24/02/2025
यदि आप गरीब होने की आशंका से मुक्त होना चाहते हैं, तो आपको दृढ़, प्रबल उत्साह और उद्योगी होना ही पड़ेगा।
हमारे जीवन के नाटक में अभिमान की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। मनुष्य के अभिमान पर की गई चोट, शरीर की चोट से अधिक तकलीफ देती है। यदि हम अपने परिवार के लिए नहीं कमाएंगे तो लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे और क्या कहेंगे। जो मनुष्य कमा नहीं सकता है वह मानसिक दृष्टि से हीन है या कामचोर है। हम इस बात को सहन नहीं कर सकते कि कोई हमारे विषय में यह कहे कि हम अपने परिवार का सम्मानपूर्वक निर्वाह करने में असमर्थ हैं। मन पर इससे बड़ी और कोई चोट नहीं हो सकती है तब हमारा साहस टूटने लगता है।
मंदी के दिनों में जब व्यापार ठप्प हो जाता है तब इस प्रकार का भय बहुत से लोगों को सताया करता है। उस समय यह छूत की बीमारी की तरह फैलने लगता है। हमें सोचना चाहिए कि क्या भय का भाव हमारी कठिनाइयों को हल करने में कुछ सहायता कर सकता है? यदि नहीं, तो हम क्यों न उसे दुत्कार कर, कठोर परिश्रम कर अपने कार्य-साधन में लगे रहें। हम हाथ पैर ढीले छोड़कर बैठ जाएंगे तो, जो संकट न भी आता होगा, वह भी आ जाएगा। जिस समय हम अपने परिवार का पालन और निर्वाह अपने संगी-साथियों के समान स्तर पर नहीं कर पाते हैं, उस समय हमारे अभिमान पर गहरी चोट पड़ती है। विशेषकर परिवार की औरतों पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
एक माता, जिसका पुत्र अन्य लोगों के बच्चों की तरह कपड़े नहीं पहन सकता, बड़ा ही दुख मनाती है। जिस समय गृहिणी को यह लगता है कि वह इस तरह खर्च नहीं कर सकती या अपनी गृहस्थी के लिए अमुक सामान नहीं खरीद सकती, तो उसका हृदय अंदर ही अंदर कचोटता है। मुख्यतः तब, जब उसके संपर्क के लोगों की बहुत संख्या अपनी आय से अपने घर में उन वस्तुओं को लाने में समर्थ होती है। उस वक्त अपनी असमर्थता पर उसे नितांत ही दुख तथा लज्जा होती है। असंख्य लोगों के लिए दरिद्रता का रोग पुराना असाध्य से जाता है, उन्हें सदा गरीबी का डर सामने आकर परेशान करता है।
इस तरह की मानसिकता, संपन्नता और लक्ष्मी की शत्रु है। जिसकी ऐसी मनोदशा रहेगी, वह कभी धनी तथा चिन्तामुक्त नहीं हो सकता। एक व्यक्ति बड़ा ईमानदार, बहुत मेहनती है उसने जीवन को कामयाब बनाने का प्रयास किया। वह अनाथगृह में पला था यही बात लगातार उसकी प्रगति में बाधक रही। वह अपने इस डर से कभी भी मुक्त नहीं हो सका कि मैं चाहे कितना ही कठोर परिश्रम क्यों न करूं, जरूर ही कुछ न कुछ ऐसा होने वाला है कि मेरी समस्त संपत्ति चली जाएगी। कई साल हो गए हैं, उसके मन से यह तसव्वुर खत्म नहीं होता। लगता है जैसे बुढ़ापे में उसे पुनः गरी