23/05/2026
जब एक उपनिषद का ऋषि घोषणा करता है: ‘अहं ब्रह्मास्मि’--मैं पूर्ण हूं, मैं ही परमात्मा हूं।
यह वचन जागृति की एक ऐसी अवस्था में उच्चारित होता है जहां कोई मूर्च्छा नहीं होती।
यही तो अर्थ है जब सूफी, ‘मंसूर’ घोषणा करता है, ‘अनल हक--मैं ही सत्य हूं।’
ये महान वचन बड़े महत्वपूर्ण हैं। ये बस इतना ही कहते हैं कि तुम उतने ही बड़े हो जितनी तुम्हारी चेतना--न जरा से अधिक, न जरा से कम:
यही कारण है कि नशीली दवाओं में इतना आकर्षण है, क्योंकि वे रासायनिक ढंग से तुम्हारी चेतना को उससे कुछ अधिक विशाल बना देती है, जितनी की यह होती है।
एल. एस. डी. या मारिजुआना या मेस्कालिन, ये चेतना का आकस्मिक विस्तार तुम्हें प्रदान करती है।
निश्चय ही यह जबरदस्ती और हिंसा है।
इसे नहीं किया जाना चाहिए।
और यह रासायनिक है--तुम्हारी आध्यात्मिकता से इसका कुछ लेना-देना नही है।
तुम इसके द्वारा विकसित नहीं होते, विकास तो स्वैच्छिक प्रयास से ही आता है।
विकास सस्ता नहीं है, कि एल.एस.डी. की छोटी सी मात्रा, एक बहुत छोटी सी मात्रा तुम्हें आध्यात्मिक विकास प्रदान कर सके।
एलडुअस हक्सले बिलकुल ही गलत था जब उसने यह सोचना शुरू कर दिया कि एल. एस. डी. से उसने वही अनुभव प्राप्त कर लिया है जो कबीर, या एकहार्ट, या बाशो को मिला--नहीं यह वह अनुभव नहीं है।
हां, कुछ समानता है इनमें, वह समानता केवल चेतना के विस्तर में हैं।
परंतु बड़ी असमानता भी है, यह एक जबरदस्ती की बात है; यह तुम्हारी जैविकता व तुम्हारी रसायनिकता के साथ हिंसा है।
और तुम वही बने रहते हो।
तुम इससे विकसित नहीं होते।
एक बार नशे का असर उतर जाए, तुम वही आदमी हो जाते हो, वहीं छोटा सुकड़ा आदमी।
कबीर फिर से वह कभी नही होंगे क्योंकि चेतना का वह विस्तार कोई थोपी हुई चीज न था--वह उसमे विकसित हुआ है।
अब कोई वापसी नहीं है, यह उनकी पूर्णता में समा गया है।
यह उनका होना हो गया है।
उन्होने इसे अपने में समा लिया है।
पर इसमें एक आकर्षण है, ये आकर्षण सदा से रहा है। आधुनिक पीढ़ी से इसका कुछ लेना देना नहीं है।
यह सदा रहा है, वेदों के समय से ही: मनुष्य ने सदा ही नशे की और अदम्य आकर्षण का अनुभव किया है।
यह एक झूठा सिक्का है, यह तुम्हें एक बड़े अस्वाभाविक ढंग से सच्चाई की एक झलक देता है, परंतु मनुष्य तो सदा से विस्तार खोजता रहा है।
मनुष्य विशाल बनना चाहता है।
कभी वह धन के द्वारा विशाल बनना चाहता है--हां, धन तुम्हें विस्तार की एक अनुभूति प्रदान करता है, यह भी एक नशा है। जब तुम्हारे पास काफी धन होता है, तुम अनुभव करते हो कि तुम्हारी सीमाएं तुम्हारे बहुत समीप नहीं हैं--वो तुमसे काफी दूर हैं।
तुम जितनी चाहो उतनी कारें रख सकते हो, तुम सीमित नहीं हो।
यदि अचानक तुम एक रॉल्स रॉयस रखना चाहो, तुम रख सकते हो--तुम स्वतंत्र अनुभव करते हो।
जब धन पास न हो, एक रॉलस रॉयस पास से गुजरती हो, इच्छा उठती है...परंतु सीमा।
तुम्हारा खीसा खाली है।
तुम्हारे पास कोई बैंक-बैलेंस भी नहीं।
तुम असाहाए महसूस करते हो--दीवाल सामने है; तुम इसके पार नहीं जा सकते।
कार वहां है, तुम कार देखते हो, तुम इसे अभी लेना चाहोगे--परंतु तुम्हारे और कार के बीच में एक दीवार है: गरीबी की दीवाल।
धन तुम्हें विस्तार की, स्वतंत्रता की एक अनुभूति प्रदान करता है। परंतु वह भी एक झूठी स्वतंत्रता है।
तुम बहुत सी चीजें उसके पास रख सकते हो, पर इससे तुम्हें विकसित होने में कोई सहायता नहीं मिलेगी।
तुम अधिक नही हो जाते--हां तुम्हारे पास अधिक होता है।
परंतु तुम्हारा होना तो उतना ही रहता है।
यही बात सत्ता के साथ भी है: यदि तुम किसी देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति हो, तुम शक्तिशाली अनुभव करते हो--फौज, पुलिस, कानुन--राज्य का सारा ताम-झाम तुम्हारे हाथ में होता है।
देश की सीमाएं तुम्हारी होती है।
उस समय तुम अपने आप को बड़ा शक्तिशाली अनुभव करते हो।
परंतु वह भी एक नशा है।
~ ओशो 🙏🪐🙏