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जब पानी बिकना शुरू हुआ...तब हमने मजाक समझा...आज हवा भी बिकनी शुरू हो गई है....!!बेहतर कल के लिए आज ही प्रयास करें🙏
23/04/2021

जब पानी बिकना शुरू हुआ...तब हमने मजाक समझा...
आज हवा भी बिकनी शुरू हो गई है....!!
बेहतर कल के लिए आज ही प्रयास करें🙏

वीर तुम अड़े रहो, रजाई में पड़े रहोचाय का मजा रहे, पकौड़ी से सजा रहेमुंह कभी रुके नहीं, रजाई कभी उठे नहींवीर तुम अड़े रह...
18/12/2020

वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो
चाय का मजा रहे,
पकौड़ी से सजा रहे
मुंह कभी रुके नहीं,
रजाई कभी उठे नहीं
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो
मां की लताड़ हो
बाप की दहाड़ हो
तुम निडर डटो वहीं,
रजाई से उठो नहीं
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो ||
मुंह गरजते रहे,
डंडे भी बरसते रहे
दीदी भी भड़क उठे,
चप्पल भी खड़क उठे
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो
प्रात हो कि रात हो,
संग कोई न साथ हो
रजाई में घुसे रहो,
तुम वही डटे रहो
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो
एक रजाई लिए हुए
एक प्रण किए हुए
अपने आराम के लिए,
सिर्फ आराम के लिए
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो
कमरा ठंड से भरा,
कान गालीयों से भरे
यत्न कर निकाल लो,
ये समय निकाल लो
ठंड है ये ठंड है,
यह बड़ी प्रचंड है
हवा भी चला रही,
धूप को डरा रही
वीर तुम अड़े रहो,
रजाई में पड़े रहो।।🙏

11/12/2020
23/11/2020

जब तक दवाई नहीं तब तक कोई ढिलाई नहीं
लगातार हाथ धोते रहिये कभी नौकरी से,कभी सैलरी से,कभी पेंशन से,कभी बिज़नेस से....!

Brajesh Kumar
15/10/2020

Brajesh Kumar

30/05/2020

चले बिहारी शहर छोड़कर।
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बहुत उड़ाई जिसने खिल्ली, रोएंगे अब मुंबई, दिल्ली।
जिनके बल उद्योग खड़े थे, हरियाणा, पंजाब हरे थे।
अन्न उगाए नहर खोदकर, चले बिहारी शहर छोड़कर।
भरपूर किए कर्मी का शोषण, कैसे मिलता तन को पोषण।
लाभांश मांग पर उन्हें चेताया, कुछ कर्मी को छांट दिखाया।
दिखा रहे थे अकड़, बोलकर । चले बिहारी शहर छोड़कर।
इनकी गर मजबूरी थी, तो तेरी भी मजबूरी थी।
दोनों की ही आवश्यकता, दोनों से होती पूरी थी।
पर रख न पाए इन्हें रोककर, चले बिहारी शहर छोड़कर ।
लेकिन केवल इनको ही, मजबूर समझते आए थे।
वेतन कम निर्धारित कर, तुम इनका हिस्सा खाए थे।
सुनो, सुनो श्रुतिपटल खोलकर, चले बिहारी शहर छोड़कर।
सर पर चढ़कर नाच किये थे। दस के बदले पांच दिये थे।
मूल्य माल का दस का सत्तर, खून चूसते बनकर मच्छर।
वे काम किये थे कमर तोड़कर, चले बिहारी शहर छोड़कर।
कोरोना ने उन्हें चेताया, मर जाओगे भूखे भाया।
जिनको तुम पर तरस न आई, दे पाएंगे क्या वो छाया।
घर भागो हे सबल, दौड़कर। चले बिहारी शहर छोड़कर।
जिस गर्मी में हंसा कांपे, उसमें हजार कोस वे नापे।
पैरों में पड़ ग‌ए फफोले, रोक न पाए ओले, शोले ।
निकल पड़े वे ताल ठोककर, चले बिहारी शहर छोड़कर ।
भूख,प्यास न उन्हें डिगाया, इच्छा शक्ति जोश दिलाया।
कोई रिक्शा, कोई ठेला, पर परिजन को ढो कर लाया ।
रोग प्रतिरोधक क्षमता के द्योतक, चले बिहारी शहर छोड़कर।

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