26/04/2026
अस्सलामु अलैकुम!
आज हम एक अहम मुद्दे पर बात करेंगे जो हमारे समाज में आम है। बहुत से मौलाना और मौलवी साहबान जब तकरीर करते हैं तो उर्दू, अरबी और फारसी के मुश्किल लफ्जों का इस्तेमाल करते हैं। उनके सामने बैठे आम लोग, जिनमें से ज्यादातर को न तो अरबी समझ आती है, न उर्दू ठीक से, और न ही हिन्दी का गहरा ज्ञान है, वे क्या समझ पाते हैं?
कुछ नहीं!
वे बस ताली बजाते हैं, “सुब्हानल्लाह” कहते हैं, लेकिन दिल में दीन की असली समझ नहीं आती। नमाज़, रोज़ा, अख्लाक, तौहीद, रिसालत और आखिरत की हकीकत उनके दिलों तक नहीं पहुंचती। नतीजा? लोगों के अंदर **दीन की कमी** रह जाती है। और इसी कमी का फायदा उठाकर कुछ लोग अपनी जेबें भरते हैं, दीन को व्यापार बना लेते हैं।
#इस्लाम इसकी इजाजत नहीं देता
इस्लामिक नजरिये से यह बहुत गलत है। अल्लाह तआला फरमाते हैं:
“हमने कोई रसूल नहीं भेजा मगर अपनी कौम की भाषा में, ताकि वह उनको साफ-साफ समझा दे।” (सूरह इब्राहीम: 4)
कुरान खुद कहता है: “हमने इसे अरबी कुरान बनाया ताकि तुम समझो।” (सूरह यूसुफ: 2)
रसूलुल्लाह ﷺ की सुन्नत भी यही है कि दीन को लोगों की समझ की भाषा में पहुंचाया जाए। पैगंबर ﷺ अरब की भाषा में, उनके मुहावरे में बात करते थे ताकि आम आदमी समझ सके।
हदीस में साफ चेतावनी है: “जिससे इल्म पूछा जाए और वह उसे छुपाए, तो कियामत के दिन अल्लाह उसे आग की लगाम पहनाएगा।” (सुनन तिर्मिज़ी)
कुरान में भी उन लोगों पर लानत है जो इल्म छुपाते हैं:
“जो लोग अल्लाह की उतारी हुई हिदायत और बयान को छुपाते हैं... उन पर अल्लाह की लानत है और सब लानत करने वालों की लानत।” (सूरह बकरा: 159)
#उलेमा की जिम्मेदारी
उलेमा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वे दीन को आम लोगों तक साफ और सरल भाषा में पहुंचाएं। अगर वे जानबूझकर मुश्किल लफ्ज इस्तेमाल करते हैं ताकि लोग न समझें, तो यह इल्म छुपाना है, जो कबीरा गुनाह है।
दीन कोई राज़ नहीं है कि उसे छुपाया जाए। दीन तो रोशनी है, जो हर दिल तक पहुंचनी चाहिए। अगर तकरीर में इतने अरबी-फारसी लफ्ज हों कि सुनने वाला बेचारा सिर्फ सिर हिलाता रहे, तो उस तकरीर का क्या फायदा?
सच्चे उलेमा वही हैं जो:
- लोगों की भाषा में बात करें
- कुरान-हदीस की आयतों और अहादिस को समझाकर बताएं
- अमल की तरफ ले जाएं
- दीन को आसान बनाएं, न कि मुश्किल
रसूल ﷺ ने फरमाया: “दीन आसान है।” जो लोग इसे मुश्किल बनाते हैं, वे दीन की खिदमत नहीं, बल्कि अपनी खिदमत कर रहे होते हैं।
हम क्या करें?
भाइयों, हमें चाहिए कि:
1. ऐसे मौलवियों की आलोचना करें जो जानबूझकर समझ से परे भाषा इस्तेमाल करते हैं।
2. उन उलेमा को सपोर्ट करें जो सरल हिन्दी/स्थानीय भाषा में दीन सिखाते हैं।
3. खुद कुरान की तफसीर और हदीस की किताबें आसान भाषा में पढ़ें।
4. दीन की सही समझ हासिल करें, ताकि कोई हमें गुमराह न कर सके।
अल्लाह हमें सच्चे इल्म की तौफीक दे, और उन उलेमा को हिदायत दे जो दीन को व्यापार बना रहे हैं। आमीन!
जो सच्चे दिल से दीन सिखाना चाहते हैं, वे सरल भाषा में सिखाते हैं। क्योंकि दीन का मकसद समझना है, न कि सिर्फ सुनना।
“ऐ मेरे रब, मुझे इल्म अता फरमा!”
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जज़ाकल्लाह!