06/12/2020
6 #दिसम्बर 1956 की एक ऐसी सुबह जिसने हमारे उद्धारक, मुक्तिदाता, इस देश के इतिहास के नवनिर्माता, संविधान शिल्पी, महामानव, विश्वरत्न, परमपूज्य बोधिसत्व बाबासाहेब डॉ अंबेडकर को हम सभी से सदैव के लिए बहुत दूर कर दिया था। बोधिसत्व बाबासाहेब की अचानक मृत्यु से पूरा देश ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व स्तब्ध था।
🗣️ माननीय जगजीवन राम जी ने बोधिसत्व बाबासाहेब के महापरिनिर्वाण पर कहा कि " हमारा मुक्तिदाता चला गया।
🗣️ प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी ने बोधिसत्व बाबासाहेब जैसे महान विद्वान को श्रद्धांजलि देकर जब बाबासाहेब की लाईब्रेरी को देखा तब उनके मुंह से शब्द निकले 'धन्य धन्य इस पुरुषोत्तम की'।
जब बोधिसत्व बाबासाहेब डॉ अंबेडकर के पार्थिक शरीर को दिल्ली से मुंबई लाया गया तब तक बाबासाहेब की मृत्यु की खबर पूरे देश में फैल चुकी थी। उनके अंतिम दर्शन के लिए लोग मुंबई पहुंच गए थे।
🗣️ हार अर्पण करते हुए मिजरकर जोर जोर से रोते हुए बोले 'बाबासाहेब' दलितों का राज्य स्थापित करने से पूर्व ही निकल गए।
👥 दलित महिलाओं का दर्द तो पूछो ही मत! कई महिलाओं ने अपने बच्चों को बोधिसत्व बाबासाहेब के चरणों में डाल दिया, कुछ ने तो दीवार पर सर पटका, की महिलाएं तो मुर्छित अवस्था में चली गई।
👥 हिंदू कालोनी के लोगों ने कहा 'हमारी बस्ती का ज्ञानियों का राजा चला गया' ! हमारी कालोनी का भूषण चला गया' ऐसे उद्गार निकले।
#कैसा विचित्र सत्य है कि कुशीनगर में आकर भगवान सम्यक सम्बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ था। जबकि कुशीनगर से लौटकर बोधिसत्व बाबासाहेब डॉ अंबेडकर परिनिर्वाण को प्राप्त हुए।
डाँ अंबेडकर के शेष दिवस बुद्ध धम्म के प्रचार प्रसार में ही बीते।
🌷 #कैसा संयोग है कि भगवान तथागत बुद्ध ने अपने महापरिनिर्वाण के समय रोते बिलखते भंते आनंद को उपदेश दिया था कि मेरे बाद तुम्हारा शास्ता मेरे द्वारा उपदेशित धम्म ही होगा।
✍️ #उसी प्रकार बोधिसत्व बाबासाहेब डॉ अंबेडकर ने अपने परिनिर्वाण से पूर्व 'द बुद्धा एण्ड हिज धम्मा' ग्रंथ की भूमिका पूर्ण करके संकेत दिया कि उनके परिनिर्वाण के बाद बौद्धों को जीवन मार्ग दिखाने वाला उनके द्वारा लिखित ग्रंथ 'द बुद्धा एण्ड हिज धम्मा' ही होगा।
7 #दिसंबर 1956 को एक महामानव की ऐतिहासिक महायात्रा आरंभ हुई। उस शवयात्रा के साथ लगभग दस लाख लोग नम आंखों से बुद्ध धम्म के त्रिशरण का उच्चारण करते हुए चल रहे थे। भीड़ इतनी कि 3.5 किलोमीटर का रास्ता चार घंटे से भी अधिक समय में तय हो पाया था। मुंबई शहर की यह अब तक की सबसे बड़ी शवयात्रा थी।
मुंबई में बोधिसत्व बाबासाहेब के अंतिम दर्शनों के लिए उमड़ी भीड़ का कोई ठिकाना न था। इतनी भीड़ महाराष्ट्र के इतिहास में कभी भी किसी नेता के लिए नहीं जुटी थी।
#शव को चंदन की चिता पर रखा गया। वहीं पर दादासाहेब गायकवाड़ ने श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि डॉ अंबेडकर 16 दिसंबर 1956 को बंबई में अपने अनुयायियों के लिए सामूहिक दीक्षा समारोह करना चाहते थे। उन्होंने सुझाव दिया कि यहां पर उपस्थित लोगों में जो बुद्ध धम्म को ग्रहण करना चाहते हैं वे अपने नेता के पार्थिक शरीर की उपस्थिति में दीक्षा लेना चाहेंगे? तो वहां पर उपस्थित लोगों ने बड़ी संख्या में अपने हांथ ऊपर उठाकर स्वीकृति प्रदान की। भदंत आनंद कौसल्यायन ने वहां पर उपस्थित लोगों को धम्म दीक्षा दी।
#फिर माननीय पी. के. अत्रे ने अपने भाषण में कहा कि डॉ अंबेडकर जैसे मेघावी शक्ति के लोग विरले ही होते हैं। साथियों ! बोधिसत्व बाबासाहेब डॉ अंबेडकर बंबई 16 दिसंबर को हम सभी के बीच आने वाले थे परंतु हमारे बाबासाहेब एक हफ्ते पहले ही हमारे बीच आ गए हैं! वह भी इस अवस्था में। फिर क्या था लोगों के हृदय का बांध फूटा और लोग जोर जोर से रोने लगे।
आचार्य अत्रे ने कहा कि महापुरुषों का जीवन मत देखो ऐसा कहा जाता है। परंतु उनका मरना देखने के लिए किस्मत लगती है। भारत को महापुरुषों की कमी कभी नहीं पड़ी। परंतु ऐसा युगपुरुष सदियों में नहीं होगा। झंझावात को पीछे धकेलने वाला, महासागर की लहर के समान उनका स्वभाव था। जीवन भर उन्होंने संघर्ष किया। अंबेडकर अर्थात संघर्ष ऐसा महान, शूरवीर पुरुष आज मृत्यु की चिरनिंद्रा की गोद में हमेशा के लिए विश्राम ले रहा है। उनका वर्णन करने के लिए शब्द नहीं हैं।
#ऐसे महामानव विश्वरत्न परमपूज्य बोधिसत्व बाबासाहेब को पुष्प अर्पित करते हुए कोटि कोटि नमन 🙏🙏🙏
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#जय भीम नमो बुद्धाय जय भारत
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