12/01/2026
मौत की खामोशी कैसी होती है—यह मोहनलाल ने जीते-जी महसूस कर लिया था। जब उनकी आँखें बंद थीं, शरीर ठठरी पर पड़ा था और चारों ओर “राम नाम सत्य है” की आवाज़ें गूँज रही थीं, तब भीतर एक अजीब-सा दर्द और सुकून साथ-साथ चल रहे थे। वे मुर्दा बने लेटे थे, लेकिन उनका मन पूरी तरह जाग रहा था। हर आँसू, हर सिसकी और हर शब्द उनके दिल में उतर रहा था।
बिहार के गया जिले के पोची गाँव के रहने वाले मोहनलाल ने ज़िंदगी के सबसे दर्दनाक और सबसे सच्चे सच को जानने के लिए अपनी ही शव-यात्रा निकलवाई। उन्हें नहलाना, कफ़न पहनाना, फूल-मालाएँ चढ़ाना—हर रस्म पूरे सम्मान और श्रद्धा से निभाई गई। गाँव वाले रो रहे थे। कोई कह रहा था, “बहुत अच्छे इंसान थे”, तो कोई अफसोस जताता हुआ बोल रहा था, “अभी तो बिल्कुल ठीक थे।” मोहनलाल साँस रोके सब सुनते रहे और सोचते रहे कि अगर वे सच में मर गए होते, तो यही लोग कुछ देर बाद लौट जाते और वे अकेले रह जाते।
श्मशान भूमि पहुँचकर जब शोर थम गया, तब उन्हें ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई समझ आई—इंसान की भीड़ भी अंत में उसे अकेला ही छोड़ देती है। उसी क्षण उनके भीतर एक अजीब-सी शांति भी उतर आई, जैसे वे दुनिया के झमेलों, मोह-माया और रिश्तों की उलझनों से मुक्त हो गए हों।
जब दाह-संस्कार की तैयारी शुरू हुई, तो मोहनलाल अचानक उठ खड़े हुए। लोग सन्न रह गए। उन्होंने बताया कि उन्होंने यह सब इसलिए किया ताकि वे जान सकें कि लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं, और साथ ही उसी दिन उनके द्वारा बनाए गए “मुक्तिधाम” का उद्घाटन भी हो जाए।
वायुसेना से सेवानिवृत्त मोहनलाल समाज-सेवा को ही अपना जीवन मानते हैं। वे दशरथ मांझी और गौतम बुद्ध से प्रेरणा लेते हैं। उनका मानना है कि जब अपने भी दूर हो जाएँ, तब समाज ही परिवार बन जाता है। उनकी यह दर्दभरी कहानी हमें सिखाती है कि ज़िंदगी क्षणभंगुर है, इसलिए जीते-जी ऐसा काम कर जाना चाहिए कि मौत पर बहने वाले आँसू सच्चे हों और यादें सम्मान से भरी रहें।
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