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10/05/2026

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01/05/2026

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क्यों पूजी जाती है छठी मैया बच्चों के जन्मदिन के छठे दिन जाने इस कथा के अनुसार...हिंदू परंपरा में देवी षष्ठी को बच्चों क...
22/04/2026

क्यों पूजी जाती है छठी मैया बच्चों के जन्मदिन के छठे दिन जाने इस कथा के अनुसार...
हिंदू परंपरा में देवी षष्ठी को बच्चों की रक्षक देवी माना जाता है और बिल्ली को उनका वाहन कहा जाता है। देवी षष्ठी की पूजा विशेष रूप से नवजात बच्चों की रक्षा और उनके सुख-समृद्ध जीवन के लिए की जाती है।
पुराणों के अनुसार देवी षष्ठी प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न देवी हैं, इसलिए उनका नाम “षष्ठी” पड़ा।
कुछ ग्रंथों में उन्हें
**कार्तिकेय की पत्नी देवसेना का रूप भी माना गया है।
राजा प्रियव्रत की कथा
पुराणों में एक प्रसिद्ध कथा राजा प्रियव्रत से जुड़ी है।
राजा प्रियव्रत धर्मात्मा और प्रतापी राजा थे, लेकिन उन्हें संतान नहीं थी। बहुत समय बाद उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कराया। यज्ञ के प्रभाव से उनकी पत्नी को पुत्र हुआ, लेकिन दुर्भाग्य से बच्चा जन्म लेते ही मृत हो गया।
राजा अपने मृत पुत्र को गोद में लेकर श्मशान पहुँचे और अत्यंत दुखी होकर विलाप करने लगे। तभी आकाश से एक दिव्य रथ उतरा और उसमें से देवी षष्ठी प्रकट हुईं।
देवी ने कहा:
“मैं बच्चों की रक्षक देवी हूँ। जो मेरी पूजा करता है उसे संतान सुख और बालकों की रक्षा का आशीर्वाद मिलता है।”
राजा ने देवी की स्तुति की और उनसे कृपा माँगी। देवी प्रसन्न हुईं और उस मृत बालक को पुनः जीवित कर दिया।
इसके बाद देवी ने कहा कि हर महीने की षष्ठी तिथि पर और बच्चे के जन्म के छठे दिन उनकी पूजा करनी चाहिए। तभी से छठी की पूजा की परंपरा प्रारंभ हुई।

इसी मान्यता के कारण हिंदू परंपरा में यह विश्वास है कि
बच्चे के जन्म के छठे दिन (छठी) देवी षष्ठी आती हैं
वे बच्चे के भाग्य का लेखन करती हैं
उस दिन माता विशेष व्रत और पूजा करती है
कई स्थानों पर बिल्ली को भी देवी का वाहन मानकर सम्मान दिया जाता है

देवी षष्ठी बच्चों की रक्षा और उनके कल्याण की देवी मानी जाती हैं। उनकी पूजा से संतान की रक्षा, स्वास्थ्य और दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है।
# छठी मैया की कथा # #

तुलसी🌿 और श्री गणेश की यह कथा बहुत ही रोचक है, जो हमें सिखाती है कि कभी-कभी 'क्रोध' और 'श्राप' भी भविष्य में किसी बड़े क...
21/04/2026

तुलसी🌿 और श्री गणेश की यह कथा बहुत ही रोचक है, जो हमें सिखाती है कि कभी-कभी 'क्रोध' और 'श्राप' भी भविष्य में किसी बड़े कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार देवी तुलसी (जो उस समय एक युवा कन्या के रूप में थीं) गंगा के तट पर टहल रही थीं। वहाँ उन्होंने देखा कि युवा श्री गणेश अत्यंत शांत मुद्रा में ध्यानमग्न बैठे थे। गणेश जी का पीतांबर, चंदन का लेप और उनका दिव्य तेज देखकर तुलसी उन पर मोहित हो गईं।

तुलसी ने गणेश जी का ध्यान भंग किया और उनके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। श्री गणेश ने अत्यंत विनम्रता से कहा:
"हे देवी! मैं अखंड ब्रह्मचर्य का पालन कर रहा हूँ और मेरा ध्यान केवल तपस्या में है। मैं आपसे विवाह नहीं कर सकता।"

तुलसी को अपनी सुंदरता पर गर्व था और गणेश जी के इंकार को उन्होंने अपना अपमान समझा। आवेश में आकर उन्होंने गणेश जी को श्राप दिया
"तुमने मेरा प्रस्ताव ठुकराया है, इसलिए तुम्हारा विवाह तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध होगा।" (इसी कारण बाद में गणेश जी का विवाह रिद्धि और सिद्धि से हुआ)।
गणेश जी ने भी शांत रहते हुए उन्हें प्रति-श्राप दिया
"हे तुलसी! तुमने अपनी मर्यादा खोई है, इसलिए तुम्हारा विवाह एक असुर (शंखचूड़) से होगा।"

श्राप सुनते ही तुलसी का अहंकार टूट गया और वे रोने लगीं। उन्होंने गणेश जी से क्षमा मांगी। दयालु गणेश जी ने उन्हें सांत्वना दी और कहा
"नियति को बदला नहीं जा सकता, लेकिन तुम्हारा यह असुर विवाह तुम्हें अमर बना देगा। तुम बाद में भगवान विष्णु की सबसे प्रिय बनोगी और 'तुलसी' के रूप में तुम्हें जगत की सबसे पवित्र वनस्पति माना जाएगा। तुम्हारे बिना विष्णु की पूजा अधूरी रहेगी।"

इस घटना के कारण ही आज भी गणेश जी की पूजा में एक बहुत ही कड़ा नियम पालन किया जाता है
गणेश जी की पूजा में लगभग हर फूल और पत्ती (खासकर दूर्वा) चढ़ाई जाती है, लेकिन तुलसी का पत्ता कभी नहीं चढ़ाया जाता। माना जाता है कि उस पुराने श्राप के कारण गणेश जी को तुलसी अप्रिय है।
पूरे साल में केवल एक दिन, गणेश चतुर्थी (भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी) के दिन गणेश जी को तुलसी चढ़ाई जा सकती है।
यह कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम में जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए। तुलसी का मोह और क्रोध उन्हें असुर विवाह तक ले गया, लेकिन उनके पश्चाताप ने उन्हें साक्षात "विष्णुप्रिया" बना दिया।
#तुलसीकथा #गणेश #🙏🏻🌺जय गणेश जी की 🙏🏻🙏🏻🙏🏻

20/04/2026

यें उपाय जरूर करें #कथा #सुविचार #अनमोल

19/04/2026

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