और गहन तर्क-प्रणाली का पर्याय बना दिया।

धनतेरस और आवश्यक कृत्य:- क्या मंत्र पाठ और विग्रह पूजन ही आवश्यक है?
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यह भी एक तथ्य है कि भारत के महान विश्वविद्यालय बुद्ध से पहले की चीज हैं। तक्षशिला का प्रसिद्ध विश्वविद्यालय गौतम बुद्ध के पहले से था, जिस में बुद्ध के मित्र बंधुला और प्रसेनादी पढ़े थे। कुछ विद्वानों के अनुसार स्वयं सिद्धार्थ गौतम भी वहाँ पढ़े थे। अतः यह कहना उपयुक्त होगा कि बौद्धों ने उन्हीं संस्थाओं को और मजबूत किया जो उन्हें हिन्दू समाज द्वारा पहले से मिली थी। बाद में, बौद्ध विश्वविद्यालयों ने भी आर्यभट्ट जैसे अनेक गैर-बौद्ध वैज्ञानिकों को भी प्रशिक्षित किया। इसलिए, वस्तुतः चिंतन, शिक्षा और लोकाचार किसी में बुद्ध ने कोई ऐसी नई शुरुआत नहीं की थी जिसे पूर्ववर्ती ज्ञान, परंपरा या धर्म का प्रतिरोधी कहा जा सकता हो।

धनतेरस विशेष:- लक्ष्मी- कुबेर के अर्द्ध विग्रह की पूजा और त्वरित लाभ
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ध्यान दें, बुद्ध ने भविष्य में अपने जैसे किसी और ज्ञानी (‘मैत्रेय’, मित्रता-भाईचारा का पालक) के आगमन की भी भविष्यवाणी की थी, और यह भी कहा कि वह ब्राह्मण कुल में जन्म लेगा। यदि बुद्ध के लिए कुल, जाति और वंश महत्वहीन होते, तो वे ऐसा नहीं कह सकते थे। उन्होंने अपने मित्र प्रसेनादी को वही समझाया, जो सब से प्राचीन उपनिषद में सत्यकाम जाबालि के संबंध में तय किया गया था। कि यदि उस की माता दासी भी थी, तब भी परिस्थिति उस के पिता को ब्राह्मण कुल का ही कोई व्यक्ति दिखाती थी, अतः वह ब्राह्मण बालक था और इस प्रकार अपने गुरू द्वारा स्वीकार्य शिष्य हुआ। उसी पारंपरिक रीति का पालन करने की सलाह बुद्ध ने अपने मित्र को दी थी।

क्या है यक्ष भैरवी (स्वर्ण कर्षण भैरवी) साधना ? पद्धति एवं प्रभाव । **ra
https://youtu.be/kE_r9GIcawI

इसीलिए वास्तविक इतिहास यह है कि पूर्वी भारत में गंगा के मैदानों वाले बड़े शासकों, क्षत्रपों ने गौतम बुद्ध का सत्कार अपने बीच के विशिष्ट व्यक्ति के रूप में किया था। क्योंकि बुद्ध वही थे भी। उन्हीं शासकों ने बुद्ध के अनुयायियों, भिक्षुओं के लिए बड़े-बड़े मठ, विहार बनवाए।

शनि यदि पाप फल देता है तो गुरु भी उससे ज्यादा अशुभ है.
https://youtu.be/D6tX-3SxriM

जब बुद्ध का देहावसान हुआ, तब आठ नगरों के शासकों और बड़े लोगों ने उन की अस्थि-भस्मी पर सफल दावा किया थाः ‘हम क्षत्रिय हैं, बुद्ध क्षत्रिय थे, इसलिए उन के भस्म पर हमारा अधिकार है।’ बुद्ध के देहांत के लगभग आधी शती बाद तक बुद्ध के शिष्य सार्वजनिक रूप से अपने जातीय नियमों का पालन निस्संकोच करते मिलते हैं। यह सहज था, क्योंकि बुद्ध ने उन से अपने जातीय संबंध तोड़ने की बात कभी नहीं कही। जैसे, अपनी बेटियों को विवाह में किसी और जाति के व्यक्ति को देना, आदि।

दीपावली के इस विचित्र पर्व पर महाश्रीयंत्र की साधना और स्थापना
https://youtu.be/J4g6HmLS890

अतः ऐतिहासिक तथ्य यह है कि हिन्दू समाज से अलग कोई अ-हिन्दू बौद्ध समाज भारत में कभी नहीं रहा। अधिकांश हिन्दू विविध देवी-देवताओं की उपासना करते रहे हैं। उसी में कभी किसी को जोड़ते, हटाते भी रहे हैं। जैसे, आज किसी-किसी हिन्दू के घर में रामकृष्ण, श्रीअरविन्द या डॉ. अंबेदकर भी उसी पंक्ति में मिल जाएंगे जहाँ शिव-पार्वती या राम, दुर्गा, आदि विराजमान रहते हैं। गौतम बुद्ध, संत कबीर या गुरू नानक के उपासक उसी प्रकार के थे। वे अलग से कोई बौद्ध या सिख लोग नहीं थे।

सिद्ध भैरवी यंत्र मंत्र और तंत्र l #वीडियो **ra
https://youtu.be/pviGH2joVQY

पुराने बौद्ध विहारों, मठों, मंदिरों को भी देखें तो उन में वैदिक प्रतीकों और वास्तु-शास्त्र की बहुतायत मिलेगी। वे पुराने हिन्दू नमूनों का ही अनुकरण करते रहे हैं। बौद्ध मंत्रों में, भारत से बाहर भी, वैदिक मंत्रों की अनुकृति मिलती है। जब बुद्ध धर्म भारत से बाहर फैला, जैसे चीन, जापान, स्याम, आदि देशों में, तो यहाँ से वैदिक देवता भी बाहर गए। उदाहरण के लिए, जापान के हरेक नगर में देवी सरस्वती का मंदिर है। सरस्वती को वहाँ ले जाने वाले ‘धूर्त ब्राह्मण’ नहीं, बल्कि बौद्ध लोग थे!

श्रीयंत्र की महत्ता, अशुद्ध और शुद्ध की पहचान और विज्ञान! **ra
https://youtu.be/CaxNiVLh0xg

अपने जीवन के अंत में बुद्ध ने जीवन के सात सिद्धांतों का उल्लेख किया था, जिन का पालन करने पर कोई समाज नष्ट नहीं होता। प्रसिद्ध इतिहासकार सीताराम गोयल ने अपने सुंदर उपन्यास ‘सप्त-शील’ (1960) में उसी को वैशाली गणतंत्र की पृष्ठभूमि में अपना कथ्य बनाया है। इन सात सदगुणों में यह भी हैं – अपने पर्व-त्योहार का आदर करना एवं मनाना, तीर्थ व अनुष्ठान्न करना, साधु-संतों का सत्कार करना। हमारे अनेक त्योहार वैदिक मूल के हैं। बुद्ध से समय भी पर्व-त्योहार अपने से पहले के ही थे। महाभारत में भी नदी किनारे तीर्थ करने के विवरण मिलते हैं। सरस्वती और गंगा के तटों पर बलराम और पांडव तीर्थ करने गए थे। अतः जहाँ तक सामाजिक और धार्मिक व्यवहारों की बात है, बुद्ध ने कभी पुराने व्यवहारों के विरुद्ध कुछ नहीं कहा। यदि कुछ कहा, तो उन का आदर और पालन करने के लिए ही। इस प्रकार, कोई विद्रोही या क्रांतिकारी होने से ठीक उलट, गौतम बुद्ध पूरी तरह परंपरावादी थे। उन्होंने चालू राजनीतिक या सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने की सलाह दी थी। वे आजीवन एक हिन्दू दार्शनिक रहे। डॉ. एल्स्ट के शब्दों में, ‘बुद्ध अपने पोर-पोर में हिन्दू थे।’ लेकिन ठीक इसी बात को नकारने के लिए बुद्ध धर्म की भ्रांत व्याख्या की जाती रही है। इसे परखना चाहिए।

क्या वर्तमान मे प्रचलित नवग्रह पूजन विधान सही हैं? नवग्रह्पुजन विधान तथा शनि एवं राजा दशरथ का युद्ध|
https://youtu.be/EG20tVbtttc

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#बुध्द

09/10/2022

क्या है यक्ष भैरवी (स्वर्ण कर्षण भैरवी) साधना ? पद्धति एवं प्रभाव । **ra
https://youtu.be/kE_r9GIcawI

09/10/2022

पादरी के किये टोटके से गाड़ी की आयु बढ़ती है, माइलेज दुगना हो जाता है, एक्सीडेंट का खतरा नहीं रहता !! लेकिन पंडित पूजा करता है तो वो अंधविश्वास होता है !! 🤔😦🤔

क्या होता हैं अज्ञात भूत प्रेत बाधा?? प्रभाव एवं निवारण **ra #वीडियो
https://youtu.be/BFyqbtBUex0

श्रीयंत्र की महत्ता, अशुद्ध और शुद्ध की पहचान और विज्ञान!      **ra
06/10/2022

श्रीयंत्र की महत्ता, अशुद्ध और शुद्ध की पहचान और विज्ञान! **ra

श्रीयंत्र एक महान यंत्र है इसकी महिमा तंत्र प्रवर्तक भगवान शिव ने स्वयं गायी है जिसे तंत्रसार में देखा जाती सकता ह...

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