22/05/2026
एक पौराणिक धूर्त " शचींद्र शर्मा ने " " आर्यसमाज का अ वैदिक विवाह " नाम एक काल्पनिक कहानी बनाई है उस कहानी के माध्यम से उस धूर्त ने स्वामी दयानंद जी के कालजयी ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश और संस्कार विधि पर अनर्गल आरोप लगा कर उपहास उड़ाया है । जो आप उसके फेसबुक पेज पर पढ़ सकते हो ।
पहली बात तो धूर्त शचींद्र शर्मा सुन यदि कहानी का पात्र बाबूलाल आर्य सच में कट्टर आर्य समाजी होता तो वो तेरे जैसे धूर्त पाखंडी पौराणिक से विवाह संस्कार ना करवाता । एक साधारण आर्य समाजी परिवार भी एक वैदिक पुरोहित या गुरुकुल के आचार्य से ही अपने यहाँ विवाह संस्कार करवाता है । बल्कि तुम्हारे अधिकतर पौराणिक घरों की लड़किया लड़के भी जब प्रेम विवाह करते है या पाखंड रहित करना होता है तो वो आर्य समाज के शरण में आते है तो ये भ्रम ही मत पालो की एक कट्टर आर्य समाजी तुम धूर्तो से अपना विवाह संस्कार करवायेगा ।
चलो मान लिया की शचींद्र के स्वप्न वश ऐसा हो गया है तो उसका उत्तर पढ़ लीजिए -जो जो आक्षेप उस धूर्त्त शचींद्र शर्मा ने लगाये है उन सभी आक्षेपों का जवाब कहानी के पात्र " बाबूलाल आर्य जी " बिल्कुल सटीकता और शास्त्र सम्मत देते है । दूसरी कहानी जल्दी ही पाठकों के माध्यम होगी जो उसी शालीन भाषा में होगी जैसी भाषा धूर्त शचींद्र ने प्रयोग की है । अब पहली कहानी का उत्तर पक्ष आपके समक्ष है --
कहानी बाबू लाल आर्य की बेटी के विवाह मंडप पर शुरू होती है जहाँ धूर्त शचींद्र शर्मा जो की एक पौराणिक विद्वान ब्राह्मण है और विवाह का आचार्य है वो आर्य समाज की विवाह पद्धति और संस्कार विधि के अनुसार विवाह करवाने के नाम पर कुछ उपहास जनक आक्षेप करता है बाबूलाल आर्य जी और अन्य रिश्तेदारों के सामने और विवाह के विषय से हटकर अन्यथा ही प्रश्न होने वाली वधू और उसकी माता से करता है और वधू की माता क्रोधित हो जाती है और बाबू लाल आर्य जी अपनी पत्नी पूछते है क्या हुआ ??
आपत्ति 1 - शचींद्र शर्मा – "मैंने अपनी तरफ से कुछ नहीं पूछा। संस्कार विधि में स्वामी दयानंद ने ही – 'जब कन्या रजस्वला होकर शुद्ध हो जाए, तो पाँचवे दिन से लेकर जिस दिन गर्भाधान (सुहागरात + संतान प्राप्ति हेतु संभोग) की रात्रि निश्चित की हो, उस रात्रि में विवाह करने का आदेश किया है' (संस्कार विधि पृष्ठ १०६)।सत्यार्थ प्रकाश में भी स्वामी जी ने स्पष्ट कहा है कि – 'जब मासिक धर्म के बाद कन्या चतुर्दिक स्नान करके शुद्ध हो जाए तो पाँचवे दिन से लेकर सोलहवें दिन तक, जब कन्या को संयोग (संभोग) की और पुत्र की इच्छा हो, तब रात्रि के एक घंटा बीतने पर विवाह संस्कार शुरू करना चाहिए।' अतः मैंने तो बस स्वामी जी द्वारा कही विधि की पूर्णता हेतु ही प्रश्न पूछा है कि – 'अब से पाँच दिन पूर्व उसके मासिक धर्म प्रारंभ होकर आज समाप्त हो गए हैं न?'
बाबूलाल आर्य जी समझ चुके थे ये शचींद्र शर्मा धूर्त आचार्य है ये नीचा दिखाने और उपहास के लिए ये सब प्रश्न पूछ रहा है ।
बाबूलाल आर्य जी का जवाब -
शचींद्र जी ! क्या ये परीक्षा करना आचार्य का काम है या माता पिता का ?
स्वामी दयानंद जी ने जो लिखा, वह एक 'आदर्श वैज्ञानिक व्यवस्था' थी, जो एक पूर्ण वैदिक और ब्रह्मचर्य-निष्ठ समाज में लागू होती है। आज समय बदला है, तो आर्य समाज ने देश के कानून (विवाह की कानूनी उम्र) और सामाजिक मर्यादा के तहत विवाह की तिथियां तय करना स्वीकार किया है, क्योंकि हम लकीर के फकीर नहीं हैं।
लेकिन जो मर्यादाहीन प्रश्न तुमने पूछा है, वह तुम्हारी धार्मिक जिज्ञासा नहीं, बल्कि तुम्हारी कामुक और ओछी मानसिकता को दिखाता है। दूसरों के संस्कारों पर कीचड़ उछालने से पहले अपने 'पाराशर स्मृति' के 8 वर्ष की बच्ची के विवाह वाले नियम को पढ़ लो।
क्या तुम अपनी 8 साल की बेटी का विवाह कर सकोगे ? तू मुझसे प्रश्न पूछता है? चल, अब तू अपने घर के 'पाराशर स्मृति' और 'मनुस्मृति' को खोल। तुम्हारे यहाँ तो शास्त्रों में लिखा है कि 'अष्टवर्षा भवेद् गौरी नववर्षा च रोहिणी...' अर्थात् 8 वर्ष की कन्या गौरी और 9 वर्ष की रोहिणी होती है, और यदि कन्या को रजस्वला (मासिक धर्म) आने से पहले पिता उसका विवाह न करे, तो पिता नरक में जाता है! (पाराशर स्मृति 7/6-8)।"
अब तू बता, क्या आज तेरा पौराणिक समाज अपनी 8 या 9 साल की अबोध बच्चियों का विवाह करवा रहा है? क्या तूने अपनी बेटी या बहन का विवाह 8 वर्ष में किया? यदि नहीं किया, तो तू स्वयं अपने पौराणिक शास्त्रों का उल्लंघन कर रहा है! तो फिर किस मुँह से तू आर्य समाज पर उँगली उठाता है?
शचीन्द्र शर्मा की आपत्ति नम्बर 2 -
– 'ये अब तक कुल 36 बार रजस्वला हो चुकी है या नहीं?' क्योंकि स्वामी जी ने कहा है कि – 'यदि प्रतिमास रजोदर्शन (मासिक धर्म) होता है तो तीन वर्षों में कुल 36 बार रजस्वला हुए पश्चात विवाह करना योग्य है, इससे पूर्व नहीं' (सत्यार्थ प्रकाश पृष्ठ ७४। अतः मैं तो स्वामी जी के किए विधान की ही परीक्षा कर रहा हूँ, मेरा क्या दोष?"
बाबूलाल आर्य जी का जवाब -
ऋषि दयानंद ने 36 बार रजस्वला होने की बात एक 'न्यूनतम सीमा' के तौर पर कही थी, न कि किसी विवाह की अनिवार्य शर्त के रूप में जिसे गिनना पड़े।
मूर्ख! यदि कोई कन्या 18 या 20 वर्ष की आयु में विवाह कर रही है, तो वह स्वाभाविक रूप से 36 से अधिक बार रजस्वला हो चुकी होगी। क्या वहां भी तू बैठकर गिनती गिनेगा? शास्त्रों में 'तीन वर्ष प्रतीक्षा' का अर्थ यह है कि बाल-विवाह का पूर्ण निषेध हो। तूने इस महान सुधारवादी और वैज्ञानिक नियम का उपहास उड़ाने के लिए इसे एक भौंडा मजाक बना दिया। महाभाष्यकार पतंजलि कहते हैं कि 'उद्देश्य' को देखो, शब्दों की खाल मत खींचो।"स्वामी दयानंद जी ने 36 बार मासिक धर्म की बात कहकर समाज से बाल-विवाह जैसी कुप्रथा को उखाड़ फेंका था और कन्याओं को 16 वर्ष की आयु तक पढ़ने और स्वस्थ होने का अधिकार दिया था।आर्य समाज लकीर का फकीर नहीं है। आज यदि लड़की की कानूनी उम्र 21 वर्ष होने जा रही है, तो आर्य समाज उसका स्वागत करता है, क्योंकि हमारा उद्देश्य स्त्री का सम्मान और उत्तम समाज का निर्माण है। दूसरों की वैज्ञानिक विधियों पर उंगली उठाने से अच्छा है कि अपने पौराणिक ग्रंथों में लिखी 8 साल की बच्ची की शादी वाली कुप्रथा पर शर्म करो।"
-- आप आयुर्वेद और मनुस्मृति को मानते हो ? शचींद्र जी जिस 'पाँचवें दिन' और 'संभोग की रात्रि' के विधान पर हँस रहे हैं, वह साक्षात मनुस्मृति की आज्ञा है:
ऋतुस्वाभाविकः स्त्रीणां रात्रयः षोडश स्मृताः। चतुर्भिरितरैः सार्धमहोभिः सद्विगर्हितैः॥"
(मनुस्मृति, अध्याय 3, श्लोक 45)
मनु जी स्पष्ट कहते हैं कि मासिक धर्म शुरू होने से 16 रात्रियाँ 'ऋतुकाल' (गर्भधारण के योग्य समय) होती हैं। इसमें से शुरुआती 4 रात्रियाँ निषिद्ध हैं। अतः 5वीं रात्रि से ही गर्भाधान का विधान शुरू होता है।
स्वामी दयानंद ने वही लिखा जो मनु महाराज ने लिखा है। यदि शचींद्र को इस पर आपत्ति है, तो वे पहले मनुस्मृति को 'अश्लील' घोषित करें।
चिकित्सा विज्ञान और पौराणिक परंपरा दोनों सुश्रुत को मानते हैं। सुश्रुत संहिता में विवाह और गर्भाधान के संबंध में लिखा है:
ततः शुद्धस्नातां चतुर्थेऽहन्यहतवासःसमलङ्कृतां
सुश्रुत संहिता, शारीरस्थान, अध्याय 2 सूत्र 26
यहाँ स्पष्ट आदेश है कि कन्या जब चौथे दिन स्नान करके शुद्ध हो जाए, तब पुरुष उसके साथ विवाह और गर्भाधान करे।
स्वामी जी ने 'संस्कार विधि' में आयुर्वेद के इसी वैज्ञानिक पक्ष को रखा है ताकि स्वस्थ संतान उत्पन्न हो। क्या शचींद्र जी महर्षि सुश्रुत का भी उपहास उड़ाएंगे?
पौराणिक धर्म का दूसरा मुख्य आधार याज्ञवल्क्य स्मृति है:
षोडशर्तुर्निशाः स्त्रीणां तासु युग्मासु संविशेत्।"
(याज्ञवल्क्य स्मृति, आचाराध्याय, श्लोक 79)
यहाँ भी 16 रात्रियों के 'ऋतुकाल' का समर्थन है और 'युग्मासु संविशेत्' (सम रात्रियों में संभोग) का आदेश है।
स्वामी दयानंद ने विवाह को प्रदर्शन नहीं, बल्कि 'संस्कार' माना है। विवाह का मुख्य फल 'संतान' है, और संतान के लिए सर्वोत्तम समय 'ऋतुकाल' है। स्वामी जी ने केवल इसी व्यवस्था को सुव्यवस्थित किया है।
शर्मा जी, आप 'संस्कार विधि' के पृष्ठ 106 पर हँस रहे थे कि रजस्वला के बाद विवाह और गर्भाधान क्यों लिखा? क्या आपने कभी मनुस्मृति (3.45) और याज्ञवल्क्य स्मृति (1.79) को खोलकर देखा है? वहां भी पाँचवीं रात्रि से ही गर्भाधान का आदेश है।"
शचींद्र शर्मा की आपत्ति 3-
आगे पंडित शचींद्र ने दुबारा संस्कार विधि का उपहास उड़ाते हुए कहा – "यह तो सीधे-सीधे स्वामी जी की बताई विधि में अतिक्रमण है। फिर तो आपने स्वामी जी द्वारा सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ समुल्लास में कहा गया – 'अपने मन चाहे वर से गुप्त व्यवहार लिखकर पूछ ले' – उस विधि का भी पालन न किया होगा? गुप्त-व्यवहार, अर्थात वर को शीघ्रपतन आदि का दोष तो नहीं है, और वर भी पूछ ले, कन्या कहीं अपना शील..."
बाबूलाल आर्य जी का जवाब -
बाबूलाल आर्य जी मुस्कुराए और बोले -
शचींद्र शर्मा ने 'सत्यार्थ प्रकाश' के जिस 'गुप्त व्यवहार' शब्द को अपनी गंदी सोच से जोड़कर उपहास उड़ाया है, वह दरअसल उनकी अपनी कुंठा को दर्शाता है। स्वामी दयानंद जी ने यहाँ ' (चिकित्सीय पारदर्शिता) की बात की है, ताकि विवाह के बाद किसी का जीवन बर्बाद न हो।
मनुस्मृति: दोष छिपाकर विवाह करना 'महापाप' है
शचींद्र जी जिस 'पूछताछ' को अश्लील कह रहे हैं, उसे छिपाने को मनु महाराज ने दंडनीय अपराध माना है:
यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्याय प्रयच्छति। तस्य कुर्यान्नृपो दण्डं स्वयं षण्णवतिं पणान् ॥"
(मनुस्मृति, अध्याय 9, श्लोक 73)
मनु जी कहते हैं कि यदि कन्या में कोई दोष (जैसे रोग या शील संबंधी दोष) हो और उसे बिना बताए विवाह कर दिया जाए, तो राजा को कन्या के पिता को भारी दंड देना चाहिए।जब मनु जी दोष बताने की आज्ञा देते हैं, तो वह दोष तभी पता चलेगा जब विवाह से पूर्व स्पष्ट बातचीत या 'व्यवहार' होगा। स्वामी दयानंद ने इसी को 'गुप्त व्यवहार' कहा है ताकि समाज में किसी की गोपनीयता भंग न हो और सत्य सामने आ जाए।
नारद स्मृति: पुरुष की 'पुरुषत्व परीक्षा' का अनिवार्य विधान
पौराणिक धर्म में नारद स्मृति का बड़ा स्थान है। वहां विवाह से पूर्व पुरुष की जाँच का स्पष्ट आदेश है:
परीक्ष्य पुरुषः पुंसत्त्वे निजैरेवाङ्गलक्षणैः।
(नारद स्मृति, स्त्रीपुरुष योग , श्लोक 8
नारद जी कहते हैं कि पुरुष के 'पुरुषत्व की अच्छी तरह परीक्षा कर लेनी चाहिए। यदि वह पुरुषत्व से युक्त हो, तभी विवाह करना चाहिए, अन्यथा नहीं।
शर्मा जी, आप स्वामी जी के 'गुप्त व्यवहार' शब्द पर हँस रहे हैं? क्या आप चाहेंगे कि आपकी बेटी का विवाह किसी ऐसे पुरुष से हो जाए जो नपुंसक हो या उसे कोई गुप्त असाध्य रोग हो? क्या आप अपनी बेटी का जीवन केवल इसलिए नरक बना देंगे क्योंकि 'सभ्य' समाज में ऐसी बातें पूछना मना है?"
शचींद्र: "वो... वो तो भाग्य की बात है, पर ऐसा पूछना लज्जाजनक है।"
बाबूलाल आर्य : "लज्जाजनक पूछना नहीं, बल्कि किसी निर्दोष का जीवन बर्बाद करना है। नारद स्मृति (श्लोक 8 पढ़िए, वहां पुरुष की परीक्षा का स्पष्ट आदेश है। स्वामी दयानंद ने तो इसे इतना 'सभ्य' बनाया कि वर-कन्या गुप्त रूप से लिखकर एक-दूसरे के स्वास्थ्य और शील की जानकारी ले लें, ताकि बाद में पछताना न पड़े। अश्लीलता आपके दिमाग में है शर्मा जी, स्वामी जी के शब्दों में तो 'सुरक्षा' और 'सच्चाई' है।"
और सुनिए, आपके ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्ण जन्मखण्ड, नितम्बकठिनां क्षामां पीनश्रोणिपयोधराम् ।
ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां सस्मितां च सनातनीम् ॥ ७८ ॥में रति के अंगों का जो वर्णन है, क्या वह अश्लील नहीं है? क्या आपकी बेटी के विवाह में पंडित जी उन कामुक श्लोकों को पढ़ते हैं? स्वामी जी ने तो केवल एक स्वस्थ गृहस्थ जीवन की नींव रखने की बात की है
बाबूलाल आर्य जी का जवाब सुन कर शचींद्र शर्मा का मुंह शर्म से झुक गया उनसे कोई जवाब ना बना । सब रिश्तेदार शचींद्र शर्मा को लज्जित होता देख कर मंद मंद मुस्कुराने लगे । क्योकि शचींद्र शर्मा का पाला पहली बार किसी कट्टर आर्य समाजी से पढ़ा था
शचींद्र शर्मा की आपत्ति नम्बर 4
शचींद्र शर्मा ने अपना अगला कुतर्क चलाया और बोले
– "ठीक है। स्वामी जी की इस बात को भी आप नहीं मानते तो जाने दीजिए। किंतु स्वामी जी जो कह गए हैं कि 'स्त्री की आयु से वर की आयु कम से कम डेढ़ गुणी और अधिक से अधिक दूनी होवे' (संस्कार विधि, पृष्ठ संख्या ९६) – आपके वर की आयु कन्या से डेढ़ गुणी से दो गुणी तक है न?"
बाबूलाल आर्य जी का जवाब -
बाबूलाल आर्य जी मुस्कुरा कर बोले -
शचींद्र शर्मा ने स्वामी दयानंद की 'संस्कार विधि' के जिस आयु संबंधी नियम का उपहास उड़ाया है, वह उनकी आयुर्वेद और शास्त्रों के प्रति अनभिज्ञता का सबसे बड़ा प्रमाण है। उन्होंने जिसे 'अजीब' बताया, वह वास्तव में महर्षि सुश्रुत और महर्षि मनु का स्थापित किया हुआ वैज्ञानिक सिद्धांत है।
मनुस्मृति: आयु का स्पष्ट विधान (मनु का आदेश)
शचींद्र जी जिस 'डेढ़ गुणी या दुगुनी' आयु पर हँस रहे हैं, वह साक्षात मनु महाराज की आज्ञा है। मनुस्मृति में स्पष्ट लिखा है:
त्रिंशद्वर्षो ..............अष्टवर्षां वा धर्मे सीदति सत्वरः॥"
(मनुस्मृति, अध्याय 9, श्लोक 94)
मनु जी कहते हैं कि 30 वर्ष के पुरुष को 12 वर्ष की कन्या से, या 24 वर्ष के पुरुष को 8 वर्ष की कन्या से विवाह करना चाहिए।
12 का ढाई गुना 30 होता है, और 8 का तीन गुना 24 होता है। स्वामी दयानंद ने तो इसे और भी वैज्ञानिक और आधुनिक बनाकर केवल 'डेढ़ से दुगुनी' (जैसे 16 की कन्या और 25-32 का वर) तक सीमित रखा।
यदि शचींद्र को स्वामी जी की आयु गणना गलत लगती है, तो वे पहले मनु महाराज को गलत सिद्ध करें, जिन्होंने तिगुनी आयु तक का विधान किया है।
सुश्रुत संहिता: संतानोत्पत्ति का विज्ञान
आयुर्वेद के महान ऋषि सुश्रुत ने स्पष्ट किया है कि स्त्री और पुरुष के पूर्ण शारीरिक और मानसिक विकास की आयु में अंतर होता है:
पञ्चविंशे ततो वर्षे पुरुषः पञ्चविंशके। ऋतूमतीं षोडशवर्षीयां भार्यां विन्देत मानवः॥"
(सुश्रुत संहिता, सूत्रस्थान) महर्षि सुश्रुत के अनुसार 25 वर्ष के पुरुष का विवाह 16 वर्ष की कन्या से होना चाहिए। यहाँ भी आयु का अंतर लगभग 1.5 गुना (डेढ़ गुना) ही बैठता है। पुरुष में पूर्ण वीर्य की परिपक्वता 25 वर्ष में और स्त्री में प्रजनन अंगों की पूर्णता 16 वर्ष में मानी गई है। स्वामी दयानंद ने इसी 'वैद्यक शास्त्र' के नियम को समाज के कल्याण के लिए 'संस्कार विधि' में रखा।
शर्मा जी, आप स्वामी जी द्वारा बताई गई आयु (डेढ़ से दुगुनी) पर हँस रहे हैं? क्या आपने कभी अपने सबसे पूजनीय मनु महाराज (9.94) को पढ़ा है? उन्होंने तो 8 साल की लड़की के लिए 24 साल का वर और 12 साल की लड़की के लिए 30 साल का वर बताया है। यह तो ढाई से तीन गुना अंतर हुआ!"
शचींद्र: "वो... वो तो सतयुग की बातें हैं, आज के समय में यह संभव नहीं।"
बाबूलाल आर्य जी : "शर्मा जी, स्वामी दयानंद ने सतयुग की अंधपरंपरा नहीं, बल्कि सुश्रुत संहिता का विज्ञान अपनाया। आज का चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि पुरुषों की तुलना में स्त्रियों का शारीरिक विकास जल्दी होता है। यदि आयु बराबर होगी, तो स्त्री जल्दी वृद्ध दिखने लगेगी और पुरुष युवा रहेगा, जिससे गृहस्थ जीवन में असंतुलन पैदा होगा।"
अश्लीलता और मजाक तो आपके यहाँ है, जहाँ 50 साल का बूढ़ा 'दहेज' के लालच में 10 साल की बच्ची से ब्याह कर लेता था। स्वामी जी ने तो 'ब्रह्मचर्य' की मर्यादा रखी कि पुरुष कम से कम 25 वर्ष तक ब्रह्मचारी रहे और कन्या 16 वर्ष तक। उन्होंने समाज को 'नपुंसक' होने से बचाया है। अब बताइए, सुश्रुत और मनु का उपहास उड़ाकर आप खुद को कैसा पौराणिक कह रहे हैं?"शर्मा जी, स्वामी जी की गणित साक्षात ऋषियों की गणित है। यदि आपको डेढ़ गुना ज्यादा लगता है, तो आप मनु जी के 'तिगुने' विधान का क्या करेंगे?"
फिर से शचींद्र शर्मा शर्मिंदा हो गए । क्योकि इससे पहले उनका कभी किसी कट्टर आर्य समाजी से पाला नहीं पढ़ा था । वो सोच कर आए थे की आर्य समजियों के विवाह में विघ्न डालूँगा और उनके स्वामी दयानंद का उपहास उड़ाऊगा लेकिन यहाँ पासा उल्टा पढ़ गया । शर्मा जी मन ही मन उस घड़ी और अपने गुरु को कोसने लगे जिसने उनको आर्य समाजियों के यहाँ विवाह संस्कार करने भेजा था ।
शचींद्र शर्मा की आपत्ति नम्बर 5
शचींद्र पंडित जी उपहास उड़ाने के लिए अगली चाल चली और बोले – कन्या का सिर, पुरुष के कंधे तक आता है या नहीं?" क्योंकि तुम्हारे स्वामी जी ने कहा है – 'वर के शरीर से स्त्री का शरीर पतला और पुरुष के कंधे के समान स्त्री का सिर होना चाहिए' (स.वि. पृ. १०५ )। किंतु देखने में आ रहा है, आपने यहाँ भी संस्कार विधि से विरोध किया। आपकी कन्या की लंबाई वर के समान है, और कन्या वर से अधिक मोटी भी है। फिर तो यह बड़ी भारी वैदिक हानि हो गई।"
बाबूलाल आर्य जी का जवाब -
बाबूलाल आर्य जी बोले – पौराणिक समाज ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर को बहुत मानता है। उन्होंने वृहत्संहिता (कन्यालक्षण अध्याय 70) में स्पष्ट किया है:
कनिष्ठिका वा तदनन्तरा वा महीं न यस्याः स्पृशती स्त्रियाः स्यात् ।
गताथवाङ्गुष्ठमतीत्य यस्याः प्रदेशिनी सा कुलटातिपापा ॥ १६ ॥
भाषा— जिस स्त्री के पैर की कनिष्ठा अथवा कनिष्ठा के समीप की अंगुली अनामिका भूमि को स्पर्श न करे या जिसके पैर की तर्जनी अंगूठे से अधिक लम्बी हो वह स्त्री व्यभिचारिणी और पापिनी होती है ॥ १६ ॥
१८. श्लोक:
ह्रस्वयातिनिःस्वता दीर्घया कुलक्षयः ।
ग्रीवया पृथुस्थया योषितः प्रचण्डता ॥ १८ ॥
भाषा— जिस स्त्री की गर्दन छोटी हो वह निर्धन होती है, बहुत लम्बी गर्दन वाली से कुलक्षय होता है, जिसकी ग्रीवा मोटी हो वह स्त्री क्रूर स्वभाव वाली होती है ॥ १८ ॥
यहाँ कन्या के शरीर की बनावट, ऊँचाई और अंगों के अनुपात के आधार पर उसके शुभ-अशुभ होने का निर्णय लिया गया है।
यदि वराहमिहिर अंगों का नाप-जोख करें तो वह 'शास्त्र' है, और यदि स्वामी दयानंद ने स्वस्थ संतान के लिए वर-वधू के कद का संतुलन बता दिया, तो वह आपत्तिजनक कैसे हो गया ?
गरुड़ पुराण (आचार खण्ड, अध्याय 65, श्लोक 6-10)
पुराणों के अनुसार वर का वक्षस्थल विशाल और शरीर सुगठित होना चाहिए। शास्त्रों में स्पष्ट है कि वधू का शरीर वर से अधिक भारी या ऊँचा होना 'विषम' जोड़ी माना जाता है।
शर्मा जी, आप शरीर की बनावट और लंबाई के अनुपात पर हँस रहे हैं? क्या आपने कभी भविष्य पुराण या वृहत्संहिता को पढ़ा है? वहां तो स्त्री की उंगलियों की लंबाई से लेकर उसके चलने की गति तक के नियम लिखे हैं। क्या वे सब 'वैदिक हानि' हैं?"
शचींद्र: "वो... वो तो सामुद्रिक शास्त्र है, उसका संस्कार विधि से क्या लेना-देना?"
बाबूलाल जी : "शर्मा जी, संस्कार विधि कोई कोरी कल्पना नहीं, बल्कि 'जीवन विज्ञान' है। स्वामी दयानंद ने केवल यह सुनिश्चित किया कि जोड़ी 'विषम' न हो।
अश्लीलता और मजाक तो आपके यहाँ है, जहाँ कुंडली के 36 गुण तो मिलाए जाते हैं, लेकिन वर-वधू के स्वास्थ्य और शारीरिक क्षमता को नजरअंदाज कर दिया जाता है। स्वामी जी ने धर्म को 'स्वस्थ काया' से जोड़ा है। अब बताइए, ऋषियों के विज्ञान का मजाक उड़ाकर आप खुद को पौराणिक विद्वान कैसे कह सकते हैं?"
यहाँ फिर से शचींद्र निरुत्तर हो गए और बेचारा सा मुंह बना कर मंडप में बैठे रहे । सभी रिश्तेदार ये सब चर्चा सुन कर आनंदित हो रहे थे वो एक पौराणिक पंडित के अहंकार को चकनाचूर होते देख रहे थे ।
शचींद्र शर्मा की आपत्ति नम्बर 6
पंडित शचींद्र शर्मा बोले – "आप तो संस्कार विधि से पूर्ण आर्यसमाजी विवाह कराना चाहते थे, किंतु सब विषयों में विधि-व्यतिक्रम कर रहे हैं। चलिए, यह बताइए – आपकी कन्या ने दूसरे कमरे में गर्भाधान (संतान हेतु संभोग – सुहागरात) की सामग्री, और गर्भाधान के बाद किए जाने वाले स्नान और उसके बाद सोंठ, असगंध, कस्तूरी, जायफल, जावित्री और सालम मिश्री का मर्दाना जोश बढ़ाने वाला नुस्खा डालकर दूध तैयार रखा है न? क्योंकि आधी रात तक विवाह पूर्ण होते ही, इन्हें तुरंत सबके सामने से ही गर्भाधान का कर्म करने जाना है।
बाबूलाल आर्य जी का जवाब -
बाबूलाल जी बोले - स्वामी जी द्वारा रचित 'संस्कार विधि' पुस्तक के 'गर्भाधान संस्कार' प्रकरण को अगर कोई पढ़े, तो उसमें उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि मासिक धर्म के बाद किस-किस दिन गर्भाधान करना चाहिए। वहां कहीं नहीं लिखा कि विवाह वाली रात को यह जबरन करना ही है।
सत्यार्थ प्रकाश (चौथे समुल्लास) में स्वामी जी ने जिस परिस्थिति का वर्णन किया है, वह "पूर्ण युवावस्था में होने वाले विवाह" के संदर्भ में है। यदि कन्या पूर्ण रूप से रजस्वला (Mature) हो चुकी है, उसका ब्रह्मचर्य आश्रम पूरा हो चुका है, और विवाह के समय ही उसका 'ऋतुकाल' चल रहा है, केवल उसी विशेष स्थिति में स्वामी जी ने विवाह के दिन ही गर्भाधान की बात कही है। यदि विवाह के दिन स्त्री का ऋतुकाल नहीं है, तो उस दिन गर्भाधान का प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि स्वामी जी आयुर्वेद के नियमों के विरुद्ध कभी नहीं जा सकते थे। दूसरी बात की
शचींद्र शर्मा ने स्वामी दयानंद की 'संस्कार विधि' के जिस 'गर्भाधान' (सुहागरात) वाले प्रसंग का उपहास उड़ाया है, वह उनकी सबसे बड़ी मूर्खता है। उन्होंने जिसे 'अश्लीलता' कहा, वह वास्तव में ऋग्वेद की मर्यादा और आयुर्वेद का वह श्रेष्ठ प्रजनन विज्ञान है, जिसके अभाव में आज समाज में रोगी और निर्बल संतानें पैदा हो रही हैं।
विवाह केवल मनोरंजन या शोर-शराबा नहीं, बल्कि 'प्रजा' (उत्तम संतान) के लिए किया जाने वाला एक यज्ञ
ऋग्वेद (मण्डल 10, सूक्त 85, मन्त्र 42
इहैव स्तं मा वि यौष्टं ......स्वे गृहे ॥ ४२
वेद स्पष्ट आज्ञा देता है कि विवाह के तुरंत बाद पति-पत्नी साथ रहें, अलग न हों (मा वि यौष्टं) और पुत्र-पौत्रों के साथ आनंदित हों। स्वामी दयानंद ने इसी 'वेदोक्त' मर्यादा का पालन करते हुए विवाह और गर्भाधान को एक ही शृंखला में रखा है।
शचींद्र ने जिन औषधियों (सालम मिश्री, असगंध आदि) का मजाक उड़ाया, वे साक्षात भावप्रकाश निघण्टु और चरक संहिता की 'वाजीकरण' चिकित्सा हैं आयुर्वेद के 'वाजीकरण तन्त्र' में स्पष्ट लिखा है कि श्रेष्ठ संतान के लिए माता-पिता का शरीर पुष्ट और वीर्य शुद्ध होना चाहिए।
उत्तम बीज के लिए भूमि (स्त्री) और बीज (पुरुष) दोनों का बलवान होना आवश्यक है। स्वामी जी ने 'कस्तूरी' और 'सालम मिश्री' का नुस्खा इसलिए दिया ताकि संतान ओजस्वी और बुद्धिमान हो। क्या शचींद्र जी आयुर्वेद के 'वाजीकरण' विभाग को भी अश्लील मानते हैं?
क्या शचींद्र जी आपकी बेटी के विवाह के बाद गर्भाधान नहीं करेगी ?
पर आपके यहाँ तो पसीने और मैंल और मुंह में वीर्य लेने से बच्चा पैदा होना नार्मल बात है
शचींद्र शर्मा जी नाराज हो गए क्योकि ऐसा प्रत्युत्तर उनको मिलेगा ऐसा पंडित जी को अनुमान नहीं था
शचींद्र शर्मा की आपत्ति नम्बर 7 -
पंडित शचींद्र जी फिर बोले " स्वामी दयानंद जी ने अपने मुख से फरमाया है कि – 'जिस दिन ऋतुदान देना योग्य समझे, उसी दिन संस्कार विधि के अनुसार सब विवाह कर्म करके, मध्यरात्रि या दस बजे अति प्रसन्नता से सबके सामने विवाह की विधि को पूरा करके, एकांत सेवन करे, और पुरुष द्वारा वीर्य स्थापन और स्त्री वीर्य का आकर्षण की जो विधि है, उसके अनुसार करे' (सत्यार्थ प्रकाश – पृष्ठ 81)।"
बाबूलाल आर्य जी का जवाब -
पहली बात तो ये है पंडित की ये विवाह संस्कार है या गर्भादान संस्कार ?
विवाह संस्कार में गर्भादान विषय को पढ़ना सिर्फ़ तुम्हारी मूर्खता और दुष्टता को दिखाता है ।
लेकिन तुमने विषय उठाया है तो उसका भी उत्तर सुन ता जा ।
इस बात को समझने के लिए स्वामी जी के समय की सामाजिक स्थिति को देखना होगा:
• उस समय समाज में बाल-विवाह चरम पर था। 5 से 10 साल की उम्र में बच्चों की शादी कर दी जाती थी।
शादी के बाद लड़की अपने मायके में ही रहती थी। फिर कई वर्षों बाद, जब वह सयानी होती थी, तब 'गौना' (द्विरागमन) की एक अलग रस्म की जाती थी, जिसके बाद उसे विदा करके पति के घर भेजा जाता था और तब गर्भाधान होता था।
स्वामी जी ने इस कुप्रथा पर कड़ा प्रहार किया। उनका कहना था कि जब लड़का-लड़की पहले से ही 25 और 16 वर्ष के हो चुके हैं, तो बचपन में शादी करके बाद में 'गौना' करने का ढोंग क्यों? सीधे विवाह ही तब करो जब दोनों गर्भाधान के योग्य हो चुके हों। इसलिए उन्होंने लिखा कि विवाह संस्कार विधिपूर्वक संपन्न करो और सीधे अपने गृहस्थ जीवन (ऋतुदान/गर्भाधान) में प्रवेश करो—बीच में किसी 'गौने' की रस्म की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है।
यदि कोई कहे कि स्वामी जी का यह नियम अनिवार्य था कि उसी रात गर्भाधान होना ही चाहिए, तो यह मूर्खता होगी। स्वामी जी का सिद्धांत बहुत व्यावहारिक था अगर विवाह की रात ही गर्भाधान संस्कार नियम अनिवार्य होता तो स्वामी ये क्यो लिखते की "जिस रात्रि में गर्भस्थापन करने की इच्छा हो , उससे पूर्व दिन में सुगन्धादी पदार्थों सहित पूर्व सामान्य प्रकरण के लिखित प्रमाणे हवन करके निम्नलिखित मंत्रों से आहुति देवे "
आपके यहाँ विवाह और गर्भाधान कैसे होता है ? क्या आपके पौराणिक वर वधू एकांत सेवन नहीं करते ? या पूरे परिवार के सामने खुल्लम खुल्ला संभोग करते है ? या पौराणिकों में संभोग का प्रावधान नहीं है ? खीर या पसीने मात्र से बच्चे पैदा होते है ?
शचींद्र शर्मा जी बोले-- छी छी आर्य जी कैसे बात करते हो ?
मेरी बेटी कभी संभोग जैसा अश्लील कार्य नहीं करेगी वो तो संतान उत्पत्ति के लिए पुराणों में वर्णित खीर खाकर गर्भवती हो जाएगी या फिर नहाते समय किसी ऋषि मुनि का वीर्य मुंह में जाके उसको गर्भवती कर देगा जैसे **पद्म पुराण और महाभारत** में आता है कि ऋषि विभाण्डक का वीर्य नदी में गिरा, जिसे एक **हिरणी** ने पी लिया और वह गर्भवती हो गई। वैसे ही मेरी बेटी भी वीर्यपान मात्र से गर्भवती हो जाएगी ।
मंडप में उपस्थित पुरुष महिलाएँ ये सुन कर हंस पड़े । । किंतु शचींद्र शर्मा का मुखमंडल लज्जित हो उठा – "
शचीन्द्र शर्मा की आपत्ति नम्बर 8 -
शचीन्द्र बोला की विवाह के आचार्यत्व के नाते यह सब समझाना हमारा कर्तव्य है।--" आपकी लड़की को समझ जाना चाहिए कि विवाह के फौरन बाद ही सत्यार्थ प्रकाश के अनुसार वर इसमें गर्भ का आधान करेगा... अतः स्वामी जी द्वारा कही वैदिक विधि में त्रुटि न हो, इसलिए मैं उनका ही वचन यहाँ पहले पढ़ देता हूँ –
जब वीर्य का गर्भ में गिरने का समय हो तो उस समय स्त्री और पुरुष दोनों स्थिर हो और नाक के सामने नाक, नेत्र के सामने नेत्र, अर्थात शरीर को सीधा करें और अत्यंत प्रसन्न रहें, डिगें नहीं। पुरुष अपने शरीर को ढीला छोड़े, और स्त्री उस वीर्य की प्राप्ति के समय अपान वायु को ऊपर खींचे, योनि को ऊपर संकोच (सिकोड़) कर वीर्य का ऊपर आकर्षण करके गर्भाशय में स्थित करे। तत्पश्चात दोनों शुद्ध जल से स्नान करें, और सालम मिश्री का नुस्खा दूध में डालकर पी लें और फिर अलग-अलग सो जाएँ' (सत्यार्थ प्रकाश – पृष्ठ ८२)।"
धूर्त शचींद्र की ये आपत्ति सुन कर
बाबू लाल आर्य जी का जवाब -
एक आचार्य का कर्तव्य संस्कार संपन्न कराना होता है, न कि सुहागरात की व्याख्या करना। विवाह मंडप में 'ऋग्वेद' के पवित्र मंत्रों का गान होता है। स्वामी जी ने स्पष्ट लिखा है कि गर्भाधान एक 'एकांत' और 'निजी' कृत्य है। इसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाकर आपने स्वयं को एक 'धूर्त' और 'अशिष्ट' व्यक्ति सिद्ध कर दिया है। आपकी यह हरकत वैसी ही है जैसे कोई व्यक्ति धर्मग्रंथ के पन्नों से जूते साफ़ करे और कहे कि मैं तो 'धर्म' को छू रहा हूँ।"
क्या अपनी बेटी के विवाह संस्कार में भी तुम ऐसे ही गर्भादान विषय की व्याख्या करने बैठोगे ?
शचींद्र शर्मा जैसे लोग जब 'सत्यार्थ प्रकाश' के इन शब्दों का उपहास उड़ाते हैं, तो वे वास्तव में अपनी उस गंदी मानसिकता का प्रदर्शन करते हैं जहाँ 'शिक्षा' को 'अश्लीलता' और 'पाखंड' को 'मर्यादा' मान लिया गया है।
क्या शचींद्र शर्मा को यह विषय छेड़ना शोभा देता है?
शचींद्र का यह कहना कि "विवाह में यह विषय छेड़ना हमारा कर्तव्य है", उनके चरित्र की धूर्तता दिखाता है। इसका उत्तर यह है:
प्राचीन काल में आचार्य और माता-पिता विवाह से पूर्व वर-वधू को 'गृहस्थाश्रम' के कर्तव्यों की शिक्षा एकांत में देते थे।पौराणिक समाज ने इस शिक्षा को तो बंद कर दिया, लेकिन विवाह के समय मंडप में अश्लील गालियाँ, बेहूदा मजाक और गंदे गीतों को 'लोकाचार' के नाम पर बढ़ावा दिया। स्वामी दयानंद ने इन बातों को 'सत्यार्थ प्रकाश' (जो एक मार्गदर्शक ग्रंथ है) में इसलिए लिखा ताकि युवा पीढ़ी बिना किसी गुरु के भी 'प्रजनन विज्ञान' को सही से समझ सके। इसे मंडप में सबके सामने चिल्लाकर पढ़ना शचींद्र जैसे कुंठित व्यक्ति की अपनी बदतमीजी है, स्वामी जी की विधि का दोष नहीं। स्वामी जी ने जो शारीरिक क्रियाएँ (जैसे नाक के सामने नाक, अपान वायु खींचना) बताई हैं, वे साक्षात योगशास्त्र और आयुर्वेद के 'यौगिक' सिद्धांत हैं।
• योगशास्त्र (हठयोग प्रदीपिका/घेरण्ड संहिता): योग में 'अश्विनी मुद्रा' और 'मूलबंध' का वर्णन है। योनि और अपान वायु को ऊपर खींचना गर्भाशय को वीर्य ग्रहण करने के लिए शारीरिक रूप से तैयार करता है। यह विज्ञान है, अश्लीलता नहीं।
• चरक संहिता (शारीरस्थान, अध्याय 8): महर्षि चरक ने गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष की मानसिक अवस्था और शारीरिक स्थिति पर विस्तार से लिखा है। उन्होंने कहा है कि यदि माता-पिता प्रसन्न और स्थिर न हों, तो संतान विकृत पैदा होती है।स्वामी जी ने वही लिखा जो महर्षि चरक और वाग्भट ने लिखा है। क्या शचींद्र जी चरक संहिता को भी अश्लील साहित्य मानकर जला देंगे?
शर्मा जी, जिस विषय को आप अश्लीलता के लहजे में पढ़ रहे हैं, उसे हमारे ऋषियों ने 'पुंसवन' और 'गर्भाधान' संस्कार के रूप में पूजा है। अश्लीलता आपके पढ़ने के ढंग में है, स्वामी जी के विज्ञान में नहीं। क्या आपने कभी सुश्रुत संहिता पढ़ी है? वहां गर्भाधान की इससे भी अधिक सूक्ष्म शारीरिक क्रियाएं लिखी हैं।"
शचींद्र शर्मा की आपत्ति नम्बर 9
शचींद्र: "पर यह सब मंडप में कहना... क्या यह आर्य समाज की संस्कृति है?"
जवाब-
बाबूलाल आर्य जी बोले -- मंडप में आप जैसा धूर्त ही ऐसी बातें कर सकता है। स्वामी जी ने यह ग्रंथ पढ़ने के लिए लिखा था ताकि लोग अंधेरे में न रहें। ना की मंडप में बैठ कर सबके सामने पढ़ने के लिए ?आपने धर्म को केवल 'दहेज' और 'भोजन' तक सीमित कर दिया। स्वामी जी ने बताया कि एक 'शिवाजी' या 'महाराणा प्रताप' जैसा पुत्र कैसे पैदा किया जाता है। उसके लिए शरीर का विज्ञान समझना पड़ता है।"शर्मा जी, आपकी बुद्धि केवल शरीर के अंगों तक अटक गई है, जबकि स्वामी दयानंद की दृष्टि उस 'बीज' पर थी जिससे एक महान राष्ट्र का निर्माण होता है। आप 'बाबूलाल' पर नहीं, बल्कि भारत की महान ऋषि-परंपरा पर हँस रहे हैं।"
शचीन्द्र ने कहा – "मैं अपनी इच्छा से तो कुछ नहीं कह रहा, केवल स्वामी दयानंद जो विधि लिख गए हैं, उसे ही शब्दश: सुनाकर अपने धर्म का पालन कर रहा हूँ। आप क्रोधित क्यों होते हैं? आपने ही तो कहा था विवाह स्वामी दयानंद के अनुसार होना चाहिए। मैं तो उसी का पालन कर र