24/04/2022
#अशोक_स्तंभ_का_असली_इतिहास_एवं_ब्राह्मणी_षडयंत्र_का_पर्दाफाश..!
"भारत देश में मंदिर यह लोगों के भावनाओं के साथ जुड़ा हुआ तथा उनके आस्था का विषय हैं । किसी भी मंदिर की महिमा नहीं होती , महिमा तो स्तंभों की होती हैं , क्योंकि स्तंभों पर ही पुरा मंदिर खड़ा होता हैं । चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने बड़े-बड़े बौद्ध स्तूप बनवाएं , शिलालेख बनावाएं , संघाराम बनवाएं , बौद्ध गुफाएं एवं बौद्ध विहार बनवाएं किंतु आज की समय में इन सबका विकृत स्वरूप ही देखने मिलता हैं , बौद्ध स्तूप और स्तंभों को तोड़कर ही ब्राह्मण लोगों ने उसे शिवलिंग में तब्दील किया / बौद्ध गुफाओं को पांडव लेणी में तथा बौद्ध विहारों को मंदिरों में तब्दील किया , आज की समय में जितने भी मंदिरों के स्तंभ हैं , वह सभी बौद्ध काल के ही हैं , उनकी बनावट चक्रवर्ती सम्राट अशोक के काल और अन्य बौद्ध राजाओं के काल से मिलती हैं , भारत में चाहें मंदिर हो / चाहे देवालय हो , उन सभी स्तंभों को प्राचीन काल से अशोक स्तंभ (Ashoka pillar) कहने की प्रथा थी , किंतु ब्राह्मणी इतिहासकारों ने चक्रवर्ती सम्राट अशोक का नाम गायब किया , और स्तंभों को रहने दिया , इतना ही नहीं , बल्कि चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने जो बौद्ध धम्म चक्र बनवाएं थे , उसे भी सिर्फ अशोकचक्र कहने की ही प्रथा थी / आज भी लोग बड़े गर्व के साथ उसे अशोकचक्र ही कहते हैं , किंतु उस चक्र को भी काउंटर करने के लिए ब्राह्मण लोगों ने सुदर्शन चक्र की एक काल्पनिक (पौराणिक) कथा बनाईं , और लोगों पर वह थोप दी..! उसके बावजूद भी आज अशोकचक्र यह चक्र के साथ बिल्कुल वैसा ही हैं , किंतु स्तंभों के साथ ऐसा हुआ नहीं , स्तंभो के साथ जो अशोक हुआ करता था , वह आज नहीं हैं , वह ब्राह्मण लोगों ने बड़ी चालाकी एवं धोखे से गायब कर दिया ।
वर्तमान में जितने भी बौद्ध वास्तु एवं धरोहर हैं , उन सबका निर्माण स्तंभों का आधार लेकर ही किया था , यदि किसी प्रकार की इमारत खड़ी करनी हो , तो उसकी नींव मजबूत होनी चाहिए , क्योंकि एक अच्छी और मजबूत नींव ही इमारत को सदियों तक खड़ा रख सकती हैं , यह बात बौद्ध कारीगर अच्छी तरह से जानते थे , इसलिए उन्होंने स्तंभ इतने मजबूत बनाएं थे कि , आज हजारों सालों के बाद भी उनकी रचनाएं बिल्कुल वैसे ही हैं , जैसे उन्होंने बनाईं थीं , किंतु पुष्यमित्र शुंग के बाद ही बौद्ध विरासत एवं धरोहर को नष्ट किया गया , स्तंभों को बुरी तरह से तहस-नहस कर दिया , उपर का विहार गायब किया , जो स्तंभ टूटे थे , उन पर शिवलिंग को स्थापित किया , और जो टूटे नहीं थे , उसके ऊपरी हिस्से पर मंदिर को स्थापित किया , उसे मंदिर का रूप दे दिया , सदियों से लेकर अब तक ब्राह्मण लोगों ने बौद्ध विहारों को एवं अशोक स्तंभों को अलग-अलग तरीके से पेश किया हैं , यह सिलसिला अब भी जारी हैं ।
महाराष्ट्र में संतों का आंदोलन बहुत ही बड़ा और प्रचलित आंदोलन हुआ करता था , क्योंकि संतों ने अपने पुरखों की विरासत को आगे बढ़ाया था , उसे बचाके रखा था , संतों ने ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद पर खुलकर प्रहार किया था । पंढरपुर का पांडुरंग यह बुद्ध ही हैं , यह ख़ोज भी सबसे पहले संतों ने ही की थीं , की हैं , समाज प्रबोधन के लिए संतों ने प्रवचन दिया , अभंग और गाथाओं का निर्माण किया , किंतु आज की तारीख में संतों के जो अभंग (गाथा) हैं , उनका स्वरूप भी ब्राह्मण लोगों ने बदल दिया है , उदाहरण के तौर पर बताना चाहता हूं कि , महाराष्ट्र में संत बहिणाबाई पाठक (कुलकर्णी) नाम की एक संत होकर गईं , उनका मराठी में एक प्रसिद्ध अभंग हैं , वह पुरा अभंग विस्तार से इस प्रकार हैं , संत बहिणा बाई कहती हैं कि , "संत कृपा झाली , इमारत फळा आली , ज्ञानदेवे रचिला पाया , उभारिले देवालया । नामा तयाचा किन्कर , तेणे विस्तरिले आवार । जनी जनार्दन एकनाथ , स्तम्भ (स्तंभ) दिला भागवत । तुका झालासे कळस , भजन करा सावकाश । बहिणा फडकती ध्वजा , तेणे रूप केले ओजा" । यह अभंग दिखने में भक्ति तथा वारकरी संप्रदाय की नींव किसने रखी ? इस पर दिखाई देता हैं , किंतु ऐसा नहीं हैं , संत बहिणाबाई यह ब्राह्मण वर्ण की थी , उन्होंने उस समय किस प्रकार का अभंग लिखा था ? उस पर सिर्फ इतिहासकार एवं अध्यात्मिक लोग ही प्रकाश डाल सकतें हैं , हो सकता हैं कि , उनके बाद ब्राह्मण लोगों ने इसे तोड़-मरोड़ कर पेश किया हो , संतों के बारे में कहां जायें तो सबसे पहले संत नामदेव महाराज ने ब्राह्मण लोगों के विरोध में तथा उनके पाखंड के खिलाफ आवाज उठाई थीं , इसलिए नामदेव रचिला पाया , तुका झालासे कळस..! ऐसा अभंग होना चाहिए था , किंतु ऐसा (अभंग) नहीं हैं , संत नामदेव महाराज से लेकर संत तुकाराम महाराज तक महाराष्ट्र के जितने भी मूलनिवासी-बहुजन संत हुए वह सभी क्रांतिकारी एवं विद्रोही संत थे , उन सभी संतों ने सबसे ज्यादा तथागत बुद्ध पर ही लिखा हैं , लेकिन उनका भी ब्राह्मणीकरण किया गया , जिसका उदाहरण ऊपरी अभंग हैं , इस अभंग का सिधा संबंध बौद्ध वास्तुओं से हैं , ज्ञानदेवे रचिला पाया , उभारिले देवालया । ज्ञानदेव महाराज यह ब्राह्मण थे , ब्राह्मण ने नींव रखीं ? और मंदिर का निर्माण किया ऐसा थोड़ी होता हैं , जनी जनार्दन एकनाथ , स्तम्भ (स्तंभ) दिला भागवत । एकनाथ महाराज भी ब्राह्मण थे , यहां पर जो पाया और जो स्तंभ (Pillar) यह शब्द आएं हैं , उन दोनों का अर्थ एक-समान हैं , इस अभंग में संतों ने जो उनके आंदोलन की नींव रखी थी , उन पर ब्राह्मण संतों का ही नियंत्रण (Control) दिखाया हैं , नियंत्रण रखनेवाले और और नियंत्रण दिखानेवाले दोनों भी ब्राह्मण..! यह सरासर ग़लत हैं , पाया और स्तंभ इन दोनों शब्दों का सिधा संबंध चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने बनाएं हुए बौद्ध स्तंभों से हैं , वर्तमान में जितने भी देवालय (मंदिर) दिखाई देते हैं , उनका निचला हिस्सा बौद्धों का और उपरी ढांचा पोंगा पंडितों का यह कैसी घुसपैठ हैं ? यह कैसा चमत्कार हैं ? यह किस प्रकार का अतिक्रमण हैं ? दरअसल यह चमत्कार नहीं था , बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी / साजिश हैं , आनेवाले समय में हम बुद्धिस्ट इंटरनैशनल नेटवर्क के माध्यम से इस अतिक्रमण के विरोध में अभियान चलायेंगे".
(भारत मुक्ति मोर्चा)
जय मूलनिवासी..