Jamdagnipuram Foundation

Jamdagnipuram Foundation वृक्षारोपण • पर्यावरण संरक्षण • सामाजिक जागरूकता • जनसेवा.
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24/09/2026
24/09/2026

ईश्वर कहाँ है...?
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मन को वश करके प्रभु चरणों मे लगाना बडा ही कठिन है ।शुरुआत मे तो यह इसके लिये तैयार ही नहीं होता है । लेकिन इसे मनाए कैसे?

एक शिष्य थे किन्तु उनका मन किसी भी भगवान की साधना में नही लगता था और साधना करने की इच्छा भी मन मे थी ।

वे गुरु के पास गये और कहा कि गुरुदेव मन लगता नहीं और साधना करने का मन होता है ।कोई ऐसी साधना बताए जो मन भी लगे और साधना भी हो जाये ।

गुरु ने कहा तुम कल आना ।दुसरे दिन वह गुरु के पास पहुँचा तो गुरु ने कहा सामने रास्ते मे कुत्ते के छोटे बच्चे हैं उसमे से दो बच्चे उठा ले आओ और उनकी हफ्ताभर देखभाल करो ।

गुरु के इस अजीब आदेश सुनकर वह भक्त चकरा गया लेकिन क्या करे, गुरु का आदेश जो था।

उसने 2 पिल्लों को पकड कर लाया लेकिन जैसे ही छोडा वे भाग गये।उसने फिरसे पकड लाया लेकिन वे फिर भागे ।

अब उसने उन्हे पकड लिया और दुध रोटी खिलायी ।अब वे पिल्ले उसके पास रमने लगे।

हप्ताभर उन पिल्लो की ऐसी सेवा यत्न पूर्वक की कि अब वे उसका साथ छोड नही रहे थे ।वह जहा भी जाता पिल्ले उसके पीछे-पीछे भागते, यह देख गुरु ने दुसरा आदेश दिया कि इन पिल्लों को भगा दो।

भक्त के लाख प्रयास के बाद भी वह पिल्ले नहीं भागे तब गुरु ने कहा देखो बेटा शुरुआत मे यह बच्चे तुम्हारे पास रुकते नही थे लेकिन जैसेही तुमने उनके पास ज्यादा समय बिताया ये तुम्हारे बिना रहनें को तैयार नही है।

ठीक इसी प्रकार खुद जितना ज्यादा वक्त भगवान के पास बैठोगे, मन धीरे-धीरे भगवान की सुगन्ध,आनन्द से उनमे रमता जायेगा।

हम अक्सर चलती-फिरती पूजा करते है तो भगवान में मन कैसे लगेगा?

जितनी ज्यादा देर ईश्वर के पास बैठोगे उतना ही मन ईश्वर रस का मधुपान करेगा और एक दिन ऐसा आएगा कि उनके बिना आप रह नही पाओगे ।

शिष्य को अपने मन को वश में करने का मर्म समझ में आ गया और वह गुरु आज्ञा से भजन सुमिरन करने चल दिया।

बिन गुरु ज्ञान कहां से पाऊं
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बिना भोग लगा अन्न ग्रहण न करें〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️कभी भी ऐसा आहार ग्रहण न करें, जो भगवान को भोग न लगाया गया हो। जो भोजन भ...
24/09/2026

बिना भोग लगा अन्न ग्रहण न करें
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कभी भी ऐसा आहार ग्रहण न करें, जो भगवान को भोग न लगाया गया हो। जो भोजन भगवान को भोग लगाया गया है, वही प्रसाद रूप में ग्रहण करें।
एक भक्त हुए हैं, जिनका नाम अंगद जी था। वैसे तो वे स्वभाव से पहले नास्तिक प्रवृत्ति के थे, लेकिन उनकी पत्नी भगवान की भक्त थीं।
उनके मायके में संतों की सेवा होती रहती थी, और वहां उनके गुरुदेव के उपदेश सुनने को मिलते थे।
विवाह के बाद जब वे अंगद जी के साथ ससुराल आईं, तो देखा कि वहां राज वैभव तो था, लेकिन न किसी संत का दर्शन संभव था, न किसी संत का आना-जाना, न भगवद् चर्चा होती थी और न ही सत्संग।
रानी बहुत व्याकुल हो गईं। उन्हें मायके में रोज संतों का उच्छिष्ट मिलता था, सद्गुरु देव भगवान के दर्शन होते रहते थे, लेकिन यहां भक्ति का कोई भी वातावरण नहीं था।
हालांकि, अंगद जी की एक विशेषता थी- वे अपनी पत्नी को भगवद् भक्त मानकर बहुत श्रद्धा करते थे और उनके भक्ति मार्ग में कोई विरोध नहीं करते थे।
लेकिन स्वयं न तो भक्ति का आचरण करते थे, न संत-महात्माओं के प्रति कोई श्रद्धा रखते थे, और न ही भगवान की आराधना करते थे।
काफी दिनों तक संतों के दर्शन न होने के कारण रानी अत्यंत व्याकुल हो गईं।
उन्होंने अपने मायके पत्र लिखकर प्रार्थना की कि सद्गुरु देव भगवान से निवेदन करें कि कृपा करके एक बार यहां पधारें और दर्शन दें, क्योंकि मैं यहां से बाहर नहीं जा सकती और मेरे पति संतों के प्रति श्रद्धावान नहीं हैं।
जब मायके के राज परिवार ने गुरुदेव से प्रार्थना की, तो वे करुणामय होने के कारण आने के लिए सहमत हो गए।
गुरुदेव के आगमन से रानी अत्यंत हर्षित हो गईं। उन्होंने चरणामृत ग्रहण किया, आरती उतारी, भोग अर्पित किया और गुरुदेव को आसन पर विराजमान किया। फिर वे धीरे-धीरे उनके चरण दबाने लगीं।
इतने में अंगद जी वहां आ गए और अपनी रानी को किसी संत के चरण पकड़े हुए देखा। यह दृश्य देखकर वे क्रोधित हो गए और संत भगवान से बिगड़ने लगे।
रानी के तो होश उड़ गए! इतनी प्रार्थना के बाद गुरुदेव स्वयं पधारे थे, और अब उनके पति ही उनका अपमान कर रहे थे! लेकिन गुरुदेव ने रानी की ओर देखकर शांत रहने का संकेत दिया, फिर उठे और वहां से चले गए।
रानी ने दृढ़ संकल्प लेते हुए कहा, "अब मैं अपना जीवन नहीं रखूंगी। जब मेरे गुरुदेव भगवान का अपमान हो गया, तो न मैं तुम्हारा स्पर्श करूंगी, न तुमसे कोई वार्तालाप करूंगी, न ही तुम्हारे घर का अन्न-जल ग्रहण करूंगी..
मैं अपने शरीर को नष्ट कर दूंगी, क्योंकि मेरे ही बुलाने पर मेरे गुरुदेव का अपमान हुआ।"
अंगद जी अपनी पत्नी पर अत्यंत आसक्त थे। उनकी यह प्रतिज्ञा सुनकर उनका हृदय व्याकुल हो उठा। उन्होंने भी अन्न-जल का त्याग कर दिया।
जब कई दिन बीत गए, तो वे अपनी पत्नी के चरण पकड़कर बोले, "तुम जानती हो कि मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता। कृपया मुझे बताओ कि तुम्हें कैसे प्रसन्न कर सकता हूँ?"
रानी ने कहा, "यदि तुम सच में मुझे प्रसन्न करना चाहते हो, तो हमारे गुरुदेव भगवान के चरण पकड़कर उनसे क्षमा याचना करो, उन्हें मनाकर वापस लाओ और यहाँ आकर उन्हें भोग लगवाओ..
यदि वे यहाँ भोग ग्रहण कर लें, तो हम उनका उच्छिष्ट पाएंगे और हमारी दिनचर्या फिर से पूर्ववत हो जाएगी।"
अंगद जी भक्ति भाव से नहीं, बल्कि अपनी पत्नी के प्रति आसक्ति के कारण वे उनके गुरुदेव के पास गए। उन्होंने चरण पकड़कर क्षमा मांगी।
संतों का स्वभाव ही करुणामय होता है-कितनी भी बार कोई उनका अपमान करे, लेकिन जब कोई सच्चे हृदय से दंडवत करता है, तो वे सहज ही कृपा कर देते हैं। गुरुदेव उनके साथ जाने के लिए मान गए।
दोनों ने मिलकर उनके चरण धोए, भोग लगाया, और चरणामृत ग्रहण किया। हालांकि, अंगद जी यह सब भक्ति से नहीं, बल्कि अपनी पत्नी को प्रसन्न करने के लिए कर रहे थे।
लेकिन जैसे ही गुरुदेव का चरणामृत ग्रहण किया, उनके हृदय में पश्चाताप होने लगा। वे सोचने लगे, "मैं कितना नास्तिक रहा! संतों के प्रति कितनी दुर्भावना रखता था! और देखो, ये संत कितने कृपालु हैं!"
अब उनकी बुद्धि, जो पहले विपरीत चिंतन करती थी, अनुकूल चिंतन करने लगी।
उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, "हमारा अब तक का जीवन व्यर्थ गया। कृपया मुझे बताओ कि भक्ति कैसे करनी चाहिए?"
धीरे-धीरे वे ठाकुर सेवा में सहयोग देने लगे। अब बिना भोग लगाए वे कुछ भी ग्रहण नहीं करते थे। वर्षों से उनकी यही दिनचर्या बन गई-पहले ठाकुर जी को भोग लगाना और फिर केवल प्रसाद ही ग्रहण करना।
साथ ही अंगद जी ने चार पार्षद नियुक्त कर दिए, जिनका कार्य था कि जहां कहीं भी संत दिखाई दें, उन्हें घर बुलाकर भोग लगवाएं।
अंगद जी बहुत वीर पुरुष थे, और राजा के भतीजे भी थे। एक बार उन्होंने किसी राजा पर आक्रमण किया और विजय प्राप्त कर उसका मुकुट जीतकर ले आए। उस मुकुट में 101 हीरे जड़े थे, जिनमें से एक हीरा अत्यंत अमूल्य था।
अंगद जी को इस विशेष हीरे का मूल्य और महत्व ज्ञात था। उन्होंने शेष हीरे विजय प्राप्त राजा को लौटा दिए, लेकिन वह अमूल्य हीरा अपने पास रख लिया और कहा, "यह हीरा जगन्नाथ जी के मुकुट पर जड़ेगा।"
राजा के कुछ मंत्री और विषयी स्वभाव के दरबारियों ने राजा को उकसाया, "उस हीरे की कीमत आपके पूरे खजाने से भी अधिक है। आपको इसे हर हाल में वापस लेना चाहिए!"
राजा ने विनम्रता से अंगद जी से आग्रह किया, "कृपया वह हीरा हमें दे दीजिए।" लेकिन अंगद जी अडिग रहे, "नहीं, यह हीरा हमने जगन्नाथ जी को अर्पित कर दिया है।"
मनुष्य की बुद्धि बदलने में देर नहीं लगती। राजा की बुद्धि में भी विकार आ गया, और उसने ठान लिया कि अंगद जी को मार दिया जाए।
लेकिन क्योंकि वे उसके चाचा थे, उन्हें सीधे मारना उचित नहीं लगता था, वरना राजदरबार में निंदा होगी। राजा ने एक षड्यंत्र रचा।
उसने अंगद जी की बहन, जो राजमहल की रसोई तैयार करती थी, को अपने पक्ष में करने का प्रयास किया। राजपरिवार में भोजन अत्यंत विश्वसनीय लोगों द्वारा ही बनाया जाता था, और अंगद जी की बहन इसी कार्य में लगी हुई थी।
राजा ने उसे लालच देते हुए कहा, "तुम जितना धन चाहोगी, उतना दूंगा। बस, तुम अंगद जी के भोजन में विष मिला दो।"
राजा ने अपने सामने विष लाकर दिया और उसे भोजन में मिलवा दिया। अंगद जी को इस षड्यंत्र का कोई आभास नहीं था।
जैसा उनका नियम था, उन्होंने भोजन को पहले ठाकुर जी को अर्पित किया, भोग लगाया, और फिर भोजन करने बैठे।
अंगद जी की बहन की बेटी, जो प्रतिदिन उनके साथ बैठकर भोजन करती थी, अचानक घर से गायब कर दी गई थी। अंगद जी ने पूछा, "बिटिया कहां है? उसे बुलाओ!"
बहन ने झूठ कहा, "वह खेलने चली गई है।" अंगद जी ने दृढ़ता से कहा, "नहीं, जब तक वह नहीं आएगी, तब तक मैं भोजन नहीं करूंगा।" उनके इन शब्दों का गहरा प्रभाव उनकी बहन पर पड़ा।
वह विचार करने लगी कि "जो व्यक्ति मेरी पुत्री से इतना प्रेम करता है, क्या मैं उसे विष देकर मार सकती हूँ?" अंततः उसने रोते हुए कहा, "भैया, भोजन मत ग्रहण करना!"
अंगद जी चौंक गए, "क्यों?"
वह फूट-फूटकर रोने लगी, "राजा ने मुझे प्रलोभन देकर प्रेरित किया था। मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई, और मैंने इस भोजन में विष मिला दिया है।"
अंगद जी ने अपनी बहन से कहा, "तुम्हें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। मैंने यह भोजन पहले ही ठाकुर जी को अर्पित कर दिया है..
यदि यह भोजन विषाक्त था, तो अब यह ठाकुर जी का प्रसाद बन चुका है। मैं इसे कैसे त्याग सकता हूँ?"
इसके बाद, अंगद जी ने संपूर्ण भोजन ग्रहण किया-यहां तक कि जूठे पात्र भी चाटकर खा लिए।
परंतु आश्चर्य की बात यह थी कि विष का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा! वे पूर्णतः स्वस्थ और सुरक्षित रहे, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
पूज्य पंडित गया प्रसाद जी महाराज कहते हैं: "अर्पित किए बिना भोजन कभी मत ग्रहण करो। जब भी भोजन पाओ, उसे ठाकुर जी का प्रसाद मानो..
यदि तुम ऐसी स्थिति में हो जहाँ ठाकुर सेवा संभव नहीं है और भोजन सामने आ गया है, तो एक मिनट के लिए आँखें बंद करो, अपने इष्ट देव का स्मरण करो, प्रभु को अर्पित करो और फिर दो-चार बार नाम जपकर ग्रहण करो।"
बिना प्रभु को अर्पित किए जल भी ना पिएँ। ऐसा करने से आपकी बुद्धि शुद्ध और निर्मल हो जाएगी।
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माँ अन्नपूर्णा की तस्वीर/प्रतिमा घर में रखने के नियम〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️हिन्दू धर्म में मान्यता है कि अन्न की देवी ...
24/09/2026

माँ अन्नपूर्णा की तस्वीर/प्रतिमा घर में रखने के नियम
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हिन्दू धर्म में मान्यता है कि अन्न की देवी माता अन्नपूर्णा की तस्वीर रसोईघर में लगाने से घर में कभी भी अन्न और धन की कमी नहीं होती है। आपको बता दें कि यह तस्वीर घर में सुख-शांति व सकारात्मक ऊर्जा एवं धन-धान्य लाती हैं। वैसे भी हिन्दू धर्म में देवी-देवता के पूजन का विशेष महत्व है। यदि आप भी अपने किचन/ रसोईघर में मां अन्नपूर्णा की तस्वीर लगाते हैं तो यह बहुत ही शुभ होगा तथा आपके घर में अनाज के भंडार भरे रहेंगे।

धर्म और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मां अन्नपूर्णा की तस्वीर रसोईघर में लगाना शुभ माना जाता है। अत: यदि आप इसे रसोईघर के आग्नेय कोण में लगाते हैं तो यह अतिशुभ माना गया है। इतना ही नहीं मां अन्नपूर्णा की तस्वीर आग्नेय कोण लगी होने से परिवार के सदस्य स्वस्थ रहते हैं तथा घर में सौभाग्य का आगमन भी होता है।

माँ अन्नपूर्णा की तस्वीर घर में रखने के नियम?
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1. यदि आप भी अपने किचन में माता अन्नपूर्णा की प्रतिमा या तस्वीर लगाना चाहते हैं तो किसी भी बृहस्पतिवार अथवा शुक्रवार के दिन सुबह जल्दी जागकर अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर स्नान करके स्वच्छ धुले हुए वस्त्र धारण करें, फिर सर्वप्रथम रसोईघर की अच्छीतरह साफ-सफाई करें।

2. अब पूरे रसोईघर तथा उस दीवार को भी गंगाजल छिड़क कर साफ-स्वच्छ करें, जिस जगह पर तस्वीर लगानी है।

3. फिर खाना बनाने में उपयोग में आने वाले गैस अथवा चूल्हे को साफ करके विधिपूर्वक उसकी पूजा करके पूरे मन से मां अन्नपूर्णा की प्रार्थना करें, तथा कहें कि मेरे घर में कभी भी अन्न-धन तथा खाने-पीने के चीजों की कमी ना रहे।

4. अब रसोईघर में शिव तथा पार्वती (के अन्नपूर्णास्वरूप) की आराधना करके मां से विनती करें और उत्तर या पूर्व दिशा पर माता की फोटो या तस्वीर चिपका दें।

5. तत्पश्चात रसोई में ही भगवान शिव एवं मां पार्वती का पूजन करके गैस या चूल्हे की भी हल्दी, कुमकुम, चावल, पुष्प आदि चढ़ाकर पूजन करें तथा धूप और दीया जला कर आरती करें।

6. फिर मां अन्नपूर्णा की तस्वीर के सामने ही उनके मंत्र, स्तोत्र और कथा का वाचन करें और घर के सभी सदस्य ग्यारह बार प्रार्थना करके कहें कि- 'हे अन्नपूर्णा माता, हमारे घर में हमेशा अनाज, जल और धन का भंडार भरा रहे।

7. अब इस तस्वीर का रसोईघर में लग जाने के बाद अपने हाथों से शुद्ध और सात्विक भोजन बनाएं तथा एक मीठा कुछ न कुछ अवश्य बनाकर मां अन्नपूर्णा को भोग लगाएं

8. फिर अपने सामर्थ्य के अनुसार यह भोजन असहाय लोगों में वितरित करें। तत्पश्चात परिवार वाले भी ग्रहण करें।

9. इस तरह माता अन्नपूर्णा की कृपा से आपके घर में कभी भी अन्न-धन की कमी महसूस नहीं होगी तथा हमेशा भंडार भरे ही रहेंगे।

10. यदि आपका रसोईघर छोटा है तो आप मां अन्नपूर्णा की तस्वीर या फोटो अपने घर मंदिर में रखकर भी उसका पूजन तथा प्रार्थना कर सकते हैं।

11. वास्तु शास्त्र के अनुसार, जब भी आप माता अन्नपूर्णा की तस्वीर घर में लगाएं तब भोग स्वरूप माता को मूंग दाल भी अर्पित करें तथा पूजन के बाद इसे गौ माता को खिला दें। इससे आपके घर में सुख-समृद्धि तो आएगी ही साथ ही धन-धान्य तथा अनाज के भंडार भरे रहेंगे तथा आपको यश और मान-सम्मान की प्राप्ति भी होगी।

12. इसके साथ ही रसोईघर में ताजे फलों एवं सब्जियों से भरी तस्वीर लगाना बहुत शुभ माना जाता है।
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माँ विंध्यवासिनी और श्रीकृष्ण के बीच का संबंध??〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️भगवान श्रीकृष्ण को पूर्णावतार माना जाता है। अर्थात जो ...
24/09/2026

माँ विंध्यवासिनी और श्रीकृष्ण के बीच का संबंध??
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भगवान श्रीकृष्ण को पूर्णावतार माना जाता है। अर्थात जो हर तरह से पूर्ण हैं और जो पूर्णत: विष्णु ही है। भगवान श्रीकृष्ण के संबंध में सैंकड़ों रहस्य है लेकिन बहुत कम लोग ही उन सभी रहस्यों को जानते होंगे।एक रहस्य यह भी है कि माता विंध्यवासिनी भगवान श्रीकृष्ण की क्या लगती थीं?

भगवान् श्रीकृष्ण की परदादी मारिषा एवं सौतेली मां रोहिणी (बलराम की मां) दोनों ही नाग जनजाति की थीं। भगवान श्री कृष्ण की माता का नाम देवकी था।भगवान श्री कृष्ण से जेल में बदली गई यशोदापुत्री का नाम एकानंशा था, जो आज विंध्यवासिनी देवी के नाम से पूजी जातीं हैं। श्रीमद्भागवत में नंदजा देवी कहा गया है इसीलिए उनका अन्य नाम कृष्णानुजा है। इसका अर्थ यह की वे भगवान श्रीकृष्ण की बहन थीं।इस बहन ने श्रीकृष्ण की जीवनभर रक्षा की थी।

श्रीमद्भागवत पुराण की कथा अनुसार देवकी के आठवें गर्भ से जन्में श्रीकृष्ण को वसुदेवजी ने कंस से बचाने के लिए रातोंरात यमुना नदी को पार गोकुल में नन्दजी के घर पहुंचा दिया थातथा वहां यशोदा के गर्भ से पुत्री के रूप में जन्मीं भगवान की शक्ति योगमाया को चुपचाप वे मथुरा के जेल में ले आए थे। बाद में जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म का समाचार मिला तो वह कारागार में पहुंचा।उसने उस नवजात कन्या को पत्थर पर पटककर जैसे ही मारना चाहा, वह कन्या अचानक कंस के हाथों से छूटकर आकाश में पहुंच गई और उसने अपना दिव्य स्वरूप प्रदर्शित कर कंस के वध की भविष्यवाणी की और अंत में वह भगवती विन्ध्याचल वापस लौट गई।कहते हैं कि योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था। इनके जन्म के समय यशोदा गहरी निद्रा में थीं और उन्होंने इस बालिका को देखा नहीं था। जब आंख खुली तो उन्होंने अपने पास पुत्र को पाया जो कि कृष्ण थे।हालांकि गर्गपुराण के अनुसार भगवान कृष्ण की मां देवकी के सातवें गर्भ को योगमाया ने ही बदलकर कर रोहिणी के गर्भ में पहुंचाया था, जिससे बलराम का जन्म हुआ। बाद में योगमाया ने यशोदा के गर्भ से जन्म लिया था।इन्हीं योगमाया ने कृष्ण के साथ योगविद्या और महाविद्या बनकर कंस, चाणूर और मुष्टिक आदि शक्तिशाली असुरों का संहार कराया, जो कंस के प्रमुख मल्ल माने जाते थे।श्रीमद्भागवत पुरा में देवी योगमाया को ही विंध्यवासिनी कहा गया है जबकि शिवपुराण में उन्हें सती का अंश बताया गया है।

भारत में विंध्यवासिनी देवी का चमत्कारिक मंदिर विंध्याचल की पहाड़ी श्रृंखला के मध्य (मिर्जापुर, उत्तर) पतित पावनी गंगा के कंठ पर बसा हुआ है।प्रयाग एवं काशी के मध्य विंध्याचल नामक तीर्थ है जहां मां विंध्यवासिनी निवास करती हैं। यह तीर्थ भारत के उन 51 शक्तिपीठों में प्रथम और अंतिम शक्तिपीठ है जो गंगा तट पर स्थित है।यहां तीन किलोमीटर के दायरे में अन्य दो प्रमुख देवियां भी विराजमान हैं। निकट ही कालीखोह पहाड़ी पर महाकाली तथा अष्टभुजा पहाड़ी पर अष्टभुजी देवी विराजमान हैं। हालांकि कुछ विद्वान इस 51 शक्तिपीठों में शामिल नहीं करते हैं लेकिन 108 शक्तिपीठों में जरूर इनका नाम मिलता है।शिव पुराण अनुसार मां विंध्यवासिनी को सती माना गया है। सती होने के कारण उन्हें वनदुर्गा कहा जाता है। कहते हैं कि आदिशक्ति देवी कहीं भी पूर्णरूप में विराजमान नहीं हैं,लेकिन विंध्याचल ही ऐसा स्थान है जहां देवी के पूरे विग्रह के दर्शन होते हैं। शास्त्रों के अनुसार, अन्य शक्तिपीठों में देवी के अलग-अलग अंगों की प्रतीक रूप में पूजा होती है।मान्यता अनुसार सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी इस क्षेत्र का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता। यहां लोग सिद्धि प्राप्त करने के लिए साधना करने आते हैं जहां संकल्प मात्र से साधकों को सिद्धि प्राप्त होती है।मार्कण्डेय पुराण श्री दुर्गा सप्तशती की कथा अनुसार ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी भगवती की मातृभाव से साधना और उपासना करते हैं, तभी वे सृष्टि की व्यवस्था करने में समर्थ होते हैं।
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24/09/2026

माता पिता का एक बेटे के नाम छोटा सा संदेश....

जिस दिन तुम हमे बूढ़ा देखो तब सब्र करना और हमे समझने की कोशिश करना

जब हम कोई बात भूल जाए तो हम पर गुस्सा ना करना और अपना बचपन याद करना.

जब हम बीमार हो जाए तो वो दिन याद करके हम पर अपने पैसे खर्च करना जब हम तुम्हारी ख्वाहिशे पूरी करने के लिए अपनी ख्वाहिशे कुर्बान करते थे.

जब हम बूढ़े होकर चल ना पाए तो हमारा सहारा बनना और अपना पहला कदम याद करना.

जब हमारे आँखों में आँसू देखना तो वह दिन याद करना, जब तुम रोते थे, तो सीने से लगाकर चुप कराते थे।

अनन्त चतुर्दशी सितम्बर 25 विशेष〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️व्रत की महिमा 〰️〰️〰️〰️〰️पौराणिक मान्यता के अनुसार महाभारत काल से अनंत ...
24/09/2026

अनन्त चतुर्दशी सितम्बर 25 विशेष
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व्रत की महिमा
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पौराणिक मान्यता के अनुसार महाभारत काल से अनंत चतुर्दशी व्रत की शुरुआत हुई। यह भगवान विष्णु का दिन माना जाता है। अनंत भगवान ने सृष्टि के आरंभ में चौदह लोकों तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, पाताल, भू, भुवः, स्वः, जन, तप, सत्य, मह की रचना की थी। इन लोकों का पालन और रक्षा करने के लिए वह स्वयं भी चौदह रूपों में प्रकट हुए थे, जिससे वे अनंत प्रतीत होने लगे। इसलिए अनंत चतुर्दशी का व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और अनंत फल देने वाला माना गया है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने के साथ-साथ यदि कोई व्यक्ति श्री विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करता है, तो उसकी समस्त मनोकामना पूर्ण होती है। धन-धान्य, सुख-संपदा और संतान आदि की कामना से यह व्रत किया जाता है। भारत के कई राज्यों में इस व्रत का प्रचलन है। इस दिन भगवान विष्णु की लोक कथाएं सुनी जाती है।

इस दिन भगवान विष्णु की कथा, पूजा के लिए चतुर्दशी तिथि सूर्य उदय के पश्चात दो मुहूर्त में व्याप्त होनी चाहिए। पूर्णिमा का सहयोग होने से इसका बल बढ़ जाता है। यदि चतुर्दशी तिथि सूर्य उदय के बाद दो मुहूर्त से पहले ही समाप्त हो जाए, तो अनंत चतुर्दशी पिछले दिन मनाये जाने का विधान है। इस व्रत की पूजा और मुख्य कर्मकाल दिन के प्रथम भाग में करना शुभ माने जाते हैं। यदि प्रथम भाग में पूजा करने से चूक जाते हैं, तो मध्याह्न के शुरुआती चरण में करना चाहिए। मध्याह्न का शुरुआती चरण दिन के सप्तम से नवम मुहूर्त तक होता है।

जैसा इस व्रत के नाम से प्रतीत होता है कि यह दिन उस अंत न होने वाले सृष्टि के पालनकर्ता विष्णु की भक्ति का दिन है।

यूं तो यह व्रत नदी-तट पर किया जाना चाहिए और हरि की लोककथाएं सुननी चाहिए। लेकिन संभव ना होने पर घर में ही स्थापित मंदिर के सामने हरि से इस प्रकार की प्रार्थना की जाती है- 'हे वासुदेव, इस अनंत संसार रूपी महासमुद्र में डूबे हुए लोगों की रक्षा करो तथा उन्हें अनंत के रूप का ध्यान करने में संलग्न करो, अनंत रूप वाले प्रभु तुम्हें नमस्कार है।'

कैसे करें पूजा
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प्रात:काल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर कलश की स्थापना करें। कलश पर अष्टदल कमल के समान बने बर्तन में कुश से निर्मित अनंत की स्थापना की जाती है। इसके आगे कुंकूम, केसर या हल्दी से रंग कर बनाया हुआ कच्चे डोरे का चौदह गांठों वाला 'अनंत' भी रखा जाता है। कुश के अनंत की वंदना करके, उसमें भगवान विष्णु का आह्वान तथा ध्यान करके गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से पूजन करें।

इस व्रत में सूत या रेशम के धागे को लाल कुमकुम से रंग, उसमें चौदह गांठे (14 गांठे भगवान श्री हरि के द्वारा 14 लोकों की प्रतीक मानी गई है) लगाकर राखी की तरह का अनंत बनाया जाता है। इस अनंत रूपी धागे को पूजा में भगवान पर चढ़ा कर व्रती अपने बाजु में बाँधते हैं। पुरुष दाएं तथा स्त्रियां बाएं हाथ में अनंत बाँधती है। यह अनंत हम पर आने वाले सब संकटों से रक्षा करता है। यह अनंत धागा भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला तथा अनंत फल देता है। यह व्रत धन पुत्रादि की कामना से किया जाता है। इस दिन नये धागे के अनंत को धारण कर पुराने धागे के अनंत का विसर्जन किया जाता है ।

पूजन मुहूर्त
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चतुर्दशी तिथि प्रारंभ👉 24 सितम्बर को रात्रि 11 बजकर 17 मिनट से।

चतुर्दशी तिथि समाप्‍त👉 25 सितम्बर को रात्रि 11 बजकर 05 मिनट तक।

अनंत चर्तुदशी पूजा का मुहूर्त👉 सुबह 6:11 बजे से रात 11:06 बजे तक।

ब्रह्म मुहूर्त👉🏻 सुबह 4:35 बजे से 5:23 बजे तक।

अभिजीत मुहूर्त👉🏻 सुबह 11:48 बजे से दोपहर 12:37 बजे तक।

विजय मुहूर्त👉🏻 दोपहर 2:13 बजे से 3:01 बजे तक।

गोधूलि मुहूर्त👉🏻 शाम 6:14 बजे से 6:38 बजे तक कभी भी कर सकते है।

गणेश विसर्जन के लिए चौघड़िया मुहूर्त
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गणेश विसर्जन के लिए शुभ चौघड़िया मुहूर्त

प्रातः मुहूर्त👉🏻 (चर, लाभ, अमृत) 06:11 से 10:42

अपराह्न मुहूर्त👉🏻 (शुभ) 12:13 से 13:43

अपराह्न मुहूर्त👉🏻 (चर) 02:44 से 06:14

रात्रि मुहूर्त 👉🏻 (लाभ) 21:14 से 22:43 तक रहेगा।

पूजन सामग्री
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• शेषनाग पर लेटे हुए श्री हरि की मूर्ति अथवा तस्वीर
• आसन (कम्बल)
• धूप - एक पैकेट
• पुष्पों की माला – चार
• फल – सामर्थ्यानुसार
• पुष्प (14 प्रकार के)
• अंग वस्त्र –एक
• नैवैद्य(मालपुआ )
• मिष्ठा्न - सामर्थ्यानुसार
• अनंत सूत्र (14 गाँठों वाले ) – नये
• अनंत सूत्र (14 गाँठों वाले ) – पुराने
• यज्ञोपवीत (जनेऊ) – एक जोड़ा
• वस्त्र
• पत्ते – 14 प्रकार के वृक्षों का
• कलश (मिट्टी का)- एक
• कलश पात्र (मिट्टी का)- एक
• दूर्बा
• चावल – 250 ग्राम
• कपूर- एक पैकेट
• तुलसी दल
• पान- पाँच
• सुपारी- पाँच
• लौंग – एक पैकेट
• इलायची - एक पैकेट
• पंचामृत (दूध,दही,घी,शहद,शक्कर)

अनंत चतुर्दशी व्रत पूजन विधि प्रारम्भ
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पुराणों मे इस व्रत को करने का विधान नदी या सरोवर पर उत्तम माना गया है। परंतु आज के आधुनिक युग में यह सम्भव नहीं है। अत: घर में ही पूजा स्थान पर शुद्धिकरण करके अनंत भगवान की पूजा करें तथा कथा सुने। साधक प्रात: काल स्नानादि कर नित्यकर्मों से निवृत हो जायें। सभी सामग्री को एकत्रित कर लें तथा पूजा स्थान को पवित्र कर लें। पत्नी सहित आसन पर बैठ जायें। पूजागृह की स्वच्छ भूमि पर कलश स्थापित करें। कलश पर शेषनाग की शैय्यापर लेटे भगवान विष्णु की मूíत अथवा चित्र को रखें। उनके समक्ष चौदह ग्रंथियों (गांठों) से युक्त अनन्तसूत्र (डोरा) रखें। इसके बाद ॐ अनन्तायनम: मंत्र से भगवान विष्णु तथा अनंतसूत्रकी षोडशोपचार-विधिसे पूजा करें। पूजनोपरांतअनन्तसूत्रको मंत्र पढकर पुरुष अपने दाहिने हाथ और स्त्री बाएं हाथ में बांध लें।

अनंन्तसागरमहासमुद्रेमग्नान्समभ्युद्धरवासुदेव।
अनंतरूपेविनियोजितात्माह्यनन्तरूपायनमोनमस्ते॥

अनंतसूत्रबांध लेने के पश्चात किसी ब्राह्मण को नैवेद्य (भोग) में निवेदित पकवान देकर स्वयं सपरिवार प्रसाद ग्रहण करें। पूजा के बाद व्रत-कथा को पढें या सुनें। कथा का सार-संक्षेप यह है- सत्ययुग में सुमन्तुनाम के एक मुनि थे। उनकी पुत्री शीला अपने नाम के अनुरूप अत्यंत सुशील थी। सुमन्तु मुनि ने उस कन्या का विवाह कौण्डिन्यमुनि से किया। कौण्डिन्यमुनि अपनी पत्नी शीला को लेकर जब ससुराल से घर वापस लौट रहे थे, तब रास्ते में नदी के किनारे कुछ स्त्रियां अनन्त भगवान की पूजा करते दिखाई पडीं। शीला ने अनन्त-व्रत का माहात्म्य जानकर उन स्त्रियों के साथ अनंत भगवान का पूजन करके अनन्तसूत्रबांध लिया। इसके फलस्वरूप थोडे ही दिनों में उसका घर धन-धान्य से पूर्ण हो गया।

पवित्रीकरण
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अब दाहिने हाथ में जल लेकर निम्न पवित्रीकरण मंत्र का उच्चारण करें और सभी सामग्री , उपस्थित जन- समूह पर उस जल का छिंटा दें कर सभी को पवित्र कर लें ।

पवित्रीकरण मंत्र
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ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्व अवस्थांगत: अपिवा।
यः स्मरेत्‌ पुण्डरीकाक्षं स वाह्य अभ्यन्तर: शुचिः॥
आचमन
दाएँ हाथ में जल लें निम्न आचमन मंत्र के द्वारा तीन बार आचमन करें
“ॐ केशवाय नमः” मंत्र का उच्चारण करते हुए जल को पी लें।
“ॐ नारायणाय नमः” मंत्र का उच्चारण करते हुए जल को पी लें।
“ॐ वासुदेवाय नमः” मंत्र का उच्चारण करते हुए जल को पी लें।
तत्पश्चात“ॐ हृषिकेशाय नमः” कहते हुए दाएँ हाथ के अंगूठे के मूल से होंठों को दो बार पोंछकर हाथों को धो लें।

पवित्री धारण
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तत्पश्चात् निम्न मंत्र के द्वारा कुश निर्मित पवित्री धारण करे -
पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः ।
तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम् ।
स्वस्तिवाचन –
हाथ में अक्षत तथा पुष्प लें और निम्न मंत्रों को बोलते हुए थोड़ा –थोड़ा पुष्प भूमि पर छोड़ते जायें ।
ॐ गणेशाम्बिकाभ्यां नम : । ॐ केशवाय नम : । ॐ नारायणणाय नम : । ॐ माधवाय नम : । ॐ गोविंदाय नम : । ॐ विष्णवे नम : । ॐ मधुसूदनाय नम : । ॐ त्रिविक्रमाय नम : । ॐ वामनाय नम : । ॐ श्रीराधाय नम : । ॐ ह्रषीकेशाय नम : । ॐ पद्मनाभाय नम : । ॐ दामोदराय नम : । ॐ संकर्षणाय नम : । ॐ वासुदेवाय नम : । ॐ प्रद्युम्नाय नम : । ॐ अनिरुद्धाय नम : । ॐ पुरुषोत्तमाय नम : । ॐ अधोक्षजाय नम : । ॐ नरसिंहाय नम : । ॐ अच्युताय नम : । ॐ जनार्दनाय नम : । ॐ उपेंद्राय नम : । ॐ हरये नम : । ॐ श्रीकृष्णाय नम : । ॐ श्रीलक्ष्मीनारायणाभ्यां नम : । ॐ उमामहेश्वराभ्यां नम : । शचीपुरन्दराभ्यां नम : । मातृपितृभ्यां नम : । इष्टदेवताभ्यो नम : । ग्रामदेवताभ्यो नम : । स्थानदेवताभ्यो नम : । वास्तुदेवताभ्यो नम : । सर्वेभ्यो देवेभ्यो नम : । सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नम : ।

संकल्प : 👇🏻
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हाथ मे अक्ष्त ,पान का पत्ता ,सुपारी तथा सामर्थ्यानुसार सिक्के लेकर संकल्प मंत्र उच्चारित करते हुए संकल्प करें –
ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्यॐ विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्रीब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय परार्द्धे विष्नुपदे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे युगे कलियुगे, कलिप्रथमचरणे भूर्लोके जम्बुद्वीपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशे अमुकक्षेत्रे (अपने नगर तथा क्षेत्र का नाम लें) बौद्धावतारे अमुकनाम संवत्सरे श्रीसुर्ये अमुकयाने अमुक ऋतो ( ऋतु का नाम लें ) महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे भाद्र मासे शुक्ल पक्षे चतुर्दशी तिथौ अमुक वासरे ( वार का नाम लें ) अमुक नक्षत्रे ( नक्षत्र का नाम लें ) अमुक योगे अमुक-करणे अमुकराशिस्थिते चंद्रे ( जिस राशि में चंद्रमा स्थित हो,उसका नाम लें ) अमुकराशिस्थिते श्रीसुर्ये (जिस राशि में सुर्य स्थित हो,उसका नाम लें ) देवगुरौ शेषेषु ग्रहेषु यथायथा- राशिस्थान-स्थितेषु सत्सु एवं ग्रह-गुणग़ण-विशेषण- विशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ अमुक गोत्र (अपने गोत्र का नाम लें ) अमुकनाम ( अपना नाम ले ) ऽहं मम सकुटुम्बस्य क्षेमैश्वर्यायुरारोग्यचतुर्विधपुरुषार्थसिद्ध्यर्थं मया आचरितं वा आचार्यमाणस्य व्रतस्य सम्पूर्णफलावाप्त्यर्थं श्रीमदनन्तपूजनमहंकरिष्ये। श्रीमदनन्तव्रतांगत्वेन गणेशपूजनं ,यमुनापूजनादिकं च करिष्ये।
फिर कथा कहें ।।

व्रत कथा
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एक दिन कौण्डिन्य मुनि की दृष्टि अपनी पत्नी के बाएं हाथ में बंधे अनन्तसूत्रपर पडी, जिसे देखकर वह भ्रमित हो गए और उन्होंने पूछा-क्या तुमने मुझे वश में करने के लिए यह सूत्र बांधा है? शीला ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया-जी नहीं, यह अनंत भगवान का पवित्र सूत्र है। परंतु ऐश्वर्य के मद में अंधे हो चुके कौण्डिन्यने अपनी पत्नी की सही बात को भी गलत समझा और अनन्तसूत्रको जादू-मंतर वाला वशीकरण करने का डोरा समझकर तोड दिया तथा उसे आग में डालकर जला दिया। इस जघन्य कर्म का परिणाम भी शीघ्र ही सामने आ गया। उनकी सारी संपत्ति नष्ट हो गई। दीन-हीन स्थिति में जीवन-यापन करने में विवश हो जाने पर कौण्डिन्यऋषि ने अपने अपराध का प्रायश्चित करने का निर्णय लिया। वे अनन्त भगवान से क्षमा मांगने हेतु वन में चले गए। उन्हें रास्ते में जो मिलता वे उससे अनन्तदेवका पता पूछते जाते थे। बहुत खोजने पर भी कौण्डिन्यमुनि को जब अनन्त भगवान का साक्षात्कार नहीं हुआ, तब वे निराश होकर प्राण त्यागने को उद्यत हुए। तभी एक वृद्ध ब्राह्मण ने आकर उन्हें आत्महत्या करने से रोक दिया और एक गुफामें ले जाकर चतुर्भुजअनन्तदेवका दर्शन कराया।

भगवान ने मुनि से कहा-तुमने जो अनन्तसूत्रका तिरस्कार किया है, यह सब उसी का फल है। इसके प्रायश्चित हेतु तुम चौदह वर्ष तक निरंतर अनन्त-व्रत का पालन करो। इस व्रत का अनुष्ठान पूरा हो जाने पर तुम्हारी नष्ट हुई सम्पत्ति तुम्हें पुन:प्राप्त हो जाएगी और तुम पूर्ववत् सुखी-समृद्ध हो जाओगे। कौण्डिन्यमुनिने इस आज्ञा को सहर्ष स्वीकार कर लिया। भगवान ने आगे कहा-जीव अपने पूर्ववत् दुष्कर्मोका फल ही दुर्गति के रूप में भोगता है। मनुष्य जन्म-जन्मांतर के पातकों के कारण अनेक कष्ट पाता है। अनन्त-व्रत के सविधि पालन से पाप नष्ट होते हैं तथा सुख-शांति प्राप्त होती है। कौण्डिन्यमुनि ने चौदह वर्ष तक अनन्त-व्रत का नियमपूर्वक पालन करके खोई हुई समृद्धि को पुन:प्राप्त कर लिया।

भगवान जगदीश्वर जी की आरती
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ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।
भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥

जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ ॐ जय...॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिनु और न दूजा, आस करूं जिसकी॥ ॐ जय...॥

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥
पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ ॐ जय...॥

तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय...॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ ॐ जय...॥

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ ॐ जय...॥

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ ॐ जय...॥

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।
तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ ॐ जय...॥
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गया जी और गयासुर 〰️〰️🌼〰️🌼〰️〰️बिहार की धरती पर एक ऐसी नदी बहती है, जिसके किनारे खड़े होकर आज भी एक सवाल मन में उठता है—आख...
24/09/2026

गया जी और गयासुर
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बिहार की धरती पर एक ऐसी नदी बहती है, जिसके किनारे खड़े होकर आज भी एक सवाल मन में उठता है—आखिर नदी गई कहां? सामने चौड़ा नदी का पाट दिखाई देता है, रेत की लंबी परतें दिखाई देती हैं, लेकिन पानी अक्सर जमीन के ऊपर नजर नहीं आता। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस रहस्य के पीछे एक प्राचीन श्राप की कथा छिपी है, और कहा जाता है कि यह श्राप स्वयं माता सीता ने दिया था। लेकिन फलगू नदी की यह कहानी अकेली नहीं है। इसी भूमि के भीतर एक ऐसी कथा भी छिपी है, जिसमें एक महान भक्त ने अपने शरीर को ही मनुष्यों की मुक्ति का आधार बना दिया था। यही वह भूमि है जिसे आज गया के नाम से जाना जाता है, और जिसकी पौराणिक पहचान गयासुर नामक भगवान विष्णु के महान भक्त से जुड़ी हुई है।

कथा के अनुसार प्राचीन समय में गयासुर नाम का एक असुर था, लेकिन उसका हृदय भक्ति से भरा हुआ था। वह भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। उसने संसार की सुख-सुविधाओं की इच्छा छोड़कर कोलाहल पर्वत पर कठोर तपस्या आरंभ कर दी। वर्षों तक वह एकाग्र होकर भगवान का स्मरण करता रहा। न भूख की चिंता, न प्यास की चिंता और न ही अपने शरीर की। उसका पूरा मन केवल श्रीहरि के चरणों में लगा हुआ था। उसकी तपस्या इतनी कठोर और उसकी भक्ति इतनी गहरी थी कि अंततः भगवान विष्णु स्वयं उसके सामने प्रकट हुए। गयासुर ने भगवान को अपने सामने देखा तो उसकी आंखें श्रद्धा से भर गईं। भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर उससे वर मांगने को कहा। गयासुर ने धन, शक्ति या अमरत्व नहीं मांगा। उसने केवल इतना कहा कि जो भी व्यक्ति उसे देखे या उसका स्पर्श करे, उसके पाप नष्ट हो जाएं और उसे मोक्ष प्राप्त हो जाए। भगवान विष्णु ने उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे तथास्तु कह दिया।

लेकिन वरदान मिलते ही सृष्टि के सामने एक ऐसी समस्या खड़ी हो गई जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। अब जो भी पापी गयासुर के पास पहुंचता, उसका स्पर्श करता और देखते ही देखते उसके पाप समाप्त हो जाते। उसे मोक्ष मिलने लगा। धीरे-धीरे लोग अपने कर्मों का परिणाम भुगतने के बजाय गयासुर के पास पहुंचकर मुक्ति पाने लगे। कहा जाता है कि नरक में जाने वाली आत्माओं की संख्या कम होने लगी और यमराज के लोक में भी सन्नाटा छाने लगा। देवताओं को चिंता हुई कि यदि यही चलता रहा तो कर्म और उसके फल का पूरा संतुलन बिगड़ जाएगा। कोई व्यक्ति अपने कर्मों की जिम्मेदारी नहीं लेगा और केवल गयासुर के स्पर्श से मुक्ति प्राप्त कर लेगा। तब देवताओं ने इस समस्या का समाधान खोजने के लिए ब्रह्मा जी से सहायता मांगी।

ब्रह्मा जी गयासुर के पास पहुंचे और उसकी प्रशंसा करते हुए कहा कि तुम्हारा शरीर इतना पवित्र हो चुका है कि इससे अधिक पवित्र यज्ञभूमि पूरी सृष्टि में शायद ही कोई हो। यदि तुम्हारी अनुमति हो तो तुम्हारे शरीर पर एक महान यज्ञ किया जाए। गयासुर भगवान का भक्त था और उसके लिए देवताओं की इच्छा से बढ़कर कुछ नहीं था। उसने बिना किसी विरोध के अपनी विशाल देह को भूमि पर लिटा दिया। उसके शरीर को यज्ञभूमि बना दिया गया और देवताओं ने यज्ञ आरंभ कर दिया। लेकिन जैसे ही यज्ञ आगे बढ़ा, गयासुर का शरीर हिलने लगा। उसकी तपस्या और उसके भीतर की दिव्य शक्ति इतनी प्रबल थी कि उसका विशाल शरीर स्थिर नहीं रह पा रहा था। तब उसे शांत करने के लिए एक विशाल धर्मशिला लाई गई और उसके शरीर पर रखी गई। लेकिन इसके बाद भी उसका कंपन नहीं रुका।

अंततः स्वयं भगवान विष्णु वहां प्रकट हुए। उन्होंने उस पवित्र शिला पर अपना चरण रखा और उसी क्षण गयासुर शांत हो गया। उसे समझ आ गया कि अब उसके वरदान का उद्देश्य पूरा हो चुका है। भगवान विष्णु उसके सामने थे और गयासुर ने अपनी अंतिम इच्छा प्रकट की। उसने कहा कि यदि मेरा शरीर इस पवित्र भूमि का आधार बन गया है तो मेरी एक विनती स्वीकार कीजिए। जो भी मनुष्य यहां आकर अपने पूर्वजों का श्रद्धापूर्वक पिंडदान करे, उसके पूर्वजों को मुक्ति प्राप्त हो। भगवान विष्णु ने उसकी यह इच्छा भी स्वीकार कर ली। तभी से इस भूमि को पितरों की मुक्ति से जुड़ी पवित्र भूमि माना जाने लगा। मान्यता है कि आज का गया उसी गयासुर की कथा से जुड़ा हुआ है।

जिस शिला पर भगवान विष्णु ने अपना चरण रखा था, उसी से जुड़ा है प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर। मंदिर में भगवान विष्णु के चरणचिह्न के रूप में एक पवित्र निशान की पूजा की जाती है। देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान और श्राद्ध करने आते हैं। गया की पहचान केवल एक शहर के रूप में नहीं बल्कि पितृश्राद्ध की एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक भूमि के रूप में भी बनी हुई है। लेकिन गयासुर की कथा के बाद इस भूमि का सबसे रहस्यमय अध्याय अभी बाकी था, और वह जुड़ा था फलगू नदी से।

कथा त्रेता युग की बताई जाती है। भगवान श्रीराम अपने पिता राजा दशरथ के निधन के बाद उनके पिंडदान के लिए गया आए थे। उनके साथ माता सीता और लक्ष्मण भी थे। पिंडदान की तैयारी के लिए आवश्यक सामग्री लेने लक्ष्मण और राम कुछ समय के लिए वहां से चले गए। इसी बीच माता सीता नदी के किनारे अकेली थीं। तभी मान्यता के अनुसार राजा दशरथ की आत्मा उनके सामने प्रकट हुई और उन्होंने माता सीता से उसी समय पिंडदान करने की इच्छा व्यक्त की। सीता जी ने परिस्थिति को समझते हुए फलगू नदी की रेत से ही पिंड तैयार किया और राजा दशरथ के लिए विधि पूरी की। उस समय उनके पास राम या लक्ष्मण मौजूद नहीं थे, इसलिए माता सीता ने फलगू नदी, एक गाय, एक ब्राह्मण और एक अन्य साक्षी को इस घटना का गवाह माना।

कुछ समय बाद जब भगवान राम और लक्ष्मण वापस लौटे तो उन्होंने पूछा कि क्या पिंडदान हो चुका है। माता सीता ने कहा कि उन्होंने स्वयं राजा दशरथ का पिंडदान किया है। लेकिन जब राम ने गवाहों से इस बात की पुष्टि करनी चाही तो कथा के अनुसार वे सभी डर गए और माता सीता के पक्ष में सत्य बोलने से पीछे हट गए। फलगू नदी ने भी कथित रूप से उस घटना की गवाही नहीं दी। तब माता सीता को बहुत दुख हुआ। उन्होंने कहा कि यदि तुम सत्य के समय सत्य नहीं बोल सकते तो तुम्हें अपने कर्म का परिणाम भुगतना होगा। इसी कथा में आगे कहा जाता है कि माता सीता के श्राप के कारण फलगू नदी का जल धरती के ऊपर से गायब हो गया और वह जमीन के नीचे बहने लगी।

यही कारण है कि आज भी फलगू नदी के विस्तृत रेतीले तट को देखकर लोग इस प्राचीन कथा को याद करते हैं। कई स्थानों पर ऊपर से नदी का पाट सूखा दिखाई देता है, जबकि स्थानीय मान्यता में कहा जाता है कि जल रेत के नीचे प्रवाहित होता है। धार्मिक दृष्टि से यह स्थान आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है और यहां पिंडदान तथा श्राद्ध की परंपरा सदियों से चली आ रही है। हालांकि नदी के जमीन के नीचे जल प्रवाह को प्राकृतिक और भूगर्भीय प्रक्रियाओं से भी समझा जा सकता है, लेकिन धार्मिक परंपरा इसे माता सीता के श्राप से जोड़कर देखती है।

गया की धरती इसलिए भी अनोखी लगती है क्योंकि यहां एक ही कथा में भक्ति, वरदान, कर्म, मोक्ष, पितरों की मुक्ति और एक रहस्यमयी नदी की कहानी आपस में जुड़ जाती है। एक ओर गयासुर जैसा भक्त है जिसने अपनी पूरी देह को ही मनुष्यों की मुक्ति के लिए समर्पित कर दिया, दूसरी ओर वही भूमि फलगू नदी की उस कथा को अपने भीतर संजोए हुए है जिसमें सत्य और साक्षी का महत्व सामने आता है। यही वजह है कि गया आने वाला व्यक्ति केवल एक शहर नहीं देखता, बल्कि ऐसी परंपराओं के बीच पहुंचता है जिनकी जड़ें हजारों वर्षों पुरानी धार्मिक स्मृतियों में मानी जाती हैं।

और शायद इस कथा का सबसे गहरा संदेश यही है कि मनुष्य के लिए सत्य और भक्ति दोनों का महत्व कितना बड़ा है। गयासुर ने अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों की मुक्ति के लिए किया और अंत में उसका शरीर ही एक पवित्र तीर्थ का आधार बन गया। माता सीता की कथा हमें याद दिलाती है कि सत्य के सामने खड़ा होना केवल शब्दों का विषय नहीं बल्कि जिम्मेदारी का विषय भी है। आज भी जब कोई श्रद्धालु गया की धरती पर अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान करता है और फलगू नदी के विस्तृत तट पर खड़ा होता है, तो उसके सामने केवल रेत और नदी नहीं होती, बल्कि गयासुर की भक्ति, भगवान विष्णु के चरण और माता सीता की उस प्राचीन कथा की स्मृति भी जीवित हो उठती है। यही वह रहस्य है जिसने गया को केवल एक शहर नहीं रहने दिया, बल्कि उसे भारतीय धार्मिक परंपरा में पितरों की मुक्ति से जुड़ी एक महान तीर्थभूमि बना दिया।

जय श्री हरि
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