09/05/2019
चुनावी भोंपू या राजनीति का सबसे बुरा दौर
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मसला सचमुच ताज़ा है। चुनावी लल्लोलुआब तक तो समझ मे आता है, लेकिन उफ्फ ये तरकारी और मछली बाज़ार से भी बदतर बदजुबानी। व्यतिगत आक्षेप, तुम-ताम, उसके ऊपर से जीवित व्यक्ति तो दूर, मरे लोगों को भी जबरदस्ती बीच दंगल में कुश्ती लड़वाना। आज के वर्तमान को कल का इतिहास बनना परम्परा है, आज जीवन तो कल मृत्यु निश्चित है। क्यों उस जिंदगी को भी बर्बाद किया जाए। आज हम तो कल मौका मिलते ही कोई और गड़े मुर्दे उखाड़ेगा। तो क्या हमारी आने वाली पीढ़ी सिर्फ भूतकाल में हुए अप्रासांगिक कृत्यों के आधार पर भविष्य तय करेगी? क्या यह सही परम्परा की शुरुआत है?
प्रजातन्त्र को मजाक मत बनाइये। नेतागण अपने ही व्यक्तित्व को दो पाटों के बीच बाँटते जा रहे हैं। बस वोट चाहिए। जनता को जमूरा बनाए रखिये, डुगडुगी बजाते रहिये तमाशा चलाते रहिये।
ऐसे प्रजातन्त्र से विदेशी राजतन्त्र अच्छा था। मुद्दा विहीन राजनीत, या यूं कहिए मुद्दों से भटकाने वाली राजनीति।
ऐसा नही है कोई दल इसमें पीछे है, सभी दल के प्रवक्ता तिल का ताड़ बनाने के शातिर खिलाड़ी हैं। मुह से निकली कोई बात, अर्थ का अनर्थ- और अर्थहीन परिभाषा बनाने में जुट जाते हैं।
बड़े बड़े मीडिया हाउस भी बड़ी बड़ी डिबेट में अपने व्यावसायिक हितों को साधने में कोई कसर नही छोड़ना चाहती। क्योंकि आज कोई भी निष्पक्ष तो रहा ही नहीं। बल्कि निष्पक्षता, शुचिता, नीति जैसे शब्द सर्फ डिक्शनरी की शोभा बढ़ाने के लिए ही रह गए हैं।
जनता भी बीन की धुन में जात-पात-धर्म- अधर्म पर मस्त नाच रही है। कोई लाल सलाम, कोई जय श्री राम कोई सिर्फ मैं ही महान। क्या हो गया है- न मर्यादा बची न कोई पुरुषोत्तम राम। हद की भी हद हो गयी है।
पावर जनता के हाथ मे कभी नहीं रहे, इसलिए EVM के बटन को दबाए जाने के पहले इन नेताओं द्वारा हम-आपके चेतना को पूरी तरह से दबा दिया जा रहा है कि भूल जाइए सबकुछ और देखिए जो सिर्फ दिखाया जा रहा है- शून्य-शून्य और शून्य।
हे भारत- हे भारती- कहां पहुंच गए हम।