14/01/2023
कुसूर किसका, झोला छाप डॉक्टर का या फिर आप का ?
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पलवल (हरियाणा) के गदपुरी थाना अंतर्गत गांव बघौला में एक गर्भवती महिला की मौत हो गई। वजह, खांसी-जुकाम से पीड़ित होने के कारण वह एक स्थानीय डाॅक्टर (कथित) के पास गई, जिसने उसे कोई इंजेक्शन लगा दिया। वहां से लौटते समय रास्ते में महिला की हालत बिगड़ गई और घर पहुंचते ही उसने दम तोड़ दिया। इस पर उसके पति ने उक्त डाॅक्टर के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी। महिला के पति का आरोप है कि डाॅक्टर झोला छाप है और उसने गलत इंजेक्शन लगा दिया।
अब सवाल यह है कि महिला की मौत का जिम्मेदार आखिर कौन है, कथित डाॅक्टर या फिर उसका पति? यह कोई नया अथवा अनोखा मामला नहीं है। ऐसी घटनाएं आएदिन देश भर से हमारे-आपके सामने आती हैं। लोग इलाज के लिए गांव-मोहल्ले में संचालित क्लीनिक के बिना किसी डिग्री वाले डाॅक्टर के पास जाते हैं, दवा लेते हैं, इंजेक्शन लगवाते हैं और लौट आते हैं। ठीक हो गए, तो वाह-वाह! वरना, इलाज करने वाला शख्स (कथित डाॅक्टर) सबकी नजर में गुनहगार, अपराधी और हत्यारा हो जाता है। तब कोई यह नहीं देखता कि इस भीषण महंगाई के जमाने में सौ-पचास रुपये लेकर इलाज करने वाला उक्त शख्स न जाने कितने मरीजों को राहत पहुंचा चुका है। समय-बेसमय, रात-बिरात, बेखटके आप जब ऐसे किसी डाॅक्टर के पास जा धमकते हैं, तब वह साक्षात देवदूत सरीखा नजर आता है। लेकिन, अगर कहीं मामला बिगड़ गया, तो वह फर्जी और झोला छाप साबित हो जाता है! आप आखिर क्यों जाते हैं, ऐसे झोला छाप अथवा कथित डाॅक्टर के पास? सरकारी या किसी मान्यता प्राप्त निजी अस्पताल क्यों नहीं जाते? यह गली-मोहल्ले के उन कथित डाॅक्टरों की पैरवी हरगिज नहीं है, बल्कि हमें इस बिंदु पर सोचने, विचार करने की जरूरत है कि क्या किसी सरकारी अथवा बड़े निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान भूल-चूक नहीं होती? मरीज की जान नहीं जाती? इस बात पर अगर भरोसा न हो, तो साहिबाबाद के एक बड़े अस्पताल की घटना पर नजर डाल लीजिए, जहां एक बच्चे की नाक का ऑपरेशन हुआ, लेकिन उसकी आंख की रोशनी चली गई।
दरअसल, सच्चाई यह है कि आजादी मिलने के 74 वर्षों बाद भी देश में चिकित्सा सुविधाओं का नितांत अभाव है। हर जिले-शहर में सरकारी अस्पताल हैं, लेकिन पर्याप्त डाॅक्टर नहीं हैं, दवाएं नहीं हैं, बिस्तर नहीं हैं। अगर उक्त सारी चीजें हैं भी, तो वहां मौजूद अमले में मरीजों की पीड़ा दूर करने का जज्बा नहीं है, नीयत नहीं है। निजी अस्पताल तो बदनाम हैं ही लूट के लिए, सरकारी उनसे एक कदम आगे हैं। कोई जांच-टेस्ट अस्पताल में आसानी से संभव नहीं है। हर जगह एक पूरा का पूरा गिरोह सक्रिय है, तरह-तरह से
मरीजों और उनके तीमारदारों का मानसिक-आर्थिक शोषण करने के लिए। बाहर से जांच और दवा खरीदी में कट-कमीशन लेना अमले ने अपना हक समझ रखा है।
----महेंद्र अवधेश