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09/03/2024

*८ मार्च*
🌹 *जागतिक महिला दिन* 🌹
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अमेरिका आणि युरोप सहित जवळ जवळ जगभरच्या स्त्रियांना विसाव्या शतकाच्या सुरुवाती पर्यंत मतदानाचा हक्क नाकारलेला होता. पुरुषप्रधान व्यवस्थेतील स्त्री पुरुष विषमतेचे हे एक ढळढळीत उदाहरण. या अन्याया विरुद्ध स्त्रिया आपापल्या परीने संघर्ष करीत होत्या. १८९० मध्ये अमेरिकेत मतदानाच्या हक्कासंदर्भात 'द नॅशनल अमेरिकन सफ्रेजिस्ट असोसिएशन' स्थापन झाली. परंतु ही असोसिएशन सुद्धा वर्णद्वेषी आणि स्थलांतरिता विषयी पूर्वग्रह असणारी होती. दक्षिणेकडील देशांना काळया मतदात्यांपासून आणि उत्तर व पूर्वेकडील देशांना तेथील बहुसंख्य देशांतरित मतदात्यांपासून वाचवण्याकरता स्त्रियांना मतदानाच्या हक्क मिळायलाच हवा, अशा प्रकारचे आवाहन ती करत होती. अर्थात या मर्यादित हक्कांना बहुसंख्य काळया वर्णाच्या आणि देशांतरित कामगार स्त्रियांनी जोरदार विरोध केला आणि क्रांतिकारी मार्क्सवाद्यांनी केलेल्या सार्वत्रिक प्रौढ मतदानाच्या हक्कांच्या मागणीला पाठिंबा दिला. १९०७ साली स्टुटगार्ड येथे पहिली आंतरराष्ट्रीय समाजवादी महिला परिषद भरली. त्यामध्ये क्लारा झेटकिन या अतिशय लढाऊ बाण्याच्या, झुंजार कम्युनिस्ट कार्यकर्तीने 'सार्वत्रिक मतदानाचा हक्क मिळवण्यासाठी संघर्ष करणे हे समाजवादी स्त्रियांचे कर्तव्य आहे' अशी घोषणा केली. ८ मार्च १९०८ रोजी न्यूयॉर्क मध्ये वस्त्रोद्योगातील हजारो स्त्री कामगारांनी रुटगर्स चौकात जमून प्रचंड मोठी ऐतिहासिक निदर्शने केली. दहा तासांचा दिवस आणि कामाच्या जागी सुरक्षितता ह्या मागण्या केल्या. या दोन मागण्या बरोबरच लिंग, वर्ण, मालमत्ता आणि शैक्षणिक पार्श्वभूमी निरपेक्ष सर्व प्रौढ स्त्री पुरुषांना मतदानाचा हक्क मिळावा अशी मागणीही जोरकस पणे केली. अमेरिकन कामगार स्त्रियांच्या या व्यापक कृतीने क्लारा झेटकिन अतिशय प्रभावित झाली. १९१० साली कोपनहेगन येथे भरलेल्या दुसऱ्या आंतरराष्ट्रीय समाजवादी महिला परिषदेत ८ मार्च १९०८ रोजी अमेरिकेतील स्त्री कामगारांनी केलेल्या ऐतिहासिक कामगिरीच्या स्मरणार्थ ८ मार्च हा 'जागतिक महिला दिन' म्हणून स्वीकारावा असा जो ठराव क्लाराने मांडला, तो पास झाला. यानंतर युरोप, अमेरिका वगैरे देशात सार्वत्रिक मतदानाच्या हक्कासाठी मोहिमा उघडल्या गेल्या. त्यांचा परिणाम म्हणून १९१८ साली इंग्लंड मध्ये नि १९१९ साली अमेरिकेत या मागण्यांना यश मिळाले. भारतात मुंबई येथे पहिला ८ मार्च हा महिला दिवस १९४३ साली साजरा झाला. १९७१ सालच्या ८ मार्चला पुण्यात एक मोठा मोर्चा काढण्यात आला होता. पुढे १९७५ हे वर्ष युनोने 'जागतिक महिला वर्ष' म्हणून जाहीर केले. त्यानंतर स्त्रियांच्या समस्या ठळकपणे समाजा समोर येत गेल्या. स्त्रियांच्या संघटनांना बळकटी आली. स्त्रिया बोलत्या व्हायला लागल्या. बदलत्या सामाजिक, आर्थिक, राजकीय, सांस्कृतिक परिस्थिती नुसार काही प्रश्नांचे स्वरूप बदलत गेले तशा स्त्री संघटनांच्या मागण्याही बदलत गेल्या. आता सर्व ठिकाणी ८ मार्च साजरा व्हायला लागला आहे.
*संकलन : gyanvardhak

15/01/2024

सेब खाने के 10 अनोखे गुण और अद्भुत फायदे.....

सेब अपने औषधि गुण और बेहतरीन फायदे के लिए दुनिया भर के लोगों का सबसे अच्छे पसंदीदा फलों में से एक है।
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इसमें भरपूर मात्रा में पोषक तत्व एवं बीमारों के लिए अनोखे फल होने के कारण इसके लिए अंग्रेजी का एक प्रसिद्ध वाक्य.....

"एन एप्पल ए डे, कीप्स द डॉक्टर अवे लगभग सब के जुबान पर होता है।

सेब के 10 चमत्कारी फायदे.....

वैसे तो सेब के बहुत सारे लाभ है।
लेकिन यहां पर इसके कुछ महत्वपूर्ण फायदे के बारे में बताया जा रहा है जिसको जान कर आप भी अचरज में पड़ जायेंगे।

सेब ह्रदय रोग से बचाये....

सेब में ह्रदय रोग से बचने के लिए कुछ महत्वपूर्ण एंटी ऑक्सीडेंट्स जैसे पोलीफेनोल एवं फ्लावोनोइड्स पाया जाता है। साथ ही साथ पोटैशियम की मौजूदगी भी ह्रदय को स्वस्थ बनाता है।

सेब बाल और त्वचा के लिए....

इसके नियमित सेवन से आपके बाल घने और डेंड्रफ रहित होते हैं। यह आपके त्वचा में निखार लाने में भी प्रभावी है।

सेब आँख की रौशनी के लिए....

सेब में विटामिन A पाया जाता है जो आपके आँख की बहुत सारी समस्याओं से बचाता है।

सेब दमा के उपचार के लिए.....

सेब दमा के उपचार के लिए एक बेहतरीन आयुर्वेदिक एवं घरेलू उपचार है। सेब में प्रचुर मात्रा में फ्लैवोनॉइड्स पाया जाता है जो फेफड़े को मजबूत एवं ताकतवर बनाते हुए इसे स्वस्थ रखता है। सेब के जूस का नियमित रूप से लेने से दमा के अटैक से बचने में राहत मिलती है।

सेब लीवर के लिए.....

सेब शरीर के pH स्तर को बनाये रखने में मदद करता है और लीवर से टॉक्सिन्स को निकालने में मदद करता है। जिससे से लीवर की शोधन एवं सफाई अच्छी तरह हो जाती है।

कोलेस्ट्रॉल से लड़ने में सहायक....

अगर आप कोलेस्ट्रॉल से अपनी जंग को कम करना चाहते हैं और ह्रदय को स्वस्थ देखना चाहते है तो नियमित रूप से सेब के जूस का सेवन करें। यह कोलेस्ट्रॉल को आपके शरीर से घटाता ही नहीं है बल्कि इससे लड़ने की क्षमता भी बढ़ाता है।

सेब हड्डी को मजबूत बनाये....

सेब में अच्छे खासे मात्रा में विटामिन सी, आयरन एवं बोरोन पाया जाता है जो आपकी हड्डियों को कमजोरी से निजात दिलाते हुए इसको मजबूत बनाता है।

सेब प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रबल बनाता है.....

सेब में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो आपके इम्युनिटी को स्ट्रांग बनाते हुए आपको बैक्टीरिया एवं जर्म्स से लड़ने में सक्षम बनाता है।

सेब कैंसर से लड़ने में सहायक.....
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सेब कैंसर एवं ट्यूमर से लड़ने में अहम भूमिका निभाता है।
सेब में एंटीऑक्सीडेंट्स फ्लावोनोइड्स एवं फेनोलिक एसिड पाया जाता है जो कैंसर से रोकने में आपकी मदद करता है।

सेब पाचन तंत्र के लिए.....

सेब के सेवन से पाचन तंत्र मजबूत बनता है।

सेब में सोर्बिटोल पाया जाता है जो बड़ी आँत से पानी निकालकर आपको कब्ज से बचाता है।

सेब की रेसिपी....

सेब को विभिन्न रूप में खाया जाता है।

सबसे अच्छा तरीका है कि इसको आप कच्चा और व भी दांत से काट कर चबा चबा कर खाएं।

इसे फ्रूट्स सलाद के रूप में खा सकते है।

इसका जूस लोगों के बीच में बहुत ही ज्यादा प्रचलित है।

शायद ही कोई ऐसा जूस होगा जो दुनिया में इससे ज्यादा बिकता हो।

बीमारों के लिए इसके जूस के इस्तेमाल का कहना ही किया।
घर का ताजा बनाया हुआ जूस ही इस्तेमाल करनी चाहिए। मार्किट के रेडीमेड जूस के पीने से बचना चाहिए।

सेब खाने की सावधानी...

सेब एक निहायत ही उम्दा फल है। इसके खाने के लाभ आपको भरपूर मात्रा में मिलता है। लेकिन इसके खाते समय आपको कुछ सावधानियां भी बरतनी चाहिए।

सेब के बीज को कतई नहीं खानी चाहिए।

जो लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं उन्हें मीठे वाले सेब नहीं खानी चाहिए। हो सके तो हरा सेब खाया करें।

सेब मार्किट से खरीदने के बाद इसको अच्छी तरह धोलें। वैसे उस तरह सेब को मत ख़रीदे जिसका छिलका चमकीला हो क्योंकि इसमें केमिकल होने की संभावना ज्यादा होता है।

सेब रात को नहीं खानी चाहिए क्योंकि इसे पचने में समय लेता है।

जिनको गैस बहुत ज़्यदा बनता हो वह कम से कम सेब खाएं।

सेब से जुड़े कुछ रोचक तथ्य...

माना जाता है कि सेब की उत्पत्ति कजाकिस्तान से हुई।

पुरे दुनिया में 7500 किस्मों के सेब पाए जाते हैं।

सेब का पेड़ चार से पांच वर्ष में फल देना शुरू कर देता है और 100 साल तक जिन्दा रहता है।

सबसे ज़्यदा सेब का उत्पादन चीन में होता है।

एक सेब में औसतन 10 बीज होते हैं।

*🏵️ भारतीय मन हर स्थिति में "राम" को साक्षी बनाने का आदी है।*दुःख में --"हे राम"पीड़ा में --"अरे राम"to https://bitli.in...
14/01/2024

*🏵️ भारतीय मन हर स्थिति में "राम" को साक्षी बनाने का आदी है।*

दुःख में --
"हे राम"

पीड़ा में --
"अरे राम"to
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लज्जा में --
"हाय राम"

अशुभ में --
"अरे राम राम"

अभिवादन में--
"राम राम"

शपथ में--
"राम दुहाई"

अज्ञानता में --
"राम जाने"

अनिश्चितता में --
"राम भरोसे"

अचूकता के लिए--
"रामबाण"

सुशासन के लिए--
"रामराज्य"

मृत्यु के लिए --
"राम नाम सत्य"

जैसी अभिव्यक्तियां पग-पग पर "राम" को साथ खड़ा करतीं हैं।
"राम" भी इतने सरल हैं कि.

हर जगह खड़े हो जाते हैं !

जिसका कोई नहीं...

उसके लिए "राम" हैं-
"निर्बल" के बल "राम"

।। जय श्री राम ।।

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13/01/2024

♦️ *विचारपुष्प*
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घरटे उडते वादळात
बिळा-वारूळात पाणी शिरते
कोणती मुंगी? कोणतं पाखरू?
म्हणून आत्महत्या करते?
🐜🕊

प्रतिकूल परिस्थितीतही
वाघ लाचारीने जगत नाही
शिकार मिळाली नाही म्हणून
कधीच अनुदान मागत नाही.
🐅

घरकुलासाठी मुंगी
करत नाही अर्ज
स्वतःच उभारते वारूळ
कोण देतो गृहकर्ज?
🎭

हात नाहीत सुगरणीला
फक्त चोच घेऊन जगते
स्वतःच विणते घरटे छान
कोणतं पॅकेज मागते?
🕴

कुणीही नाही पाठी
तरी तक्रार नाही ओठी
निवेदन घेऊन चिमणी
फिरते का कोणत्या योजनेसाठी?

घरधन्याच्या संरक्षणाला
धावून येतो कुत्रा
लाईफ इन्शुरन्स काढला का?
असं विचारत नाही मित्रा!
🐕

राब राब राबून बैल
कमावून धन देतात
सांगा बरं कुणाकडून
ते निवृत्तीवेतन घेतात?
🐂

कष्टकऱ्याची जात आपली
आपणही हे शिकलं पाहिजे
पिंपळाच्या रोपासारखं
पाषाणावर टिकलं पाहिजे
🤕

कोण करतो सांगा त्यांना
पुरस्काराने सन्मानित
तरीही मोर फुलवतो पिसारा
अन् कोकिळ गाते मंजुळ गीत
🐧

मधमाशीची दृष्टी ठेव
फुलांची काही कमी नाही
मधाच्या पोळ्यासाठी मित्रा
कोणतीच रोजगार हमी नाही
🐝

घाबरू नको कर्जाला
भय, चिंता फासावर टांग
जीव एवढा स्वस्त नाही
सावकाराला ठणकावूण सांग
😎

काळ्या आईचा लेक कधी
संकटापुढे झुकला का?
कितीही तापला सूर्य तरी
समुद्र कधी सुकला का?
🌊💦

निर्धाराच्या वाटेवर
टाक निर्भीडपणे पाय
तू फक्त विश्वास ठेव
पुन्हा सुगी देईल धरणी माय
🎑

निर्धाराने जिंकू आपण
पुन्हा यशाचा गड
आयुष्याची लढाई
फक्त हिमतीने लढ...
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12/01/2024

स्वामी विवेकानंद जीवनी
जन्म तिथि: 12 जनवरी, 1863 • जन्म स्थान: कलकत्ता, बंगाल प्रेसीडेंसी (अब पश्चिम बंगाल में कोलकाता) • माता-पिता: विश्वनाथ दत्ता (पिता) और भुवनेश्वरी देवी (माता) • शिक्षा: कलकत्ता मेट्रोपॉलिटन स्कूल; प्रेसीडेंसी कॉलेज, कलकत्ता • संस्थान: रामकृष्ण मठ; रामकृष्ण मिशन; न्यूयॉर्क की वेदांत सोसाइटी • धार्मिक दृष्टिकोण: हिंदू धर्म • दर्शन: अद्वैत वेदांत • प्रकाशन: कर्म योग (1896); राज योग (1896); कोलंबो से अल्मोड़ा तक व्याख्यान (1897); माई मास्टर (1901) • मृत्यु: 4 जुलाई, 1902 • मृत्यु स्थान: बेलूर मठ, बेलूर, बंगाल • स्मारक: बेलूर मठ, बेलूर, पश्चिम बंगाल
ऐसे ही ज्ञानवर्धक लेख पढ़ने के लिए आप हमसे जुड़ सकते हो।
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स्वामी विवेकानंद, जिन्हें उनके पूर्व-मठवासी जीवन में नरेंद्र नाथ दत्ता के नाम से जाना जाता था, का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता, विश्वनाथ दत्त, एक सफल वकील थे, जिनकी रुचि कई विषयों में थी, और उनकी मां भुवनेश्वरी देवी गहरी भक्ति, मजबूत चरित्र और अन्य गुणों से संपन्न थीं। एक असामयिक लड़का नरेंद्र ने संगीत, जिम्नास्टिक और पढ़ाई में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। जब तक उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की, तब तक उन्होंने विभिन्न विषयों, विशेष रूप से पश्चिमी दर्शन और इतिहास का व्यापक ज्ञान प्राप्त कर लिया था। योगिक स्वभाव के साथ जन्मे वे बचपन से ही ध्यान का अभ्यास करते थे और कुछ समय तक ब्रह्म आंदोलन से जुड़े रहे।

स्वामी विवेकानंद का निधन
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4 जुलाई 1902 को ध्यान करते हुए स्वामी विवेकानंद की मृत्यु हो गई। उनके शिष्यों के अनुसार, विवेकानंद ने महासमाधि प्राप्त की- उनके मस्तिष्क में एक रक्त वाहिका का टूटना मृत्यु का संभावित कारण बताया गया।

कौन थे स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण रामकृष्ण परमहंस

जब नरेंद्र नाथ दत्ता युवावस्था की दहलीज पर थे तब उन्हें आध्यात्मिक संकट के दौर से गुजरना पड़ा, जिसमें कि ईश्वर के अस्तित्व के बारे में संदेह ने उन्हें घेर लिया था। उस समय उन्होंने पहली बार कॉलेज में अपने एक अंग्रेजी प्रोफेसर से श्री रामकृष्ण के बारे में सुना था। नवंबर 1881 में एक दिन, नरेंद्र श्री रामकृष्ण से मिलने गए, जो दक्षिणेश्वर में काली मंदिर में ठहरे हुए थे। उन्होंने सीधे गुरु से एक प्रश्न पूछा, जो उन्होंने कई अन्य लोगों से किया था, लेकिन कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला: "श्रीमान, क्या आपने भगवान को देखा है?" श्री रामकृष्ण ने उत्तर दिया: "हां, मेरे पास ही भगवान है। मैं उन्हें उतना ही स्पष्ट रूप से देखता हूं जितना मैं आपको देखता हूं, केवल अधिक गहन अर्थों में।"

नरेंद्र के मन से शंकाओं को दूर करने के अलावा, श्री रामकृष्ण ने अपने शुद्ध, निःस्वार्थ प्रेम से उन्हें जीत लिया। इस प्रकार एक गुरु-शिष्य संबंध शुरू हुआ जो आध्यात्मिक गुरुओं के इतिहास में काफी अनूठा है। नरेंद्र अब दक्षिणेश्वर के बार-बार आने लगे और गुरु के मार्गदर्शन में आध्यात्मिक पथ पर तेजी से आगे बढ़े। दक्षिणेश्वर में, नरेंद्र भी कई युवकों से मिले जो श्री रामकृष्ण के प्रति समर्पित थे, और वे सभी घनिष्ठ मित्र बन गए।

स्वामी विवेकानंद जब जनवरी 1897 में भारत लौटे तो उनका हर जगह उत्साहपूर्ण स्वागत किया गया। क्योंकि उन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों में कई व्याख्यान दिए, जिससे पूरे देश में हलचल मच गई। इन प्रेरक और गहन महत्वपूर्ण व्याख्यानों के माध्यम से स्वामीजी ने निम्नलिखित कार्य करने का प्रयास किया:
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• लोगों की धार्मिक चेतना जगाना और उनमें अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व पैदा करना; • अपने संप्रदायों के सामान्य आधारों को इंगित करके हिंदू धर्म का एकीकरण करना; • दलित जनता की दुर्दशा पर शिक्षित लोगों का ध्यान केंद्रित करना और व्यावहारिक वेदांत के सिद्धांतों को लागू करके उनके उत्थान के लिए उनकी योजना को उजागर करना।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना

कोलकाता लौटने के तुरंत बाद, स्वामी विवेकानंद ने पृथ्वी पर अपने मिशन का एक और महत्वपूर्ण कार्य पूरा किया। उन्होंने 1 मई 1897 को रामकृष्ण मिशन के नाम से जाने जाने वाले एक अनूठे प्रकार के संगठन की स्थापना की, जिसमें भिक्षु और आम लोग संयुक्त रूप से व्यावहारिक वेदांत का प्रचार करते थे, और विभिन्न प्रकार की सामाजिक सेवा, जैसे अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, छात्रावास, ग्रामीण विकास चलाना। केंद्र आदि, और भारत और अन्य देशों के विभिन्न हिस्सों में भूकंप, चक्रवात और अन्य आपदाओं के पीड़ितों के लिए बड़े पैमाने पर राहत और पुनर्वास कार्य करना।

स्वामी विवेकानंद के योगदान निम्नलिखित हैं

हिंदू धर्म में एकीकरण लाने के लिए स्वामी जी का योगदान,

स्वामी विवेकानंद का विश्व संस्कृति में योगदान,

वास्तविक भारत की खोज में स्वामी जी का योगदान

एक मठवासी भाईचारे की शुरुआत में स्वामी जी का योगदान।

विश्व संस्कृति में स्वामी विवेकानंद के योगदान का वस्तुपरक मूल्यांकन करते हुए, प्रख्यात ब्रिटिश इतिहासकार ए एल बाशम ने कहा कि "आने वाली शताब्दियों में, उन्हें आधुनिक दुनिया के प्रमुख निर्माताओं में से एक के रूप में याद किया जाएगा..."

कुल मिलाकर स्वामी विवेकानंद भारतीय संस्कृति और धर्म के प्रति अपने अद्वितीय और उत्कृष्ट दृष्टिकोण के लिए हर युवा के दिल में हैं और हमेशा रहेंगे। उनका योगदान भारतीय समाज में उत्कृष्टता की भावना को जागरूक करने में महत्वपूर्ण रहा है। उनकी उपदेशों और विचारों का प्रभाव आज भी हमारे समाज में महत्वपूर्ण है और उन्हें "विश्व धरोहर" कहा जाता है।

12/01/2024

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*हनुमान जी की उड़ने की गति*
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बचपन में जब हमारे बड़े हमें रामायण की कहानियां सुनाया करते थे तब हमें लक्ष्मण जी के बेहोश होने पर हनुमान जी का संजीवनी बूटी लेने जाना व जाने का किस्सा सुनाया जाता था जिसमे संजीवनी बूटी ना मिलने पर पूरा का पूरा पर्वत उठाकर लाने वाला किस्सा रोचक लगता था। क्या कभी आपने यह सोचा कि उनके उड़ने की गति क्या होगी ? जिस तरह से हनुमान जी एक ही रात में श्रीलंका से हिमालय के पर्वतों पर पहुंचे ? और पहाड़ उठाकर वापस भी आ गए तो निश्चित ही उनके उड़ने की क्षमता बेहद तेज रही होगी। लेकिन कितनी तेज ? इस बात का सही सही अनुमान नहीं लगाया जा सकता लेकिन फिर भी आपके मन में उठ रहे सवालों के जवाब खोजने के लिए हमने कुछ तथ्यों का सहारा लिया और गुणा भाग करके हनुमान जी की रफ्तार जानने की कोशिश की है।
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अगर इसमे कोई गलती या चुक होने कि संभावना भी हो सकती है। जहां तक हमारी जानकारी है जिस वक्त लक्ष्मण और मेघनाथ का युद्ध होने वाला था उससे ठीक पहले मेघनाथ ने अपनी कुलदेवी की तपस्या शुरू की थी और वह तपस्या मेघनाथ ने पूरा दिन की थी। इस पूजा की खबर जब श्रीराम व उनकी सेना को लगी तो विभीषण ने बताया कि अगर मेघनाथ की तपस्या पूर्ण हो गई तो मेघनाथ अमर हो जाएगा उसके बाद तीनों लोकों में मेघनाथ को कोई नहीं मार सकेगा। इसीलिए मेघनाथ की तपस्या किसी तरीके से भंग कर के उसे अभी युद्ध के लिए ललकारना होगा। इसके बाद हनुमान जी सहित कई वानर मेघनाथ की तपस्या भंग करने गए। उन्होंने अपनी गदा के प्रहार से मेघनाथ की तपस्या भंग करने में सफलता प्राप्त की लेकिन तब तक रात हो चुकी थी।

लक्ष्मण जी ने रात को ही मेघनाथ को युद्ध के लिए ललकारा, रामायण के अनुसार उस समय रात्रि का दूसरा पहर शुरु हो चुका था। दोस्तों रात्रि का पहला पहर सूर्य अस्त होते ही शुरू हो जाता है और सूर्य उदय होने के साथ ही रात्रि का अंतिम यानी चौथा पहर खत्म हो जाता है। यानी चार पहर होते हैं। इसका मतलब प्रत्येक पहर 3 घंटे का हुआ अब अगर आधुनिक काल की घड़ी के हिसाब से देखें तो लक्ष्मण और मेघनाथ का युद्ध रात के करीब 9:00 बजे शुरू हुआ होगा। यह भी कहा जाता है कि लक्ष्मण जी और मेघनाथ के बीच बेहद घनघोर युद्ध हुआ था जो लगभग 1 पहर यानी 3 घंटे तक चला था उसके बाद मेघनाथ ने अपने शक्तिशाली अस्त्र का प्रयोग किया जिससे लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए। लक्ष्मण जी के मूर्छित होने का समय लगभग 12:00 बजे के आसपास का रहा होगा।
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लक्ष्मण जी के मूर्छित होने से समस्त वानर सेना में हड़कंप मच गया मेघनाथ ने मूर्छित लक्ष्मण को उठाने की जी तोड़ कोशिश की लेकिन जो शेषनाग समस्त पृथ्वी को अपने फन पर उठा सकता था उसी शेषनाग के अवतार को भला मेघनाथ कैसे व क्या उठा पाता। लक्ष्मण जी को ना उठा पाने पर मेघनाथ वापस चला गया। श्री राम अपने प्राणों से भी प्यारे भाई को मूर्छित देखकर शोक में डूब गए, उसके बाद विभीषण के कहने पर हनुमान जी लंका में से लंका के राज्य वैद्य को जबरदस्ती उठा लाए। लक्ष्मण जी अगर 12:00 बजे मूर्छित हुए तो जाहिर है उसके बाद श्री राम के शोक और विभीषण द्वारा सुषेण वैद्य लाने के लिया कहना और हनुमान जी द्वारा सुषेण वैद्य को उठा लाना इन सब में कम से कम 1 घंटा तो लग ही गया होगा। यानी रात्रि के करीब 1:00 बज चुके होंगे | इसके बाद वैद्य द्वारा लक्ष्मण की जांच करने और उनके प्राण बचाने के लिए संजीवनी बूटी लाने की सलाह देने और हनुमान जी को संजीवनी बूटी लाने के लिए प्रस्थान करने में भी कम से कम आधा घंटा जरूर लगा होगा।

तो हम ये मान सकते हैं कि बजरंगबली हनुमान आज के समय के अनुसार करीब रात्रि में 1:30 पर संजीवनी बूटी लाने के लिए रावण की नगरी से उड़े होंगे। जहां तक सवाल उनके वापस आने का है तो निश्चित ही वह सूर्य उदय होने से पहले वापस आ गए होंगे। यानि की बजरंगबली के वापस आने का समय लगभग 5:00 बजे का रहा होगा। 1:30 बजे लक्ष्मण जी की जान बचाने के लिए हनुमान जी उड़े और 5:00 बजे तक वापस आ गये इसका मतलब हनुमान जी 3:30 घंटे में द्रोणागिरी पर्वत उठाकर वापस आ गए। लेकिन मित्रों इन 3:30 घंटों में से भी हमें कुछ समय कम करना होगा क्योंकि जैसे ही लंका से निकलकर पवन पुत्र भारत आए तो रास्ते में उन्हें कालनेमि नामक राक्षस अपना रूप बदले मिला।

कालनेमि निरंतर श्री राम नाम का जप कर रहा था लेकिन वास्तव में उसकी मंशा हनुमान जी का समय खराब करने की थी। हनुमान जी ने जब जंगल से रामनाम का जाप सुना तो जिज्ञासावश नीचे उतर आए कालनेमि ने खुद को बहुत बड़ा ज्ञानी बताया और हनुमान जी से कहा कि पहले आप स्नान करके आओ उसके बाद मैं आपको रावण के साथ चल रहे युद्ध का नतीजा बताऊंगा। भोले हनुमान जी उसकी बातों में आ गए और स्नान करने चले गए | स्नान करते समय उनका सामना एक मगरमच्छ से हुआ जिसे हनुमान जी ने मार डाला।

उस मगर की आत्मा ने हनुमान को उस कपटी कालनेमि की वास्तविकता बताई तो बजरंगबली ने उसे भी अपनी पूंछ में लपेटकर परलोक भेज दिया। लेकिन इन सब में भी हनुमान जी का कम से कम आधा घंटा जरूर खराब हुआ होगा। उसके बाद बजरंगबली ने उड़ान भरी होगी और द्रोणागिरी पर्वत जा पहुंचे लेकिन हनुमान जी कोई वैद्य तो नहीं थे इसीलिए संजीवनी बूटी को पहचान नहीं सके और संजीवनी को खोजने के लिए वह काफी देर तक भटकते रहे होंगे। इसमें भी उनका कम से कम आधा घंटा जरूर खराब हुआ होगा। बूटी को ना पहचान पाने की वजह से हनुमान जी ने पूरा पर्वत ही उठा लिया और वापस लंका की ओर जाने लगे। लेकिन हनुमान जी के लिए एक और मुसीबत आ गई।

हुआ यह की जब पवन पुत्र पर्वत लिए अयोध्या के ऊपर से उड़ रहे थे तो श्री राम के भाई भरत ने सोचा कि यह कोई राक्षस अयोध्या के ऊपर से जा रहा है और उन्होंने बिना सोचे समझे महावीर बजरंगबली पर बाण चला दिया। बाण लगते ही वीर हनुमान श्री राम का नाम लेते हुए नीचे आ गिरे। हनुमान जी के मुंह से श्री राम का नाम सुनते ही भरत दंग रह गए और उन्होंने हनुमानजी से उनका परिचय पूछा तो उन्होंने (हनुमान जी) ने उन्हें राम रावण युद्ध के बारे में बताया। लक्ष्मण के मूर्छित होने का पूरा किस्सा सुनाया तब सुनकर वह भी रोने लग गए और उनसे माफी मांगी| फिर हनुमानजी का उपचार किया गया और हनुमान जी वापस लंका की ओर ओर चलें। लेकिन इन सभी घटनाओं में भी बजरंगबली के कीमती समय का आधा घंटा फिर से खराब हो गया। अब हनुमान जी के सिर्फ उड़ने के समय की बात करें तो सिर्फ दो घंटे थे और इन्हीं दो घंटों में वह लंका से द्रोणागिरी पर्वत आए और वापस गए।

अब अगर हम उनके द्वारा तय की गई दूरी को देखें तो श्रीलंका और द्रोणागिरी पर्वत तक की दूरी लगभग “ 2500 किलोमीटर” की है यानी कि यह दूरी आने जाने दोनों तरफ की मिलाकर 5000 किलोमीटर बैठती है और बजरंगबली ने यही 5000 किलोमीटर की दूरी 2 घंटे में तय की। इस हिसाब से हनुमान जी के उड़ने की रफ्तार लगभग 2500 किलोमीटर प्रति घंटा की दर से निकलती है. तो इसकी तुलना अगर ध्वनी की रफ्तार से करें तो उसकी तुलना में हनुमानजी की गति लगभग 2 गुना ज्यादा बैठती है।

आधुनिक भारत के पास मौजूद रसिया से मंगवाए गए लड़ाकू विमान मिग 29 की रफ्तार 2400 किलोमीटर प्रति घंटा है. अगर इसकी तुलना हनुमान जी की रफ्तार से करें तो यहां पर भी हनुमान जी की रफ्तार ज्यादा निकलती है यानी हनुमान जी आधुनिक भारत के पास मौजूद सबसे तेज लड़ाकू विमान से भी तेज उड़ते थे।

एक गाँव में एक किसान रहता था उसके परिवार में उसकी पत्नी और एक लड़का था। कुछ सालों के बाद पत्नी की मृत्यु हो गई उस समय लड़क...
11/01/2024

एक गाँव में एक किसान रहता था उसके परिवार में उसकी पत्नी और एक लड़का था। कुछ सालों के बाद पत्नी की मृत्यु हो गई उस समय लड़के की उम्र
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दस साल थी। किसान ने दूसरी शादी कर ली। उस दूसरी पत्नी से भी किसान को एक पुत्र प्राप्त हुआ। किसान की दूसरी पत्नी की भी कुछ समय बाद मृत्यु हो गई। किसान का बड़ा बेटा जो पहली पत्नी से प्राप्त हुआ था जब शादी के योग्य हुआ तब किसान ने बड़े बेटे की शादी कर दी। फिर किसान की भी कुछ समय बाद मृत्यु हो गई। किसान का छोटा बेटा जो दूसरी पत्नी से प्राप्त हुआ था और पहली पत्नी से प्राप्त बड़ा बेटा दोनों साथ साथ रहते थे। कुछ समय बाद किसान के छोटे लड़के की तबियत खराब रहने लगी। बड़े भाई ने कुछ आस पास के वैद्यों से इलाज करवाया पर कोई राहत ना मिली। छोटे भाई की दिन ब दिन तबियत बिगड़ती जा रही थी और बहुत खर्च भी हो रहा था। एक दिन बड़े भाई ने अपनी पत्नी से सलाह की कि यदि ये छोटा भाई मर जाए तो हमें इसके इलाज के लिए पैसा खर्च ना करना पड़ेगा। और जायदाद में आधा हिस्सा भी नहीं देना पड़ेगा। तब उसकी पत्नी ने कहा कि क्यों न किसी वैद्य से बात करके इसे जहर दे दिया जाए किसी को पता भी ना चलेगा किसी रिश्तेदारी में भी कोई शक ना करेगा कि बीमार था बीमारी से मृत्यु हो गई। बड़े भाई ने ऐसे ही किया एक वैद्य से बात की कि आप अपनी फीस बताओ ऐसा करना मेरे छोटे बीमार भाई को दवा के बहाने से जहर देना है ! वैद्य ने बात मान ली और लड़के को जहर दे दिया और लड़के की मृत्यु हो गई। उसके भाई भाभी ने खुशी मनाई की रास्ते का काँटा निकल गया अब सारी सम्पत्ति अपनी हो गई। उसका अंतिम संस्कार कर दिया गया। कुछ महीनों पश्चात उस किसान के बड़े लड़के की पत्नी को लड़का हुआ ! उन पति पत्नी ने खूब खुशी मनाई, बड़े ही लाड़ प्यार से लड़के की परवरिश की। कुछ ही गिने वर्षों में लड़का जवान हो गया। उन्होंने अपने लड़के की भी शादी कर दी! शादी के कुछ समय बाद अचानक लड़का बीमार रहने लगा। माँ बाप ने उसके इलाज के लिए बहुत वैद्यों से इलाज करवाया। जिसने जितना पैसा माँगा दिया सब कुछ दिया ताकि लड़का ठीक हो जाए । अपने लड़के के इलाज में अपनी आधी सम्पत्ति तक बेच दी पर लड़का बीमारी के कारण मरने की कगार पर आ गया। शरीर इतना ज्यादा कमजोर हो गया की अस्थि-पिंजर शेष रह गया था। एक दिन लड़के को चारपाई पर लेटा रखा था और उसका पिता साथ में बैठा अपने पुत्र की ये दयनीय हालत देख कर दुःखी होकर उसकी ओर देख रहा था! तभी लड़का अपने पिता से बोला कि भाई! अपना सब हिसाब हो गया बस अब कफन और लकड़ी का हिसाब बाकी है उसकी तैयारी कर लो। ये सुनकर उसके पिता ने सोचा की लड़के का दिमाग भी काम नहीं कर रहा है बीमारी के कारण और बोला बेटा मैं तेरा बाप हूँ भाई नहीं! तब लड़का बोला मैं आपका वही भाई हूँ जो आप ने जहर खिलाकर मरवाया था। जिस सम्पत्ति के लिए आप ने मरवाया था मुझे अब वो मेरे इलाज के लिए आधी बिक चुकी है आपकी शेष है हमारा हिसाब हो गया! तब उसका पिता फ़ूट-फूट कर रोते हुए बोला कि मेरा तो कुल नाश हो गया। जो किया मेरे आगे आ गया। पर तेरी पत्नी का क्या दोष है जो इस बेचारी को जिन्दा जलाया जाएगा। (उस समय सतीप्रथा थी जिसमें पति के मरने के बाद पत्नी को पति की चिता के साथ जला दिया जाता था) तब वो लड़का बोला की वो वैद्य कहाँ है, जिसने मुझे जहर खिलाया था। तब उसके पिता ने कहा की आप की मृत्यु के तीन साल बाद वो मर गया था। तब लड़के ने कहा कि ये वही दुष्ट वैद्य आज मेरी पत्नी रूप में है मेरे मरने पर इसे जिन्दा जलाया जाएगा।

हमारा जीवन जो उतार-चढ़ाव से भरा है इसके पीछे हमारे अपने ही कर्म होते हैं। हम जैसा बोएंगे, वैसा ही काटना पड़ेगा। कर्म करो तो फल मिलता है, आज नहीं तो कल मिलता है। जितना गहरा अधिक हो कुआँ, उतना मीठा जल मिलता है। जीवन के हर कठिन प्रश्न का, जीवन से ही हल मिलता है!!
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दीक्षितांनी सर्व आकडेवारी न्यायालयापुढं ठेवली. एका सुदृढ गायीचे वजन तीनसाडेतीन क्विंटल असते. पण, ती कापल्यावर केवळ ७० कि...
10/01/2024

दीक्षितांनी सर्व आकडेवारी न्यायालयापुढं ठेवली. एका सुदृढ गायीचे वजन तीनसाडेतीन क्विंटल असते. पण, ती कापल्यावर केवळ ७० किलोच मांस मिळते. एक किलो गोमांस जेव्हा निर्यात होते, तेव्हा ५० डालर मिळतात म्हणजे रु. ३,५००. रक्त २५ लीटर, त्याचे १,५०० ते २,००० आणि हाडांचे १,००० ते १,२०० रुपये मिळतात. म्हणजे गाय मारून तिचे मांस, रक्त आणि हाडे विकून ❤️ हत्या करणाऱ्या कसायाला अधिकतम केवळ ७,००० रुपयेच मिळतील. (आणि हे आकडे सुदृढ गायींच्या संबंधातले आहेत. म्हाताऱ्या गायींपासून इतकं उत्पन्न मिळत नाही.) पण, तिला जिवंत ठेवलं तर किती रुपये मिळतील? आता त्याची आकडेवारी पाहा….

एक गाय दिवसाला १० किलो शेण व ३ लीटर गोमूत्र देते. १ किलो शेणापासून ३३ किलो खत होते. त्याला सेंद्रिय खत म्हणतात. न्यायाधीशांना आश्चर्याने विचारले, “हे कसे शक्य आहे?”
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त्यावर दीक्षित म्हणाले, “आम्हाला वेळ द्या आणि जागा द्या. आम्ही हे सिद्ध करून दाखवतो.” न्यायालयाने अनुमती दिल्यावर दीक्षितांनी आपलं म्हणणं सिद्ध करून दाखवलं.
❤️
ते न्यायाधीशांना म्हणाले, “आता आय.आर.सी. च्या संशोधकांना पाचारण करून शेणाचं परीक्षण ❤️ करून घ्या.”

जेव्हा शेण संशोधनाकरता पाठवले, तेव्हा संशोधकांनी अछि सांगितले,

“ह्यात १८ प्रकारची पोषक सूक्ष्मतत्त्वे (micro nutrients) आहेत. त्या सर्वांचीच सर्व शेतजमिनींना अत्यंत ❤️ आवश्यकता असते. उदा. *मँगनीज, फॉस्फरस, पोटॅशियम, कॅल्शियम, आयर्न,❤️ कोबाल्ट, सिलिकॉन, इत्यादी.” ह्याउलट रासायनिक खतांत केवळ तीनच पोषक ❤️ तत्त्वे असू शकतात. याचा अर्थ शेणखत रासायनिक खताच्या सहापट शक्तिशाली आहे*. न्यायालयाने ते मान्य केले. ❤️

दीक्षित म्हणाले, “माझे वडील आणि दोघे भाऊ शेतकरी आहेत. ❤️ १५ वर्षांपासून आम्ही गायीच्या शेणापासून खत करून शेती करतो. *१ किलो शेणापासून ३३ किलो खत बनते. रोजच्या १० किलो शेणापासून ३३० किलो. (म्हणजे महिन्याचे १ टन) आणि ६ रुपये किलोप्रमाणे १८०० ते १९०० रुपयांचे खत प्रतिदिन मिळेल. म्हणजे वर्षाचे रु. ७०,०००च्या वर* झाले.

*गायीचे आयुष्य २० वर्षांचे मानले तर एक गाय आयुष्यात एक कोटी ४० लक्षांच्यावर उत्पन्न देते*. विशेष म्हणजे ती मृत्यूपर्यंत, अगदी शेवटच्या दिवसापर्यंत शेण देत राहते.”

सहस्रो वर्षांपूर्वी आपल्या शास्त्रांत लिहून ठेवले आहे की गायीच्या शेणात लक्ष्मी आहे.
आधुनिक शिक्षण घेतलेल्या मेकॉलेच्या मानसपुत्रांनी ह्या गोष्टीची टवाळी केली. त्यांना धर्म, संस्कृती, सभ्यता सर्व थोतांड वाटते. पण गायीच्या शेणात लक्ष्मी असते, हे तर वरच्या आकडेमोडीनं सिद्धच झाले आहे. त्याच्या उपयोगानं धान्य निर्माण होते. संपूर्ण भारताचे पोट त्यातून भरते.

आता गोमूत्राचा विचार करू. दिवसाला दोन ते तीन लीटर गोमूत्र मिळते. *गोमूत्रापासून ४८ प्रकारच्या रोगांवर औषध बनते*.

*एक लीटर गोमूत्र औषध रूपात विकले तर त्याची किंमत रु. ५०० होते. भारतीय बाजारपेठेत, आंतरराष्ट्रीय बाजारात ह्यापेक्षा अधिक भाव* मिळतो.

*अमेरिका भारतातून गोमूत्र आयात करते आणि त्यापासून मधुमेहावर औषध बनवते.*

अमेरिकेत गोमूत्राची तीन पेटंटे आहेत.

अमेरिकन बाजारपेठेच्या हिशेबाने आकडेमोड केली तर त्याचा *दर लीटरला डॉ. १२००, ते १३०० ❤️ आहे. याचा अर्थ एका गायीपासून प्रतिवर्षी ११,००.००० (११ लक्ष) रुपये मिळतात. म्हणजे २० वर्षांच्या आयुष्यात २,२०,००,००० (दोन कोटी वीस लक्ष रुपये)* झाले.

पुन्हा गायीच्या शेणापासून मिथेन गॅस बनतो. आपल्या घरगुती सिलिंडरांत तोच असतो. आणि जशी एलपीजीवर चारचाकी गाडी चालू शकते, तशी ह्या गॅसवरही चालू शकते.

न्यायाधीशांचा त्यावर विश्वास बसला नाही. तेव्हा दीक्षित म्हणाले, “आपल्या गाडीला आम्ही शेणापासून बनवलेल्या मिथेनचा सिलिंडर बसवून देतो. आपण गाडी चालवूनच पाहा ना.” त्यांनी मान्यता दिली. आणि तीन महिने गाडी चालवली. आणि म्हणाले, "एक्सलंट!!"

कारण, त्यांना *प्रतिकिलोमीटर केवळ ५० ते ६० पैसे इतकाच खर्च* पडला. आणि डिझेलला प्रति किलोमीटर ४ रुपये खर्च (म्हणजे सातपट) येतो.

आणखी, *मिथेनवर चालणाऱ्या गाडीचा धूर नाही*, वातावरणात शिसे पसरत नाही, आवाजही कमी होतो. ह्या सगळ्याच बाबी न्यायाधीशमहाराजांच्या लक्षात आल्या. मग दीक्षित म्हणाले, *“प्रतिदिन १० किलो शेणापासून २० वर्षांत किती गॅस मिळेल?”*

*भारतात १७ कोटी गाई आहेत. त्यांचे शेण एकत्र केले तर देशाची १ लाख ३२ सहस्र कोटींची बचत होईल. आणि थेंबभरसुद्धा, डिझेल किंवा पेट्रोल आयात केल्याविना देशाची संपूर्ण वाहतूक होऊ शकेल*. तीही सातव्या हिश्श्यानं स्वस्त. अरब देशांसमोर हात पसरायची आवश्यकताच राहणार नाही, की अमेरिकी डॉलर देऊन पेट्रोल विकत घ्यावं लागणार 😭 नाही. आंतरराष्ट्रीय बाजारात रुपयाचं मूल्य वाढेल.

ही सगळी आकडेवारी जेव्हा दीक्षितांनी न्यायाधीशांसमोर मांडली, तेव्हा, गायीची हत्या करण्यापेक्षा तिला वाचवण्याने देशाचा आर्थिक लाभ अधिक आहे, हे त्यांनी मान्य केले.

न्यायालयाचे हे

मत जेव्हा कसायांना समजले, तेव्हा ते संतापले. आपला पराभव त्यांना डोळ्यांसमोर दिसू लागला.

*गोहत्येपासून ७० सहस्र रुपयांचा लाभ होतो, असे ते म्हणाले होते. पण तिची हत्या केली नाही, तर तिच्यापासून कोट्यवधी रुपयांचा लाभ होतो*. आणि आजवर हे कुणी सांगितलंसुद्धा नव्हतं. तर पटवून सिद्ध करण्याची गोष्टच उद्भवली नाही.

(आणि गायींची पैदास वाढवली तर आपण गॅस निर्यातही करू शकू. इंधनाची समस्या उरणारच नाही. वर आपल्या बाळांना अधिकाधिक दूध देऊ शकू.)

मग कसायांनी आपला हुकमाचा एक्का बाहेर काढला. ते म्हणाले, *गोहत्या करणे हा आमचा धार्मिक अधिकार आहे.*

त्यावर दीक्षित म्हणाले, “त्याकरता *कुराण, शरियत, हदीस हे सगळे ग्रंथ आम्ही न्यायालयासमोर आणतो. गाईची कत्तल करा असे त्यात कोठे लिहिले आहे, ते आम्हालाही जाणून घ्यायाचे🙏 आहेच. गायींची हत्या करा, असे त्यात कुठेही लिहिलेले नाही*, असे आपल्या लक्षात येईल.

उलट, *'गायीचे रक्षण करा!' असेच हदीसमध्ये म्हटले आहे, कारण तीही तुमचे रक्षण करते*. गाय मुका प्राणी आहे, म्हणून तिच्यावर दया करा, असेच महमद पैगंबर ह्यांचे विधान आहे.

गायीची हत्या कराल तर दोझकमध्येसुद्धा जागा मिळणार नाही, जहान्नमध्येही जागा मिळणार नाही, असेही आणखी एके ठिकाणी म्हटले आहे.

तर मग गायीची हत्या करण्याचा अधिकार त्यांना केव्हापासून मिळाला? विचारा ह्या कसायांना.”

तेव्हा कसाई निरुत्तर झाले.

दीक्षित पुढे म्हणाले, “मक्का, मदीनामध्ये काही ग्रंथ असतील तर तेही घेऊन या.”

मग न्यायालयाने एक महिन्याची मुदत दिली. आणि गायीची हत्या करणे हा इस्लामचा मूलभूत अधिकार आहे, असा आदेश असलेले असे काही दस्तऐवज असतील तर घेऊन येण्याचा आदेश दिला.

एक महिन्यात काहीही पुरावा मिळाला नाही. आता आणखी वेळ देता येत नाही, असे म्हणून *न्यायालयाने २६ ऑक्टोबर २००५ ला (बरोबर 15 वर्षांपूर्वी) आपला निर्णय दिला*.

ह्या निर्णयाची प्रत *आपल्याला www.supremecourtcaselaw.com ह्या दुव्यावर जाऊन पाहता* येईल.

हे *निकालपत्र ६६ पानी आहे*. तो निर्णय देऊन न्यायालयाने इतिहास घडवला आहे.

*निर्णयात न्यायालय म्हणते, गायीची हत्या हा संवैधानिक अपराध आहे, धार्मिक पाप आहे*. गोरक्षण, गोसंवर्धन करणे हे प्रत्येक नागरीकाचे कर्तव्य आहे. सरकारचे आहेच. पण नागरिकांचेही आहे.

आजपर्यंत जी संवैधानिक कर्तव्ये होती (उदा. राष्ट्रध्वजाचा सन्मान करणे, क्रांतिकारकांचा आदर करणे, देशाची अखंडता व एकता अबाधित ठेवणे), *आता गायीचे रक्षण ह्याचीसुद्धा संवैधानिक कर्तव्यांमध्ये भर घातली गेली आहे*.

1998 च्या भारतच्या अणुस्फोटानंतर जगाने भारतावर आर्थिक बंदी लादली. पण भारतावर त्याचा फारसा दुष्परिणाम झाला नाही. अमेरिकेने याचा विशेष अभ्यास केला व भारताची बलस्थाने हेरली व ती नष्ट करण्याचा विशेष कार्यक्रम मोठया बजेटसह आखला.
भारताची 1. पारम्पारिक शेती, 2 . कुटुंब व्यवस्था 3. भारतीय नीतिमूल्ये या तीन गोष्टी नष्ट केल्याशिवाय भारत कधीच पुरता सम्पणार नाही. गोधन सम्पवणे, भारतीय बियाणी सम्पविणे, तथाकथित विचारवंत, मीडिया मार्फत कुटुंब व्यवस्था नितिमूल्ये सम्पविणे हा योजनापूर्वक कार्यक्रम सुरु आहे. गाईंची कत्तल हां त्यातला एक भाग.

*हे फार मोठे षड्यंत्र आहे*.
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